Saturday, June 15, 2024
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मीडिया कितना बिकाऊ है?

मीडिया के सदस्य उसी हद तक बिकाऊ हैं जिस हद तक अन्य संस्थाओं के सदस्य।…यदि हमारा मीडिया अपने पर छोड़ दिया जाए तो अभी भी बिकाऊ नहीं है। सभी अखबारों, चैनलों में परिश्रम और सत्यनिष्ठा से काम करने वाले पत्रकार भी हैं। समाचारों को कुछ मतवादी झुकाव, बनाव-छिपाव करने के सिवा, अच्छे संस्थानों के अधिकांश पत्रकार गड़बड़ नहीं करते। पर यदि राजनीतिक वर्ग ही अपने बल का उपयोग मतवादी या धंधेबाज किस्म के पत्रकारों को बढ़ाने और मीडिया मालिकों पर दबाव देने में करे तो मूल दोष उस का है। तब इस उस पत्रकार को चुनकर निशाना बनाना राजनीतिक ही माना जाएगा।

कभी कहा जाता था कि साहित्य समाज का दर्पण है। समाज में राजनीतिक, सांस्कृतिक, मीडियाकर्मी, आदि सब हैं। आज साहित्य तो सिमट कर शून्यप्राय हो चला है। अभी पंत या निराला भी अवतरित हो जाएं तो उन्हें सहृदय पाठक तक पहुँचने के लिए कोई स्थान शायद ही मिले। ले-देकर मीडिया बचा है। अखबार, टीवी चैनल, व सोशल मीडिया। यही आज हमारा समाज-दर्पण है।

अब दर्पण तो स्वयं कुछ नहीं बनाता। जो है, उस का प्रतिबिम्ब ही उस में दिखेगा। आज दलीय राजनीति तथा सुरसा समान बढ़ते राज्य-तंत्र ने अधिकाधिक स्थान घेर लिया है। इस से मीडिया भी मुक्त नहीं रह सका। यह स्वत: या एकाएक नहीं हुआ है।

स्वतंत्र होते ही भारतीय नेताओं ने शासन चलाना दोयम-सा मान कर अपनी झक फैलाना, अपना स्थाईत्व, अपनी पूजा-प्रसिद्धि को पहला अघोषित काम मान लिया। कुछ को सचमुच विश्वास था कि वही देश-हित में भी है। तब समाजवाद नामक छतरी-विचार में वह सब अघोषित काम आ जाते थे। चूँकि नेहरू प्रथम प्रधानमन्त्री बने, जल्दी ही निष्कंटक प्रमुख हो गये, और समाजवादी थे, इसलिए पूरा देश समाजवाद का चाहे-अनचाहे अनुगामी बना। समाजवाद की एक विशेषता उस के राज्य-तंत्र का क्रमशः बढ़ता आकार है। दूसरी विशेषता वैचारिकी व शिक्षा पर एकाधिकारी नियंत्रण की प्रवृत्ति। फलत: तीसरी चीज उस में स्वत: आ जाती है – मनमानी और भ्रष्टाचार।

हर समाजवादी देश के राज्य-तंत्र में सर्वाधिक भ्रष्टाचार रहा है। भारत में भी शीघ्र इस का प्रसार हुआ। जबकि यहाँ ब्रिटिश राज में ऊपर से नीचे तक सभी अंग्रेज अधिकारी एवं निम्नतम कर्मचारी तक अपने वेतन के सिवा कोई निजी स्वार्थ नहीं जानते थे (इसीलिए ब्रिटिश काल में भी भारतीय कर्मचारियों पर प्रजा का कम विश्वास था)। इस के विपरीत, भारतीय राज में ऊपर से नीचे तक अधिकांश अधिकारियों में कुछ ‘अपना’ हित रखने-साधने की भावना फैलती गई। मानो सरकारी काम-काज एक अलग हित है, और मंत्री से लेकर क्लर्क तक का – सरकारी काम में भी – एक अलग ‘अपना’ हित भी है। इस ने प्रकारान्तर अनुत्तरदायी निर्णयों, कामचोरी, और आर्थिक भ्रष्टाचार को भी एक मौन स्वीकृति दे दी। आर्थिक भ्रष्टाचार चलने देने की ओट बस यह रही कि यह गुपचुप रहे। पर यह गतिविधि गुपचुप भी व्यापक होते जाने के कारण स्वत: सर्वविदित है।

