Tuesday, April 23, 2024
spot_img
Homeबात मुलाकातमानसिक स्वास्थ्य सार्वभौमिक अधिकारः डॉ.एम.एल.अग्रवाल

मानसिक स्वास्थ्य सार्वभौमिक अधिकारः डॉ.एम.एल.अग्रवाल

हम जब स्वस्थ समाज की कल्पना करते हैं ऐसे में जरूरी है को मनुष्य शारीरिक और मानसिक दोनों दृष्टि से स्वास्थ्य रहे। देखने में आता है की शारीरिक तौर पर स्वस्थ्य रहने के लिए विश्व परिपेक्ष में व्यापक जागरूकता है जब कि मानसिक स्वास्थ्य आज तक भी उपेक्षित है। मानसिक स्वास्थ्य दुरुस्त नहीं रहने पर अनेक समस्याएं जन्म लेती हैं और ऐसा व्यक्ति कई बार इतनी गंभीर स्थिति में पहुंच जाता है की वह अपनी जीवन लीला समाप्त कर लेता है। इस गंभीर विषय पर मैंने कोटा के अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विख्यात मनोचिकित्सक और अनेक मानसिक स्वास्थ्य संगठनों के पूर्व अध्यक्ष डॉ.एम.एल.अग्रवाल से साक्षात्कार लिया। साक्षात्कार के कुछ अंश यहां समाज हित के किए प्रस्तुत कर रहा हूं।

मनोचिकित्सक डॉ एमएल अग्रवाल का कहना है कि सामाजिक लांछना (सोशल स्टिगमा) एक बड़ी वजह है जिसके कारण मानसिक स्वास्थ्य के प्रति अपेक्षित जागरूकता नहीं आ रही है और इसके प्रति आमजन इतना सतर्क और चिंतित नहीं है जितना की शारीरिक स्वास्थ्य के लिए। शुरू शुरू में सभी मनोचिकित्सक अपने स्तर पर कार्य कर  रहे थे लेकिन उसके अपेक्षित परिणाम नहीं आ रहे थे। इसलिए वर्ड फेडरेशन मेंटल हेल्थ के मुख्य कार्यकारी अधिकारी सर आर. सी. हंटर की पहल पर  विश्व में 10 अक्टूबर 1991 से थीम आधारित एक समानता के साथ मानसिक स्वास्थय दिवस मनाया जाने लगा। वह बताते हैं कि समस्या हिंदी भाषा में मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता संबंधी कोई मेटर उपलब्ध नहीं होने की सामने आई। तब से प्रति वर्ष 80 से 100 पेज का हिंदी भाषा में मेटेरियल तैयार किया जाने लगा। इन्हीं के चार-पांच साल के प्रयासों का फल था कि हिंदी को मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता सामग्री में सम्मलित किया गया। ये निरंतर इस कार्य को अब तक करते आ रहे हैं। आज जागरूकता सामग्री अंग्रेजी, हिंदी, स्पेनिश और रशियन आदि भाषाओं में ऑन लाइन एवं ऑफ लाइन उपलब्ध हो कर जनजागृति के लिए उपयोग में लाई जा रही है।

उन्होंने बताया सामाजिक लांछना/अभिशाप का मुख्य कारण मानसिक स्वास्थ्य के प्रति गलत धारणा और अज्ञानता रहा, क्योंकि अधिकतर लोग सकारात्मक मानसिक स्वास्थय के बारे में समझते नहीं पाते हैं और मानसिक स्वास्थय बिमारियों के बारे में अनेक मिथ्या धारणाएं बनी हुई है। यहां तक पॉजिटिव मानसिक स्वास्थ्य की बात की जाए तो केवल बीमारी के बारे में समझते है और बीमारी की बात की जाय तो एक ही बात दिमाग में आती है पागलपन जबकि मानसिक बीमारियां अनेक प्रकार की होती हैं। केवल बीमारी का न होना अच्छे मानसिक स्वास्थ्य का द्योतक नहीं है, अपितु मानसिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति वह होता है जो की आने वाली विभिन्न परिस्थितियों में लचीलापन, तनावमुक्त रहते हुए कार्य करता है। पॉजिटिव मेंटल हेल्थ होती है व्यक्ति समाज में किस जिस तरह का व्यवहार करता है घर पर, कार्यस्थल, पड़ोस में, दीन-दुखियों के साथ इत्यादि।

