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लहर नहीं ज़हर हूँ मैं, गुर्दों पर गिरता कहर हूँ मैं

पेप्सी बोली सुन कोका कोला !
भारत का इन्सान है बहुत भोला।

विदेश से मैं आयी हूँ,
साथ में मौत को लायी हूँ ।

लहर नहीं ज़हर हूँ मैं,
गुर्दों पर गिरता कहर हूँ मैं ।

मेरी पी.एच. दो पॉइन्ट सात,
मुझ में गिरकर गल जायें दाँत ।

जिंक आर्सेनीक लेड हूँ मैं,
काटे आतों को, वो ब्लेड हूँ मैं ।

हाँ दूध मुझसे सस्ता है,
फिर पीकर मुझको क्यों मरना है ।

540 करोड़ कमाती हूँ,
विदेश में ले जाती हूँ ।

मैं पहुँची हूँ आज वहाँ पर,
पीने को नहीं पानी जहाँ पर ।

छोड़ो नकल अब अकल से जियो,
और जो कुछ पीना संभल के ही पीयो ।

बच्चों को यह कविता सुनाओ,
स्वदेशी अपनाओ, देश बचाओ ॥

(इसको आगे भेजते जाइये,
भारत के भविष्य को संवारिये ॥)

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