तो, स्वतंत्र भारत का आम राजनीतिक व्यवहार ऐसा बना। फलत: तीन दशक बीतते-बीतते हाल वह हो गया जिस के असंख्य प्रमाण-उदाहरण ”मित्रोखिन आर्काइव्स २: द केजीबी एंड द वर्ल्ड” (2014) पुस्तक में देख सकते हैं। भारत संबंधित केजीबी की सभी गतिविधियों, संपर्कों, दस्तावेजों, नोट्स, आदि को व्यवस्थित करते हुए केजीबी के अभिलेखागार अधिकारी वसीली मित्रोखिन को किसी रूसी अफसर की यह टिप्पणी मिली थी, “लगता है, यह पूरा देश ही बिकने लिए तैयार है”। इतनी बड़ी संख्या में यहाँ नेता, अफसर, प्रोफेसर, पत्रकार, आदि केजीबी को सूचनाएं देने और ईनाम की लालसा रखते मिले! यह 1970-80 वाले दशकों की बात है। यदि उस पुस्तक के विवरण असत्य होते, तो भारतीय नेता उस के विरुद्ध नालिश या आपत्ति कर सकते थे। पर सभी दलों के महानुभावों ने चुप रहने में ही भलाई समझी।

यदि लगे, कि मित्रोखिन को मिले कागजों में बढ़ी-चढ़ी बात हो सकती है, तो भारतीय साक्ष्य भी देख लीजिए। प्रसिद्ध अकादमिक अंग्रेजी पत्रिका ‘सेमिनार’ की संस्थापक राज थापर ने अपने संस्मरणों “ऑल दीज इयर्स” (1991) में वैसी ही अनेक बातें प्रत्यक्ष अनुभवों से लिखी है। थापर दंपति बड़ी ऊँची हैसियत वाले वामपंथी थे। इंदिरा गाँधी के पारिवारिक मित्र जैसे भी थे। एक बार राज के पति रोमेश थापर के कार्यालय में किसी कम्युनिस्ट देश का राजनयिक आया और धंधे-पानी की पेशकश की। इस पर रोमेश थापर ने नाराज होकर उसे फटकारा। तब उस राजनयिक को यह नहीं लगा कि थापर ईमानदार हैं, बल्कि यह कि उन्हें दूसरे पक्ष (सीआईए) ने पहले ही खरीद रखा है! राज थापर ने केजीबी की पँहुच प्रधानमंत्री निवास तक होने की बात लिखी है। और यह भी, कि विभिन्न विपक्षी दलों के नेता भी रूसी हमाम में नंगे थे।

आज स्थिति कितनी बदली है, यह अधिक अनुमान का विषय नहीं। देश के अंदर ही नेताओं के बीच संगठित भ्रष्टाचार पर एक तरह की सहमति-सी है। राजनीतिक दलों के आय-व्यय को पारदर्शी करने की माँग कोई नहीं करता। ‘सूचना के अधिकार’ से राजनीतिक दलों को बाहर रखा गया है, जो पूरी सत्ता पर काबिज हैं। पार्टी और सरकार का भेद हर कहीं, हर स्तर पर मिटाया-सा जा रहा है। कोई राजकीय पदधारी नेता सदैव पार्टी काम में मशगूल रहें तो इसे अनुचित नहीं समझा जाता, जबकि उन का वेतन, सुविधा, स्टाफ, आदि केवल राजकार्य के लिए है। नेता सुप्रीम कोर्ट में बाकायदा कहलवाते हैं कि ‘राजनीतिक दलों को कहाँ से धन आया यह जानने से किसी को क्या मतलब’! यह लज्जाजनक स्थिति कानून, न्यायालय, जाँच एजेंसी, आदि का विशाल, खर्चीला तंत्र रखते हुए है!

