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डॉ. जैन को मुख्यमंत्री ने सम्मानित किया

राजनांदगांव। मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल के हाथों शासकीय दिग्वजय स्नातकोतर स्वशासी महाविद्यालय के हिंदी विभाग के प्राध्यापक डॉ. चन्द्रकुमार जैन राजधानी रायपुर में सम्मानित हुए। संतों के अवदान पर अतिथि व्याख्यान के साथ-साथ डॉ. जैन ने लोक साहित्य की सामाजिक उपादेयता पर सारगर्भित व प्रेरक अतिथि व्याख्यान दिया और पूरे देश से आये विद्वानों द्वारा सराहे गए।

डॉ. जैन ने कहा कि भारत में प्राचीन काल से समृद्ध संत परंपरा चली आई है, जिससे समाज को मूल्यों और मानव कल्याण का सन्देश मिला। इस कड़ी में राजपाट और परिवार त्याग कर सत्य की खोज में निकल पड़ने वाले महात्मा गौतम बुद्ध ने समाज में अष्टांग मार्ग बताया। अचछा जीवन जीने की कला सिखायी। अहिंसा और जीव रक्षा का सन्देश दिया। इसी तरह नवजागरण के माध्यम से मनीषियों और संतों ने मानव जीवन की उन्नति के लिए अपने समाज को सही दिशा दिखायी। यही नहीं उन्होंने प्राचीन दर्शन को भी नयी दृष्टि के साथ प्रस्तुत किया। मध्ययुगीन भारत में बुद्ध, महावीर, गोरखनाथ, मीरा, रैदास, पीपाजी, रज्जब, कबीर, गुरूनानक देव, गुरू घासीदास, संत जगजीवन दास उभरकर सामने आये और मानवता के पथ प्रदीप बन गए।

विशेष चर्चा करते हुए डॉ. जैन ने कहा कि गुरू घासीदास दक्षिण कोसल अर्थात छत्तीसगढ़ क्षेत्र के जागरण काल के महत्वपूर्ण संत थे। उन्होंने मनुष्यों में भेदभाव की खिलाफत की । उन्होंने कहा कि सभी मनुष्य एक समान हैं। मनखे मनखे एक सामान। यदि किसी को उच्च या महान कहा जाता है तो यह भगवान् की सत्ता का अपमान होगा। गुरू घासीदास का अन्य महत्वपूर्ण कथन है जिसके पास अपने तथा परिवार के पालन-पोषण के लिए साल भर के अनाज की व्यवस्था है वही हमारे साथ चलें। मतलब त्याग के लिए तैयार रहें।

डॉ. जैन ने कहा कि भारत के सतनामी संतों ने समाज को सत्य मार्ग का अनुसरण कर मानव के लिए उच्च आदर्श प्रस्तुत किया है। अनेक पंथ और समुदाय के प्रवर्तक हुए जिन्होंने समाज को जगाया। भारत में लोगों को समाज में व्याप्त जड़ता, अशिक्षा, अन्धविश्वास से उबारा। दमनकारी सामंती व्यवस्था के विरूद्ध आवाज़ उठायी। मध्य काल के संतों में बहुतेरे संत ऐसे भी रहे जो सतनाम पंथ के अनुगामी थे। इसके पीछे सतमान की मानवीय भावधारा और मानव मानव के बीच एकता का प्रभाव ही सबसे बड़ा कारण था। यही कारण है कि सतनाम जीवन की गरिमा और महिमा ही नहीं, जीवन निर्माण का भी पर्याय बन गया।

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