Friday, April 19, 2024
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पुस्तकों के रचनाकारों का पुन:संस्कार करती समीक्षाएँ  ‘अनुभूति के पथ पर : जीवन की बातें’

पहली बात तो पुस्तक समीक्षा लिखना ही एक दुरूह कार्य है और फिर बात हो समीक्षा की पुस्तक की समीक्षा तो यह काम एक और चुनौतीपूर्ण रोमांच का मोड़ ले लेता है। हालाँकि अपनी अल्प समझ और अध्ययन से अभी तक जो भी जान पाया उस आधार पर इस पुस्तक की कुछ बातों से आपको अवगत करवाना चाहूँगा।
पुस्तक समीक्षा का जो सामान्य अर्थ मैं समझता हूँ वह है- किसी भी पुस्तक का एक सही परिचय प्रस्तुत करना और उसकी एक विश्लेषणात्मक जानकारी पाठक तक पहुँचाना। जिसके लिये एक समीक्षक में विशेषज्ञता, विस्तृत सामान्य समझ, पूर्वाग्रह मुक्त दृष्टि सम्पन्न वस्तुनिष्ठ संतुलित लेखन और सामाजिक दायित्व बोध होना चाहिए।
जहाँ आज के समय में समीक्षा निजी संबंध निभाने और लेखक को खुश करने का जरिया बनी हुई है और साहित्यिक दायित्वहीनता की पराकाष्ठा पर पहुँच चुकी है, पूर्वाग्रहों से दूषित हो चुकी है, उस समय में समीक्षा में एक निष्पक्ष, वैज्ञानिक और विस्तृत दृष्टिकोण की आवश्यकता है।
‘अनुभूति के पथ पर : जीवन की बातें’ पुस्तक में विजय जोशी जी ने समीक्षा की उस परंपरा का निर्वहन किया है जिसमें पुस्तक के गुण-दोष के कथन के आगे बढ़कर कवियों की विशेषताओं और उनकी अंत:परिवृति की छानबीन की और ध्यान भी दिया। जिसे भारतीय साहित्य का आधुनिकीकरण भी कहा गया।
 यह पुस्तक विजय जोशी जी द्वारा समीक्षा के क्षेत्र में एक भाषागत और शैलीगत प्रयोग को दर्शाती है जो अनूठा है और पारंपरिक समीक्षा की शैली से भिन्न है। विजय जोशी जी इन समीक्षाओं में विषयवस्तु सामान्य चिंतन से ही नहीं वरन् सूक्ष्म और गहन दृष्टि से विषयवस्तु को संदर्भ विन्यास और लेखक के समसामयिक दृष्टिकोण से देखकर भी मूल्यांकित करते हैं ।
एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी समृद्ध विजय जोशी जी की इन समीक्षाओं में पाठक पुस्तक और कवि दोनों की मूल संवेदनाओं और वर्तमान में उनकी प्रासंगिकता को स्पष्ट और तर्क संगत रूप से समझ पाता है। समीक्षा की भाषा शैली एक तरलता लिये हुए है और सभी समीक्षाओं में एक संतुलन और एक निष्पक्ष विश्लेषण देखा जा सकता है। इस पुस्तक में संग्रहीत इन समीक्षाओं की एक विशेषता यह भी है कि ये पूर्णत: निर्णयात्मक न होकर आंशिक रहस्यात्मक सी प्रतीत होती है जिससे कि पाठक को पुस्तक के प्रति जिज्ञासा उत्पन्न हो और वह स्वयं भी एक विश्लेषणात्मक दृष्टि से पुस्तकों को देखने की स्वतंत्रता ले सके।
विजय जोशी जी की इन समीक्षाओं की एक विशेषता यह भी है कि यह पूर्णरूपेण पाठक पर आरोपित नहीं हैं। तीक्ष्ण दृष्टि से पुस्तकों के अवलोकन के पश्चात भी समीक्षा की भाषा पुस्तकों के प्रति स्नेहिल और उदार प्रतीत होती है। विजय जोशी जी की समीक्षाएँ इन पुस्तकों के रचनाकारों का पुन:संस्कार करती हैं और आलोचनात्मक संतुलन से भी आगे जाकर एक स्वस्थ मन से पुस्तकों की रचनाओं में निहित सौन्दर्य को परखती हैं।
आयरिश साहित्यकार ऑस्कर वाइल्ड का कहना है कि समीक्षक दूसरों की कृतियों और व्यक्तित्व की तभी व्याख्या कर सकता है जब वह स्वयं अपने व्यक्तित्व में प्रगाढ़ता (इंटेनसिटी) पैदा कर ले।
मैं आशा करता हूँ कि विजय जोशी जी की 272 पृष्ठ की इस पुस्तक में संकलित सभी 99 पुस्तकों की समीक्षाओं से पाठक को इसमें संकलित सभी पुस्तकों के बारे में एक निष्पक्ष, परिष्कृत दृष्टि और व्यापक समझ मिलेगी। पुस्तक की भूमिका सुप्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. गणेश तारे ने लिखी है।
प्रकाशक : साहित्यागार, जयपुर।
 प्रथम संस्करण दिसम्बर 2023
मूल्य : 500₹
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