यदि समाज की स्थिति यह है, तो दर्पण को क्या दोष देना? जब विधायिका ने ही तय किया कि अमुक वर्ष के पहले या बाद किसी विदेशी स्रोत से राजनीतिक दलों को मिले धन की जाँच नहीं होगी, तो वही छूट किसी मीडिया संस्था को क्यों न हो! आखिर जो अधिकार विधायिका, कार्यपालिका, और न्यायपालिका के सदस्य अपने लिए मानते हैं – वही अधिकार उद्योग, व्यवसाय, मीडिया, आदि के सदस्यों को भी है। संविधान ने देश के सभी नागरिकों को समान रखा है। मूलभूत अधिकार और कर्तव्य समान हैं। जो विशेष अधिकार किसी पद को है, वह किसी काम के लिए। न कि इसलिए कि वे जज, मंत्री, या विधायक के रूप में अन्य नागरिकों से ऊपर हैं। नैतिकता ही नहीं, कानून भी सब के लिए समान है। यदि ऐसा न होता तो इलाहाबाद हाईकोर्ट में इंदिरा गाँधी वह मुकदमा नहीं हारी होतीं।

सो, मीडिया के सदस्य उसी हद तक बिकाऊ हैं जिस हद तक अन्य संस्थाओं के सदस्य। बल्कि, ब्रिटिश राज और स्वदेशी राज के प्रभुओं, अधिकारियों की नैतिक तुलना दर्शाती है कि विभिन्न संस्थाओं में भ्रष्टाचार में वृद्धि का सीधा संबंध राज्य-तंत्र के ऊपरी हिस्सों की गुणवत्ता एवं मानसिकता से है।

यदि हमारा मीडिया अपने पर छोड़ दिया जाए तो अभी भी बिकाऊ नहीं है। सभी अखबारों, चैनलों में परिश्रम और सत्यनिष्ठा से काम करने वाले पत्रकार भी हैं। समाचारों को कुछ मतवादी झुकाव, बनाव-छिपाव करने के सिवा, अच्छे संस्थानों के अधिकांश पत्रकार गड़बड़ नहीं करते। पर यदि राजनीतिक वर्ग ही अपने बल का उपयोग मतवादी या धंधेबाज किस्म के पत्रकारों को बढ़ाने और मीडिया मालिकों पर दबाव देने में करे तो मूल दोष उस का है। तब इस उस पत्रकार को चुनकर निशाना बनाना राजनीतिक ही माना जाएगा।

वस्तुत: मीडिया या राजनीतिक दलों को विदेशी या देशी उत्कोच की काफी सफाई हो सकती है, यदि विधायिका चाहे। पर क्या वह ऐसा करना चाहती है? क्या वह ऐसा करने के लिए स्वतंत्र भी रह गई है (यद्यपि संविधान ने विधायिका को न्यायपालिका से भी बढ़कर स्वतंत्र हैसियत दी थी)?

यदि इस प्रश्न का उत्तर एक मौन है, तो बेचारे इक्के-दुक्के वामपंथी पत्रकारों को प्रताड़ित करके हमारे कर्णधार अपने विरुद्ध ही वातावरण बनाएंगे। चाहे उन्हें आभास हो या नहीं। पारंपरिक कारणों से भारत के जनगण की चेतना यूरोप, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया के जनगण की चेतना की तुलना में अधिक समृद्ध और स्वतंत्र है। इसलिए, मनमानी करने वाले राजनीतिक प्रभुओं को सावधान रहना चाहिए। बाकी, रामजी की इच्छा!

(लेखक के बारे में हिन्दी लेखक और स्तंभकार। राजनीति शास्त्र प्रोफेसर। कई पुस्तकें प्रकाशित, जिन में कुछ महत्वपूर्ण हैं: ‘भारत पर कार्ल मार्क्स और मार्क्सवादी इतिहासलेखन’, ‘गाँधी अहिंसा और राजनीति’, ‘इस्लाम और कम्युनिज्म: तीन चेतावनियाँ’, और ‘संघ परिवार की राजनीति: एक हिन्दू आलोचना’।)

साभार- https://www.nayaindia.com/ से

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