Monday, April 22, 2024
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“दिया जलता रहा” : सामाजिक सरोकारों के रंग में रंगी काव्य संग्रह पर संदेश परक कृति

सब कुछ है भागमभाग की जिंदगी में पर वक्त नहीं… जिंदगी आज तेजी से भाग रही है। कहते हैं मुंबई चौबीस घंटे भागती है। सभी जन जिंगदगी की किसी न किसी भागमभाग में लगे रहते हैं। जिस रफ्तार से जिंदगी भाग रही है उसमें सबके लिए वक्त है पर स्वयं और परिवार के लिए ही वक्त नहीं है। भौतिकवाद के पीछे भागते व्यक्ति के पास वक्त नहीं होने से क्या क्या-क्या पीछे छूट रहा है इसको कवि महेश पंचोली ने शिद्दत से महसूस किया और रच दी एक मार्मिक कविता “वक्त नहीं”।

हाल ही में वे अपनी काव्य संग्रह कृति “दिया जलता रहा” मुझे भेंट कर गए थे। पढ़ने के लिए कृति को खोला तो उनकी वर्तमान सामाजिक परिवेश की गहराइयों से जुड़ी यह कविता सामने आई। पढ़ना शुरू किया तो शब्दों के सम्मोहन और वक्त के प्रति कवि की भावनाओं के बिंब ने मेरे मन पर ऐसा प्रतिबिंब बनाया कि एक सांस में पूरी कविता पढ़ डाली।

माता-पिता को समर्पित कृति सरस्वती वंदना से शुरू होकर 77 काव्य रचनाओं में वक्त पर लिखी प्रथम कविता है। वक्त को लेकर जिंदगी की जिद्दोंजहद को बताने में कवि सफल रहा है। देखिए बानगी…

“भौतिक वादी दुनिया में किसी को वक्त नहीं है
पैसों के लिए दौड़ रहे व्यक्ति को वक्त नहीं है
गैरों से गले मिलता पर अपनों के लिए वक्त नहीं है
जिंदगी के जोड़ तोड़ में परिवार के लिए वक्त नहीं है”

मनुष्य किस प्रकार पैसे कमाने की दौड़ में भागा जा रहा है और मतलब के लिए गैरों को गले लगाता है कि उसके अपने पीछे छूट रहे हैं। समाज के इस कड़वे सच्च की पीड़ा कवि की कविता में उभर कर सामने आती है।

आगे इसी कविता में कितना मार्मिक चित्रण है कि मौत तो बेवक्त आती है वरना मरने का भी वक्त नहीं है। कहते सुनते भी हैं , क्या करें काम ही इतना है की सांस लेने या मरने की भी फुर्सत नहीं। कवि के भाव यूं प्रस्फुटित हुए हैं….

“गप्पे लड़ता है आदमी दूसरे के दुख में जाने का वक्त नहीं है
अपनी शान शौकत में डूबा सोचने समझने का वक्त नहीं है
जिंदगी भर यूं भागता रहा ठहरने का वक्त नहीं है
मौत भी बेवक्त होती है वरना मरने का भी वक्त नहीं है”
इसी रचना में वक्त के नहीं रहते बच्चें, मंदिर और सभ्यता के पीछे छूटने का दर्द भी यूं छलकता है…
होटलों में खाना खाता पर बच्चों के लिए वक्त नहीं है
महफिलों को शान समझता मंदिर का वक्त नहीं है
नशे में बहक सकता मानव सभ्यता का वक्त नहीं है
होड़ की दौड़ में थक चुका थकान मिटाने का वक्त नहीं है