वह बताते हैं मानसिक स्वास्थ्य का निर्माण एक दिन में नहीं हो सकता उसके लिए प्रारंभ से ही ध्यान रखना होगा। मानसिक स्वास्थ्य के लिए प्रसव के पूर्व, प्रसव के दौरान, प्रसव के उपरांत भी ध्यान रखना अत्यंत आवश्यक है प्रसव के पूर्व माँ के गर्भ धारण के बाद उसकी भोजन, व्यायाम, तनाव प्रबंधन व टीकाकरण का ध्यान रखने से ही बच्चे का शारीरिक व मानसिक विकास सही हो पाता है। प्रसव भी हमेशा कुशल चिकित्सक द्वारा अच्छे हॉस्पिटल में करना आवश्यक है क्योकि प्रसव के दौरान बच्चे के गले में प्लेजेंटा होने पर जैसे म्यूकस बच्चे के श्वास नली में जाने के कारण बच्चे की चीख 3 -4 मिनिट देर से निकले तो सर्कुलेशन के द्वारा आक्सीजन देर से ब्रेन में पहुंचने पर ब्रेन के न्यूरॉन्स डेमेज हो जानने पर बच्चा हमेशा के लिए मंद बुद्धि हो सकता है। प्रसव के उपरांत मानसिक स्वास्थ्य के लिए स्तनपान, बच्चे का टीकाकरण, मदर चाइल्ड रिलेशन मानसिक स्वास्थय विकास के लिए अत्यंत जरुरी है। कई बार माता को प्रसव के उपरांत डिप्रेशन या अन्य मानसिक बीमारी भी हो सकती है और वह बच्चे के स्वास्थ्य पर पूर्ण ध्यान नहीं दे पाती, जो बच्चे के मानसिक विकास में बाधक हो सकता है।

बच्चे के बड़े होने पर उसकी शिक्षा,पूर्ण टीकाकरण, खेलकूद एवं सहपाठियों का व्यवहार इत्यादि उसके मानसिक विकास पर प्रभाव डालते हैं। आजकल स्कूलों में आउटडोर गेम्स के लिए या तो मैदान नहीं होते है और होते भी है तो स्कूल प्रशासन द्वारा बच्चे पर खेलने के लिए जोर नहीं दिया जाता है। छात्र कई बार बच्चे आउटडोर गेम्स भी मोबाइल या कंप्यूटर पर खेलते हुए देखे गए है।

पढ़ाई के अलावा मोबाइल का अत्यधिक उपयोग बच्चे को इंटरनेट एडिक्शन का शिकार बना देती है जो स्वयं में एक मानसिक बीमारी है साथ ही बच्चों का टाइम मनेजमेंट बिगड जाती है जिससे पूरी नींद सही समय पर नहीं ले पाते है। नींद पूरी नहीं होने से कई शारीरिक व मानसिक स्वास्थय व्याधियां घेर लेती हैं। इंटरनेट के वजह से साइबर बुली का शिकार होने के कारण मानसिक स्वास्थय प्रभावित हो सकता है। इसमें माता-पिता की सतर्कता भी अहम भूमिका निभा सकती है। युवाओं में बढ़ती नशा प्रवति तथा अनुवांशिक कारण भी मानसिक स्वास्थय को प्रभावित कर सकते हैं, जिसकी वजह से कई बार मानसिक बीमारियों का शिकार हो सकता है।

