Thursday, June 13, 2024
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इस चौपाल में बरसता है कला,संस्कृति और साहित्य का रंग और संगीत का जादू

(मुंबई की चौपाल अपने आप में अनूठी है। कला, साहित्य, संस्कृति, थिएटर, शास्त्रीय संगीत से लेकर हर विधा पर चौपाल में चर्चा होती है। सुधी श्रोताओं के साथ ही अपने अपने क्षेत्र के दिग्गज वक्ता आकर चौपाल को समृध्द करते हैं। पिछले साल चौपाल अपनी रजत जयंती मना चुकी है और महीने भर बाद ही 26 साल पूरे करने वाली है। इस चौपाल की खासियत यह है कि इससे हर क्षेत्र के कई नामी हस्ताक्षर जुड़े हैं जिनमें गुलजार साहब , लेकर जाने माने रंगकर्मी अतुल तिवारी, आधुुनिक ऋषि एवँ कबीर, तुलसी और विवेकानंद जैसे एकल कार्यक्रमों से देश और दुनिया में एक विशिष्ट पहचान बनाने वाले पद्मश्री शेखर सेन, चाणक्य के डॉ. चन्द्रप्रकाश द्विवेदी, जाने माने अभिनेता राजेन्द्र गुप्ता, विष्णु शर्मा और चौपाल के रसिकों के लिए रसभरे व्यंजनों से अतिथि सत्कार करने वाले अशोक बिंदल जी, कविता जी गुप्ता दिनेश जी गुप्ता सहित कई नाम हैं। हर बार चौपाल एक नए और अनूठे विषय पर होती है। चौपाल तीन से चार घंटे तक चलती है और श्रोता भी पूरे समय मौजूद रहकर इसका रसास्वादन करते हैं। चौपाल कभी भुवंस के अंधेरी स्थित परिसर में तो कभी कविता जी और दिनेश जी के घर होती है। चौपाल कला साहित्य और संस्कृति की धारा से जुड़ा एक पारिवारिक आयोजन है ।
 
पिछली कई चौपालों में ये अनुभव हुआ कि चौपाल से नए लोग तो लगातार जुड़ रहे हैं लेकिन पुराने लोगों की कमी लगातार खलती जा रही है। जो लोग चौपाल के लिए पूरे महीने इंतजार करते थे वे अचानक ओझल से होते जा रहे हैं।
 
इस बार चौपाल में रंगमंच और शास्त्रीय गायन की विभिन्न विधाओं के कई खूबसूरत रंग देखने को मिले। विविध भारती के जाने माने उद्घोषक यूनुस खान ने अपने कुशल संचालन से अलग -अलग कार्यक्रमों को एक कड़ी में खूबसूरती से पिरोया और श्रोताओं व मंच के कलाकारों के बीच एक रोमांचक तादात्म्य स्थापित किया। मंच और प्रेक्षकों के बीच युनुस खान की दमदार आवाज़ एक जादुई एहसास जगाती रही। चौपाल पर यूनुस खान की ये रिपोर्ट आपको चौपाल की जादुई सैर करा देगी। )

चौपाल के रजत जयंती उत्सव की यू ट्यूब लिंक

 

चौपाल का फेसबुक पेज

https://www.facebook.com/Chaupaal

चौपाल की कुछ यादगार रिपोर्ट 

‘चौपाल’ अपनी अनूठी प्रस्तुतियों के लिए जानी जाती है। बीते कई सालों में कई ऐसी चौपाल हुई हैं जिन्‍हें लोगों ने बरसों-बरस याद रखा। बीते रविवार यानी 19 मई को एक ऐसी ही चौपाल हुई जिसमें नाटक और विभिन्न भाषाओं के नाट्य-संगीत का ऐसा विलक्षण जमावड़ा हुआ कि इसकी गूंज लंबे समय तक सुनाई देने वाली है।

पहले खंड का आरंभ हुआ फणीश्व‍वरनाथ रेणु की कहानी पर आधारित नाटक ‘पंचलाइट’ से। ‘पंचलाइट’ कहानी रेणु के संग्रह ‘ठुमरी’ में संग्रहीत है। इस नाटक का निर्देशन राकेश साहू ने किया। दो दर्जन से अधिक कलाकारों के अभिनय से सज़ा यह नाटक कई सवाल उठाता है। यह जातीय भेदभाव, अमीर और ग़रीबों के बीच की खाई, नई तकनीक से जुड़े कौतुहल, प्रेम और समाज में उसके विरोध, फिल्‍मी-गीतों को लेकर उस समय के समाज के फैली वितृष्‍णा, पंचायत से जुड़े रसूख़दार लोगों की चालबाजियों पर गहरी चोट करता है। राकेश ने इस नाटक का निर्देशन बड़ा सूझबूझ से भरा किया है। नाटक को बहुत संगीतमय रखा गया है। ख़ासतौर पर मेले का दृश्य तो क्‍या ख़ूब बन पड़ा है। कुछ ऐसे कलाकार थे जिन्‍होंने एक से ज़्यादा भूमिकाएं कीं और क्‍या ख़ूब कीं। ‘पंचलाइट’ ने चौपाल में जो समां बांधा कि पूछिए मत। राकेश और उनकी टोली इसके लिए बधाई की पात्र है।

