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गूगल के डूडल में महिला शक्ति की रंग-बिरंगी अभिव्यक्ति

गूगल ने अपने चिर-परिचित अंदाज में इस बार भी महिला दिवस पर डूडल बनाकर बधाई दी है. गूगल ने अपने इस डूडल में महिलाओं को बड़ी उपलब्धियों के साथ एस्ट्रोनॉट, वैज्ञानिक, एथलीट, टीचर्स, म्यूजिशियन, शेफ और लेखिका की अलग-अलग भूमिकाओं में दिखाया गया है. गूगल कायह डूडल संदेश दे रहा है कि कभी इन सभी भूमिकाओं को सिर्फ पुरिषों के लिए ही माना जाता था लेकिन अब महिलाएं इन सभी क्षेत्रों में आगे हैं और बढ़-चढ़कर अपनी भूमिका निभा रही हैं। 

 
इस डूडल में एक कहानी पिरोई गई है जिसमें इस बात पर प्रकाश डाला गया है कि आखिर 1911 में शुरु होने के यानी एक सदी बाद भी महिला दिवस इतना महत्वपूर्ण क्यों है.कहना न होगा इस डूडल के माध्यम से तकनीक के इस्तेमाल के साथ-साथ गूगल ने अपनी समसामयिक जिम्मेेदारी के निर्वहन की नायाब मिसाल एक बार फिर पेश की है। महिला सशक्तिकरण पर सोच के नए आयाम, समझ की नई दिशा के साथ प्रस्तुति की रचनात्मकता के संगम के रूप में इस डूडल को देखा जा सकता है। 
गूगल ने इस डूडल को अंग्रेजी कैप्शन दिया है- हैप्पी इंटरनेशनल वूमेंस डे। दुनिया भर में महिलाओं के अधिकारों और उन्हें बढ़ावा देने के लिए यह दिन खास महिलाओं के लिए 8 मार्च को मनाया जाता रहा है। 

जब बात महिला शक्ति की चली है तो लीजिये 'आखिर क्यों ?' का यह मशहूर गीत गुनगुना लीजिये –

कोमल है तू कमजोर नहीं तू, शक्ति का नाम ही नारी है
जग को जीवन देने वाली, मौत भी तुझसे हारी है

सतियों के नाम पे तुझे जलाया, 
मीरा के नाम पे जहर पिलाया, 

सीता जैसे अग्नि परीक्षा जग में अब तक जारी है
कोमल है कमजोर नहीं तू शक्ति का नाम नारी है

इल्म हुनर में …. दिल दिमाग में
किसी बात में कम तो नहीं
पुरुषो वाले … सारे ही अधिकारों की अधिकारी है, 

कोमल है कमजोर नहीं तू शक्ति का नाम नारी है
जग को जीवन देने वाली मौत भी तुझसे हारी है… 

बहुत हो चुका ….. अब मत ना सहना
तुझे इतिहास बदलना है 
नारी को कोई कह ना पाए … अबला है, बेचारी है

कोमल है कमजोर नहीं तू शक्ति का नाम नारी है
जग को जीवन देने वाली, मौत भी तुझसे हारी है, 
कोमल है तू कमजोर नहीं तू शक्ति का नाम ही नारी है
जग को जीवन देने वाली मौत भी तुझसे हारी है

और प्रसंगवश  ये रहे आपकी डायरी के लिए महिला जगत और महिला अधिकारों के संघर्ष के कुछ बेहद अहम आंकड़े –

