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शाब्दिक बलात्कार

विद्वान कहते हैं कि चुप रहने पर अगर कोई आपको मूर्ख समझ भी लें तो भी ये उस क्षण से कहीं बेहतर है जब कि आपके मुखरित होने से आपकी मूर्खता पूर्णतः प्रदर्शित हो जाए. यानी चुप रहने में ही बुद्धीमत्ता है और मनुष्य को वाणी का प्रयोग बहुत सोच समझ और संभल कर करना चाहिए क्यूंकि यही उसके व्यक्तित्व को समाज में यथोचित सम्मान दिलाती है. अन्याय के खिलाफ मौन रखने के अलावा चुप रहना कभी गलत नहीं होता और इसीलिए दार्शनिक अरस्तु ने मौन को मनुष्य की अमूल्यवान शक्ती कहा है.

पर लगता है इन ऐतिहासिक वेद वाक्यों से भारत की कई विभूतियाँ सम्पूर्णता अनभिज्ञ हैं . अगर ऐसा न होता तो ये प्रसिद्ध लोग सार्वजनिक मंचों पर वैसे अभद्र और गैर ज़िम्मेदार बयान न देते जो ये हर रोज़ दिए चले जाते हैं. आमतौर पे मनुष्य ऊल जलूल तब बोलता है जब वो अपना आपा खो देता है या उसकी बुद्धी भ्रष्ट हो जाती है और या वो किसी मनोवैज्ञानिक दबाव से ग्रसित होता है. पर अनंत कुमार हेगड़े से ले कर साक्षी महाराज और साध्वी निरंजन ज्योति से ले कर गिरिराज सिंह और आसाराम से लेकर मोहन भागवत और राज ठाकरे से लेकर मोंटेक सिंह आहलुवालिया तक जिन महानुभवों की हम बात कर रहे हैं वो लोग ना तो मूर्ख हैं और ना ही शोषित, इसीलिए समझ नहीं आता की समय-समय पर ये सब ऐसे ऊटपटांग व्यक्तव्य क्यूँ देते रहते हैं जिनसे न केवल देशवासियों को कष्ट होता है बल्कि देश की इज्ज़त भी धूमिल होती है. बात चाहे नारी सम्मान की हो या महंगाई की, भूख, भ्रष्टाचार या गरीबी की, हमारे अतिविशिष्ट विभूतियों की बातें सुन शक होता है कि इन लोगों के सीने में दिल भी है या नहीं क्यूंकि इनके व्यक्तव्य अक्सर असंवेदनशील और अमानवीय होते हैं.

इनके व्यक्तव्यों की समीक्षा करें तो पायेंगे की इनकी अभिव्यक्ति के पीछे रूढ़िवादी सोच और निकृष्ट मानसिकता के साथ-साथ अहंकार और तिरस्कार का बहुत बड़ा हाथ है क्यूंकि ये अपने आप को एक आम इंसान से परे समझते हैं. साथ ही साथ, अपने फायदे के लिए ये आम जनता को भड़काने की भी कोशिश करते रहते हैं. राजा-महाराजाओं की प्रथा भले ही ख़त्म हो गयी हो पर अभी भी भारतीय सोच में सामंतवाद और संकीर्णता कूट-कूट कर भरी है और इसीलिए हम हर वक्त ऐसे संवाद सुनते हैं जिनमें बुद्धीमत्ता कम और नासमझी का पुट ज्यादा होता है तथा समाज में फूट डालने का घिनौना प्रयास होता है. मसलन, जब हेगड़े संविधान को हिंदुत्व के अनुसार बदलने की बात करते हैं या साक्षी महाराज डेरा सच्चा सौदा के राम रहीम को संत बताते हैं या फिर साध्वी निरंजन ज्योति और गिरिराज सिंह जब मुस्लिम समुदाय पर कीचड़ उछालते हैं तो वो सम्पूर्ण देशवासीयों को ठेस पहुंचाते हैं.

इसी प्रकार कुछ समय पहले जब मोहन भागवत ने बलात्कार के लिए शहरी समाज को दोष दिया तो वो भूल गये की भंवरी देवी या फूलन देवी का शोषण ग्रामीण परिवेश में ही हुआ था. इसी तरह आसाराम का दिल्ली बलात्कार काण्ड के लिए मासूम बालिका को दोषी ठहराना उसी पुरुषोचित दंभ और बर्बरता का प्रस्फुटन है जिसके तहत औरत को भोग की वस्तु समझा जाता है और जिसके कारण दुशासन ने भरी सभा में अपनी भाभी द्रौपदी का चीर हरण किया था. यदा कदा जब राज ठाकरे बिहारी लोगों को महाराष्ट्र की प्रत्येक असफलता के लिए कोसते हैं या तृणमूल कॉन्ग्रेस या बीजेपी पदाधिकारी महिलाओं को ही बलात्कार के लिए दोषी बताते हैं तो कहीं न कहीं वे अपनी कमजोरियों को छिपाने की शरारत है. इसी प्रकार, कमर तोड़ महंगाई के दौरान, मोंटेक सिंह द्वारा ग्रामीण वासियों के लिए भरण पोषण के लिए प्रतिदिन अठाईस रुपयों की न्यूनतम मजदूरी को सही बताना एक क्रूर मज़ाक से कम ना था.

सच तो ये है की व्यावसायिक, राजनैतिक और चुनावी फायदों के लिये अभद्र वाणी बोलने की आज कल होड़ सी लग गयी है और असंयमित भाषा के लिए प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी से ले कर मणि शंकर ऐय्यर तक सब दोषी हैं. ऐसे कथन के वक्ताओं का सामाजिक बहिष्कार होना चाहिए ताकि ऐसे लोगों की अक्ल ठिकाने लगाई जा सके, पर ऐसा होता नहीं है क्यूंकि हमारा समाज पार्टी, जाति, धर्म, ऊँच-नीच के वर्गों में बुरी तरह बटा हुआ है. लोग जब दोषी का मूल्यांकन अपराधी की तरह न करने की बजाये पार्टी, जाति, वर्ग और धार्मिक समूह के प्रतिनिधी के रूप में उनकी गलतियों को नज़र अंदाज़ करते हैं तो वो समाज और राष्ट्र के साथ न केवल बेईमानी करते हैं बल्कि नाइंसाफी भी करते हैं. जब तक हम ऐसे लोगों का सामाजिक बहिष्कार नहीं करेंगे तब तक ऐसी हरक़तों पर लगाम नहीं लगेगी. पर क्या हमारी महिलाएं आसाराम या भागवत या जमायेते इस्लामी हिन्द के जलसों का बहिष्कार करेंगी? और क्या भारतीय पुरुष, साक्षी महाराज या ओवैसी जैसे राजनीतिज्ञों की सभाओं में भीड़ बढ़ाना बंद करेंगे? सवाल का जवाब आसान है पर उस पे अमल करना हमारे समाज की ईमानदारी पर निर्भर करता है.

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