इस बार चौपाल में नाटक के साथ जो सबसे बड़ा फ़ोकस था वो था नाट्य-संगीत पर। यह शायद इतिहास में ऐसा पहला और विलक्षण आयोजन था जिसमें हिंदी, गुजराती और मराठी नाट्य-संगीत की एक ही मंच पर बात की गयी। और कुछ कालजयी नाटकों के नाट्य-संगीत को पेश भी किया गया। मराठी नाट्य-संगीत के लिए मंच पर आईं जानी-मानी गायिका तेजस्विनी इंगले। हिंदी और मराठी फ़िल्‍मों और नाटकों में गीत गा चुकी तेजस्विनी एक माहिर गायिका हैं। संचालक ने बताया कि उनकी यात्रा ‘आविष्कार’ समूह के साथ शुरू हुई और वो डेढ़ सौ से ज़्यादा नाट्य-संगीत प्रस्तुतियां दे चुकी हैं। तेजस्विनी ने बताया कि मराठी संगीत-नाटकों का आरंभ नांदी से होता है जो एक तरह से आराधना का गीत है। उन्‍होंने अपनी प्रस्‍तुति की शुरूआत नाटक ‘मानापमान’ की नांदी ‘नमन नटवरा विस्मयकरा’ से की। संचालक यूनुस ख़ान ने बताया कि यह नाटक कृष्‍णाजी प्रभाकर खाडिलकर ने लिखा था। और इसकी पहली प्रस्‍तु‍ति सन 1911 में हुई थी। इस नाटक में महान कलाकार बाल गंधर्व ने काम किया था।

 

इसके बाद तेजस्विनी ने मानापमान का ही एक गीत ‘युवती मना’ प्रस्‍तुत किया। तेजस्विनी ने जो तीसरा गीत प्रस्‍तु‍त किया वो स्‍वातंत्र्यवीर सावरकर के लिखे नाटक ‘सन्‍यस्‍त खड्ग’ से था। इसके बोल थे ‘मर्मबंधातली ठेव ही’। इसके बाद जो गीत आया उसने तो जैसे समां ही बाँध दिया। मराठी के बहुत ही प्रसिद्ध नाटक ‘कट्यार काळजात घुसली’ का गीत ‘सूरत पिया की’ जिसका संगीत पंडित जीतेंद्र अभिषेकी ने दिया था। और इसे नाटक में वसंत राव देशपांडे ने गाया था। इस गीत की हर पंक्ति में अलग अलग राग और ताल में भी बदलाव होते हैं। तेजस्विनी ने बताया कि इसमें राग सोहनी, मालकौंस, चंद्रकौंस और वृंदावनी सारंग राग बारी-बारी से आते हैं। इसके बाद नाटक ‘ययाति आणि देवयानी’ से दो गीत प्रस्‍तुति किये गये और इस रसपूर्ण प्रस्‍तुति ने दर्शकों का मन मोह लिया। हॉल देर तक तालियों की गूंज से भरा रहा।

यह पहला मौक़ा था जब मुंबई में किसी मंच पर मराठी गुजराती और हिंदी नाटकों का संगीत प्रस्तुत किया जा रहा था। इसके बाद आई बारी गुजराती नाट्य संगीत की। जिसके लिए मंच पर आए गुजराती के जाने माने नाट्य कलाकार उत्कर्ष मजूमदार। उनके साथ पग पेटी पर जाने-माने संतूर वादक और पेशे से सीए—स्‍नेहल मजूमदार जो गुजराती साहित्य अकादमी के चेयरमैन भी हैं। हेमांग व्यास तबले पर थे। और गीत तथा अभिनय प्रस्तुतियों में उत्कर्ष का साथ दिया मंजरी मजूमदार ने। जो गायिका, अभिनेत्री तो हैं ही पेशे से डॉक्‍टर हैं। उत्कर्ष मजूमदार ने बताया कि किस तरह गुजराती नाटकों का आविर्भाव पारसी रंगमंच से हुआ। उन्‍होंने गुजराती संगीत नाटकों का दिलचस्प इतिहास भी बताया और ‘जूनी रंगभूमि ना गीतो’ भी प्रस्‍तुत किए। सैकड़ों साल पुराने इन गीतों को लोगों ने बड़ी दिलचस्पी से सुना। तकरीबन पैंतालीस मिनिट की इस प्रस्‍तुति में उत्कर्ष ने दर्शकों को बांधकर रखा। चौपाल में उत्कर्ष मजूमदार पहले भी गुजराती रंगमंच से जुड़ी दिलचस्प बातें बता चुके हैं। ख़ासतौर पर विश्व रंगमंच दिवस पर कोरोना समय से ठीक पहले। लेकिन इस बार उन्‍होंने बाक़ायदा सही वेशभूषा और मेकअप के साथ गुजराती नाट्य-गीतों की अद्भुत छटा बिखेरी।