१६९१ : अमरीका। मेसेच्यूसेट्स राज्य में महिलाओं को वोट देने का अधिकार मिला, लेकिन १७८० में यह छीन लिया गया।
१७८८ : फ्रांस। फ्रांसीसी राजनीतिज्ञ काँडसेंट ने महिलाओं की शिक्षा, राजनीति और नौकरी के अधिकार की माँग की।
१७९२ : ब्रिटेन। मेरी बुलस्टोनक्राफ्ट की पुस्तक 'ए विंडिकेशन आफ राइट्स आफ वीमेन' प्रकाशित हुई, जो नारी अधिकारों पर पहली पुस्तक थीं।
१८४० : अमरीका। लुक्रीशियाने ईक्वल राइट एसोसिएशन की स्थापना करके नीग्रो और स्त्रियों के लिए समान अधिकारों की माँग की।
१८५७ : अमरीका। ८ मार्च को न्यूयार्क की सिलाई-उद्योग और वस्त्र उद्योग की मज़दूरिनों ने पुरुषों के समान वेतन की माँग करते हुए १० घंटों के कार्य दिवस के लिए हड़ताल की।
१८५९ : रूस। सेंट पीटर्सबर्ग में नारी मुक्ति आंदोलन का सूत्रपात हुआ।
१८६२ : स्वीडन। महिलाओं को म्युनिस्पल चुनावों में वोट देने का अधिकार मिला।
१८६५ : जर्मनी। लुइसी ओटटो ने जर्मन महिलाओं के महासंघ की स्थापना की।
१८६६ : ब्रिटेन। प्रसिद्ध अर्थशास्त्री जान स्टुअर्ट मिल ने माँग की कि महिलाओं को भी मताधिकार दिया जाए।
१८६८ : ब्रिटेन। 'नेशनल वीमेंस सफेजट सोसायटी' की स्थापना हुई।
१८६९ : अमरीका। 'नेशनल वीमेंस सफरेज एसोसिएशन' (राष्ट्रीय महिला मताधिकार संगठन) की स्थापना हुई।
१८७० : स्वीडन, फ्रांस। महिलाओं को चिकित्साशास्त्र के अध्ययन की स्वतंत्रता मिली।
१८७४ : जापान। महिलाओं के लिए पहला अध्यापिका प्रशिक्षण विद्यालय खुला।
१८७८ : रूस। सेंट पीटर्सबर्ग में प्रथम महिला विश्वविद्यालय की स्थापना हुई।
१८८२ : फ्रांस। प्रसिद्ध लेखक विक्टर ह्यूगो के संरक्षण में महिला अधिकार संगठन की स्थापना हुई।
१८९३ : न्यूजीलैंड। महिलाओं को मताधिकार मिला।
१९०१ : नार्वे। महिलाओं ने पहली बार म्युनिसपिल चुनावों में मतदान किया।
१९०४ : अमरीका। 'इंटरनेशनल वीमेन सफरेंज एलायन्स' (अंतर्राष्ट्रीय महिला मताधिकार समिति) की स्थापना की गई।
१९०५ : ब्रिटेन। मैनचेस्टर में नारी आंदोलनकारियों की एक सभा हुई। जिसमें एनी कैनी और क्रिस्टाबेल पैकहर्स्ट' को गिरफ्तार किया गया।
१९०६ : फिनलैंड। महिलाओं को मताधिकार मिला।
१९०८ : ब्रिटेन। 'वीमेंस फ्रीडम लीग' की स्थापना हुई और प्रदर्शन के सिलसिले में क्रिस्टाबेल पैकहर्स्ट और ड्रूमांड को गिरफ्तार कर लिया गया।
१९१० : डेनमार्क। कोपेनहेगन में द्वितीय अंतर्राष्ट्रीय महिला कांग्रेस की सभा में क्लारा जेटकिन ने प्रस्ताव रखा कि न्यूयार्क की मजदूरिनों की हड़ताल (८ मार्च १८५७) की याद में ८ मार्च को महिला-दिवस के रूप में मनाया जाए।
१९११ : जापान। महिला मुक्ति आंदोलन का सूत्रपात हुआ।
१९१२ : चीन। नानकिंग में देश के कई महिला आंदोलन के संगठनों की बैठक हुई जिसमें महिलाओं के मताधिकार की माँग की गई।
१९१३ : नार्वे। महिलाओं को मतदान का अधिकार मिला। आस्ट्रिया, स्विट्जरलैंड, डेनमार्क में ८ मार्च को महिला दिवस मनाया गया और मतदान के अधिकार की माँग की गई।
१९३६ : फ्रांस। श्रीमती क्यूरी (नोबल पुरस्कार प्राप्त) सहित तीन महिलाएँ मंत्री बनीं, लेकिन सामान्य महिलाओं को मताधिकार नहीं मिला।
१९४५ : फ्रांस, इटली। महिलाओं को मतदान का अधिकार मिला।
१९५१ : अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन ने समान श्रम के लिए समान वेतन का नियम पास किया।
१९५२ : राष्ट्रसंघ की महासभा ने भारी बहुमत से राजनैतिक अधिकारों का नियम पास किया।
१९५७ : ट्यूनीशिया। स्त्री-पुरुष समानता का कानून बना।
१९५९ : श्रीलंका। श्रीमती सिरीमाओ भंडारनायक विश्व की प्रथम महिला प्रधानमंत्री बनी।
१९६४ : पाकिस्तान। विश्व में पहली बार कुमारी फातिमा जिन्ना ने राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव लड़ा।
१९६७ : ईरान। पत्नी को बिना पति की आज्ञा के नौकरी करने का अधिकार मिला।
१९७५ : अंतर्राष्ट्रीय महिला वर्ष मनाया गया, जिसे महिला दशक के रूप में विस्तृत कर दिया गया।

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लेखक राष्ट्रपति सम्मानित प्रखर वक्ता और शासकीय दिग्विजय पीजी स्वशासी महाविद्यालय, राजनांदगांव ( छत्तीसगढ़ ) के हिन्दी विभाग में प्राध्यापक हैं। 

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