आज भी हमारे समाज में अंध विश्वास के के कारण मानसिक बीमारियों के इलाज के लिये जादू टोना, जंतर मंतर, ताबीज-कंडे, अंगारों से जलाना, लोहे की छड़ी से जलना, मिर्च का धुंआ दे कर मरीज को शारीरिक ईलाज के नाम पर यातनाएं दी जाती है। कई बार यह भी देखा गया मरीज को चेन से पेड़ या खम्बे से बांध दिया जाता है। इसका एक उदहारण जब 2001 में तमिनलाडु के एक गांव में धार्मिक स्थल पर 250-300 मरीज को पेड़ की जंजीर से बांध रखा था, आग लगने पर वे अपनी आत्मरक्षा भी नहीं कर पाए और लगभग 30 मरीजों की मृत्यु भी हो गई थी।

जब हम मानसिक बिमारियों की बात करते है तो ज्यादातर लोग यही समझते है की व्यक्ति पागल  हो गया है, जबकि मानसिक बीमारियां अनेक प्रकार की होती है जिनमें ज्यादातर किसी प्रकार के पागलपन के लक्षण नहीं होता है। ये दो वर्गों में विभक्त की जा सकती हैं। एक वर्ग में जिन बिमारियों में दिमाग में किसी प्रकार का इन्फेक्शन, ट्रॉमा, रक्तस्त्राव या टयूमर इत्यादि होते हैं वे द्वितीय श्रेणी की मानसिक बीमारियों के लक्षण आ जाते है ऑर्गनिक कारण बन जाता है और ऐसे में इनका उपचार अत्यंत आवश्यक है। इसके लिए उपचार हेतु मल्टी स्पेशलिटी एप्रोच की आवश्यकता होती है।

दूसरे वर्ग में कार्यात्मकता (फंक्शनल) बीमारियां वो होती है जिनमे दिमाग या शरीर में किसी प्रकार की व्याधि नहीं होती फिर भी मनोवैज्ञानिक जांच के अलावा ज्यादातर जांचें नार्मल आती है। इन बीमारियों में चिंता, अवसाद, फोबिया, पीटीएसडी, ऑब्सेसिव कम्पलसिव डिसऑर्डर, कन्वर्जन डिसऑर्डर नशे की प्रवति, सेक्सुअल डिसऑर्ड, स्किज़ोफ्रेनिया डिसऑर्डर, एडजेसमेंट डिसऑर्डर, व्यवहार व मूड सम्बन्धी समस्या, भावना और सोच में परिवर्तन आदि बीमारियां इस वर्ग में आती हैं। साइकोटिक सिस्टम की वजह से उनको लोग पागलपन की संज्ञा देते हैं।

पिछले दो दशक में गहन अनुसंधान के उपरांत इन बीमारियों के कार्यस्थल पर समस्या, पारिवारिक तनाव, आनुवंशिकता कारण, दैविक प्रकोप आदि अनेक कारण सामने आए हैं। जैविक और कार्यात्मकता में मानसिक अनुसंधान संस्थान के शोध में न्यूरो ट्रांसमीटर्स (डोपामिन, सेरोटामिन, नॉरऐड्रिनैलिन) इत्यादि की मुख्य भूमिका मानी गई है। जिसकी वजह से अनेक नई दवाइयों का शोध हो पाया है और मानसिक बिमारियों के ईलाज में क्रांतिकारी बदलाव आया।

उन्होंने बताया कि 1950 में विश्व में सर्वप्रथम दावा एंटी साइकोटिक दवाई आई थी जब की वर्तमान में बहुत सारी अच्छी अच्छी दवाइयां उपलब्ध है। पहले मरीज के इलाज का उद्देश्य को बीमारी के लक्षण मुक्त करना होता था। जिससे परिवार वालों को डिस्टर्ब नहीं करे धीरे धीरे वह परिवार पर निर्भर बन जाता था। जब की आज के इलाज का उद्देश्य शीघ्र से शीघ्र परिवार के लिए उपयोगी सदस्य बनाना होता है। जिससे देश के लिए भी उत्पादन करने वाले नागरिक बन सकें न कि दूसरे पर आश्रित रहे।