तीसरी पेशकश थी हिंदी नाट्य-संगीत की। और इसके लिए चौपाल में आमंत्रित किया गया था जाने-माने संगीतकार और संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित आमोद भट्ट को। आमोद ने बरसों बरस बी वी कारंत के साथ नाटकों में काम किया है। संगीत तैयार किया है। उनके पास बड़ा वृहद अनुभव है तरह तरह के नाटकों के गीतों का। आमोद के साथ थी नाटक कलाकारों की एक बड़ी टोली—जो गीतों को लेकर हाजिर थी।

आरंभ किया गया गिरीश कार्नाड के नाटक ‘हयवदन’ की एक बहुत ही नाटकीय गणपति वंदना से—‘नमो नमो हे गजवदन’। देश की जानी-मानी रंग हस्ती श्री बी वी कारंथ ने इसे कंपोज़ किया था। बाबा कारंत आमोद भट्ट और शुभाश्री भट्ट के रंग गुरु भी रहे हैं। दिलचस्प बात ये थी कि यह प्रस्तुति रंगमंडल भारत भवन भोपाल में 1984 में तैयार की गयी थी।
इसके बाद एक और बहुत ही शानदार गीत आया ‘सावन के झूले खेत्ता’। ये गीत लोर्का के लिखे नाटक येर्मा में शामिल था जिसे “माटी” नाम से खेला गया। आमोद भट्ट ने अपनी इस पेशकश में गुलज़ार के लिखे चंद गीत भी पेश किए। जैसे ‘कायनात, बस चंद करोड़ों सालों में’। इसके अलावा ‘मॉनसून की सिम्‍फ़नी’। ये सलीम आरिफ के नाटक ‘अठन्‍नी मुंबई महानगर की’ में शामिल गीत था। और बहुत ही बेमिसाल गीत है बारिश के बारे में।

आमोद और उनकी टोली ने नाटक हयवदन का एक और गीत सुनाया—‘लोई लोई’। और नाटक ‘अंधा युग’ का गीत—‘आसन्न पराजय वाली इस नगरी में’। अंधा युग का एक और अद्भुत गीत पेश किया गया—”रूद्र देव कापालिक भैरव”।

इस टोली का पेश किया गया एक बहुत ही दिलचस्प गीत था चौपाली अतुल तिवारी के नाटक ‘ताऊस चमन की मैना’ से। ये गीत था ‘फ़लक आरा की शहज़ादी’।

इस पेशकश के आखिर में नाटक ‘महारास’ का एक कमाल का गीत पेश किया गया—‘पूर्ण चंद्र शरत रात, जमुना तट आधी रात’। डॉ पुरूषोत्‍तम चक्रवर्ती ने इसे लिखा है।
और इस तरह एक ऐतिहासिक चौपाल का अंत हुआ। एक ऐसी विलक्षण चौपाल जिसमें ना केवल नाटक शामिल था बल्कि हिंदी, मराठी और गुजराती तीनों भाषाओं के नाट्य-गीतों की प्रस्‍तुति एक ही मंच पर एक साथ की गयी। कार्यक्रम का संचालन कर रहे उद्घोषक यूनुस ख़ान ने बताया कि ऐसा बरसों-बरस में पहली बार हुआ है जब तीनों भाषाओं के नाट्य-संगीत को एक ही मंच पर ला खड़ा किया गया हो। और इतने दिग्‍गज कलाकारों ने अपनी प्रस्‍तुति दी हो। मुंबई में हिंदी, गुजराती और मराठी नाट्य-कर्म तो निरंतर जारी है। पर इन तीनों भाषाओं का नाट्य-संगीत कभी एक मंच पर पेश नहीं किया गया।

चौपाल का यह अद्भुत प्रयास था जो पूरी तरह से सफल रहा।

उन लोगों के लिए अफसोस जो जीवन की व्यस्तताओँ गर्मी के थपेड़े या आलस के झोंके में पहुंच नहीं सके। या जिन्हें लगा कि क्षेत्रीय भाषाओं की इस प्रस्तुति में पता नहीं कुछ दिलचस्प भी होगा या नहीं। पर जिन्होंने यह चौपाल मिस की उन्होंने जीवन का एक चमकीला और यादगार दिन मिस कर दिया।

 

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