काव्य संग्रह के प्रथम काव्य सृजन के समान ही अन्य सृजित कविताएं भी सामाजिक परिवेश के ताने बाने के इर्द-गिर्द की अभिव्यक्ति में रंगी नज़र आती हैं। पुस्तक का महत्व, दहेज का दानव, नारी अत्याचार, पर्यावरण की चिंता, देश भक्ति, भ्रष्टाचार, गौ वंश की चिंता, प्रकृति के प्रति अनुराग, मां का ममत्व, श्रृंगार जैसे संदेश देती काव्य रचनाओं को कवि ने अपने नजरिए से सीधे, सरल शब्दों में अभिव्यक्ति दी है जो उनके सृजन पक्ष का वैशिष्ठय है।

नारी अत्याचार, किसान की पीड़ा और शहीद के परिवार की पीड़ा बताती “आहत मन”, मां का ममत्व और महत्व समझती कविता “मां”, बच्चे के लिए पिता का संघर्ष और उसे आसमान की ऊंचाई पर देखने की तम्मन्ना संजोए कविता “पिता”, रक्षा सूत्र की महिमा बताती कविता “रक्षाबंधन”, समाज में भाईचारा बढ़ाने का संदेश देती कविता “प्रीत”, पर्यावरण को बचाने के लिए पेड़ को नहीं काटने और हर साल नया पेड़ लगाने की सीख देती कविता “पेड़ की व्यथा”, सिमटती नदी की पुकार की पीड़ा छलकाती कविता “नदी” और अनमोल नेत्र दान को महादान बताती कविता “नेत्रदान” सामाजिक सरोकारों के रंग लिए हुए अत्यंत प्रभावी बन पड़ी है।

कृति की शीर्षक कविता “दिया जलता रहा”, जलते दिए का आंधियों से संघर्ष के रूप में समाज को एक अच्छा संदेश देने में कवि सफल रहा है। इसकी एक बानगी कवि के भावों को समझने के लिए पर्याप्त है….

उफनती रही गुस्से में धूल उड़ाते हुए
पैरों तले की धूल को सिर पर चढ़ाते हुए
इसलिए भी स्वच्छ हवा भी एक आंधी बन गई
शुद्ध करने वाली वायु मिट्टी से सन गई
जलने जलने भी बहुत फर्क होता है
ईर्ष्या से जलने वाले का जीवन नर्क होता है।

प्यार के गुण, स्वतंत्र परिंदा, हिंदी भाषा, आदमी, प्रदूषण, मैं कोन हूं, नारी, समाज के दरिंदे, चाह, आखिरी मंजिल, बचपन की यादें,दिल लगाना, शिक्षक, कह दो जमाने से, बेरोजगार की व्यथा, हार – जीत, मैंने देखा है, खिलता गुलाब, गौशाला, से लेकर मुझे कवि रहने दो तक कविताओं में कवि की कल्पना पढ़ कर ही महसूस की जा सकती हैं। अंतिम अध्यायों में 29 मुक्तक और 19 दोहों में कवि की इस विधा की बानगी भी दृष्टव्य है।

कवर पेज के प्रेम फ्लैप पर संगीत – नाटक अकादमी, नई दिल्ली के सदस्य मधु आचार्य ‘आशावादी और युवा उत्कर्ष साहित्य मंच, नई दिल्ली के राष्ट्रीय अध्यक्ष रामकिशोर उपाध्याय के अभिमत कृति के महत्व को दर्शाते हैं। वरिष्ठ साहित्यकार जितेंद्र निर्मोही और भगवत सिंह मयंक के विचार भी पुस्तक के आरंभ में कवि के काव्य शिल्प की विशेषता और मन के भावों को समझाते हैं। अंधेरे परिवेश में अंजुली में जलते दिए वाला आवरण पृष्ठ बहुत सुंदर बना है। इतनी सुंदर और अर्थ प्रधान काव्य संग्रह के लिए कवि महेश पंचोली जी को हार्दिक बधाई।
नाम : दिया जलता रहा (काव्य संग्रह)
लेखक : महेश पंचोली
प्रकाशक : ज्ञान गीता प्रकाशन, नवीन शाहदरा, दिल्ली
सहयोग : राजस्थान साहित्य अकादमी, उदयपुर
पृष्ठ : 117
मूल्य : ₹395

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