आधुनिक युग में मानसिक बीमारी ईलाज के लिए दवाइया टेबलेट व सिरप के रूप में, इंजेक्शन, डिपो इंजेक्शन  में उपलब्ध है, साथ ही विविध प्रकार की थेरेपी उपलब्ध हैं। एक और महत्वपूर्ण तथ्य है की बिजली का इलाज (सीईटी) को लोग आज भी शॉट के रूप में समझते है क्योंकि हमारे सिनेमा और टीवी सीरियल्स में इसको गलत रूप से प्रस्तुत किया किया जाता है, जो सामाजिक अभिश्राप को बढ़ाता है। जबकि वास्तव में सीईटी के इलाज में मरीज को किसी प्रकार की तकलीफ या नुकसान नहीं होता है, क्योंकि मरीज को पहले से शार्ट एक्टिंग, बेहोशी इंजेक्शन, मस्कुलर रेलेएक्ससेंट दे दिया जाता है इसके उपरांत आक्सीजन दी जाती है। मरीज को किसी प्रकार का पेन या झटके नहीं आते। बिजली का इलाज देने वाली मशीन भी में कंप्यूटराइड हो गई है जिससे प्रत्येक मरीज को आवश्यकतानुसार 1 या 1.5 सेकंड के लिए सेक करती है मरीज को होश आने पर आक्सीजन बंद करके मरीज को ओब्जेर्वेशन में रख कर बेड पर शिफ्ट कर दिया जाता है। आरटीएमएस का डिप्रेशन, ऑब्सेसिव कम्पलसिव डिसॉर्डर में अच्छा रेस्पॉन्स आता है। डीप ब्रेन स्टूमिलेशन की सुविधा भी कुछ सेंटर्स पर भी उपलब्ध है।सीईटी इलाज के अलावा मैग्नेटिक शॉट थेरेपी भी होती है,जो हमारे देश उपलब्ध नहीं है।

उन्होंने अपील की है कि मानसिक रोगी के लक्षण पहचान कर समय रहते मरीज को उपयुक्त चिकित्सक को दिखा कर ईलाज जल्दी शुरू करने व डॉक्टर के अनुसार समय पर नियमित इलाज देने से मरीज की रिकवरी शीघ्र व पूर्ण रूप से सही होती है। कभी भी अपने अनुसार दवाई कम या ज्यादा नहीं करनी चाहिए, इससे बीमारी रिलैप्स हो जाती है। देरी से इलाज चालू करने की वजह से ईरिवर्सेबल चेंज आते हैं जिससे मरीज को ज्यादा फायदा नहीं होता है।

image_print

एक निवेदन

ये साईट भारतीय जीवन मूल्यों और संस्कृति को समर्पित है। हिंदी के विद्वान लेखक अपने शोधपूर्ण लेखों से इसे समृध्द करते हैं। जिन विषयों पर देश का मैन लाईन मीडिया मौन रहता है, हम उन मुद्दों को देश के सामने लाते हैं। इस साईट के संचालन में हमारा कोई आर्थिक व कारोबारी आधार नहीं है। ये साईट भारतीयता की सोच रखने वाले स्नेही जनों के सहयोग से चल रही है। यदि आप अपनी ओर से कोई सहयोग देना चाहें तो आपका स्वागत है। आपका छोटा सा सहयोग भी हमें इस साईट को और समृध्द करने और भारतीय जीवन मूल्यों को प्रचारित-प्रसारित करने के लिए प्रेरित करेगा।

RELATED ARTICLES
- Advertisment -spot_img

लोकप्रिय

उपभोक्ता मंच

- Advertisment -spot_img

वार त्यौहार