Thursday, June 13, 2024
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जीवन के हर रंग में रंगी हैं डॉ.शबाना ‘ सहर ‘, की ग़ज़ले और नज्में

ग़म, तन्हाई, दर्द, ग़ुस्सा,
छोड़ ये बातें, भूल ये क़िस्सा।
डॉ.शबाना ‘ सहर ‘ की अदबी ज़िन्दगी का आगाज़ इस शैर से होता है। ये एक ऐसी ग़ज़ल कार और शायरा हैं जिनकी ग़ज़लों और नज़्मों में जहां एक तरफ वक़्त की कड़वाहटें, परेशानियाँ, हिज्र, विसाल, बेचैनियाँ, तन्हाई का ज़िक्र मिलता है वहीं दूसरी तरफ तक्लीफों से लड़ने, टकराने का हौंसला और जज़्बा भी देती हैं। भाईचारे और कौमी एकता का संदेश भी देती हैं गजलें । इनकी ग़ज़ल के चंद अशआर की बानगी देखिए…………..
ज़रा घायल हुआ तो क्या, अभी तक जान बाक़ी है
परिंदा फड़फड़ाता है, अभी उड़ान बाक़ी है
परों को खोलकर, मैंने अभी उड़ना सीखा है
अभी तो नापने को सारा आसमान बाक़ी है।

इनकी नज्मों में दोस्ती व भाईचारे का संदेश भी बखूबी दिया गया हैं। आपसी और राष्ट्रीय एकता का पैगाम देती इनकी नज़्में, धर्म के रंगों से दूर मुहब्बत के रंगों से रंगी हुई हैं जिन्हे पढ़कर आप भी उन्हीं मोहब्बत के रंगों में रंग जाएंगे। इनकी नज़्म ‘आई होली’ और ‘होली के रंग’ ऐसे ही भावों का संदेश देती है…………….
हर सूँ खुशियां आई जैसे,
या आई बहार, आई होली, साथ में लाई,
रंगों की बौछार,
सब का दिल है झूम रहा,
सब हैं खोए मस्ती में,
रंग लगा है हर एक दिल पर,
रौनक हुई है बस्ती में,
प्यार भरा है हर एक दिल में, ये है ऐसा त्यौहार,
आई होली साथ में लाई,
रंगों की बौछार।

रचनाकार उर्दू और हिंदी में ग़ज़ल, नज्म, गीत, क़तअ लिखती हैं। वर्तमान परिपेक्ष पर ग़ज़लें और नज़्में करुण रस, शान्त रस, वात्सल्य रस, श्रृंगर रस से ओतप्रोत हैं। इनकी करूण रस की ग़ज़लों और नज़्मों में प्रेम पात्र का चिरवियोग, सामाजिक दुःख-शोक, जुदाई, आदि का वर्णन है जो वियोग की भावना को दर्शाता है। शान्त रस की ग़ज़लें और नज़्में परमात्मा से आत्मिक जुड़ाव और सांसारिक लालसा से दूरी जैसी भावनाओं की तरफ इशारा करती हैं। श्रृंगार रस की ग़ज़लों और नज़्मों में नारी की समाज में स्थिति, नारी के साथ समाज द्वारा अपनाया जाने वाला दोहरा रवैया एवं नारी-सौंदर्य का बोध होता है। वात्सल्य रस की ग़ज़लों और नज़्मों में अनुराग का भाव दिखाई देता है। इसके अलावा वर्तमान परिपेक्ष की गजलों में राजनीतिक, सांस्कृतिक, सामाजिक, दुश्वारियाँ और कुरीतियों का चित्रण किया गया है जो समाज को जाग्रत करने और फ़िक्र करने का संदेश देता है।

इनके ग़ज़ल संसार के आईने में सामाजिक, राजनीतिक, पारिवारिक, निजी ज़िन्दगी से जुड़ी समस्याएं , इश्क़, हिज्र, विसाल, बेवफाई, तन्हाई, बेचैनी, माज़ी के पल, हौसला, ख़्वाबों का टूटना, फ़लसफ़ा ख़ुदी, जिम्मेदारियों का बोझ सभी का अक्स उभर कर सामने आता है। सियासी मसले पर ग़ज़ल के ये चन्द अशआर देखिए…………….
तुम अपने ज़ुल्म से कब तक सताओगे डराओगे
ग़लत मन्सूबे लेकर कब तक हमको लड़ाओगे।
यहाँ पर गूंजती मन्दिर और मस्ज़िद की सदाएँ है।
हवाओं में घुली आवाज़ों को कैसे मिटाओगे ?

मोहब्बत के बाद की तन्हाई, बेबसी, बेचैनी को इन्होंने शब्दों की मणिमाला में मोतियों की तरह इस प्रकार पिरोया है, ग़ज़ल के चन्द अशआर देखिये……………..
गूँज रही है मुझ में कितनी तन्हाई
मेरे अंदर पसरी कितनी तन्हाई
तन्हाई के पार है कितना शौर ओ ग़ुल
शौर ओ ग़ुल के पार है कितनी तन्हाई
जीने की रस्म बारहा निभाती रही हूँ मैं
सीने पर ग़म का बोझ उठाती रही हूँ।
ख़ुशियों के फूल चुनती रही बांटती रही
दामन में अपनी ख़ार सजाती रही हूँ मैं।
एक याद थी जो जान में कुछ ऐसी बस गई
हर लम्हा अपनी जान से जाती रही हूँ मैं।

शायरी इनकी ज़िन्दगी की आवाज़ और टूटे हुए दिल का साज़ है। ग़ज़लें और नज़्में हयात और कायनात के राज़ खोलती हैं और ज़िन्दगी की हक़ीक़त से पर्दा उठाती हुई नज़र आती हैं, जिन्हें इन्होंने लफ़्ज़ों का जामा पहना कर शैर के क़ालिब में ढाला है। उद्धारण के तौर पर इनकी नज़्म ‘रिश्ते’ की बानगी देखिए……….
बहुत क़रीब से देखा है मैंने’
रंग बदलते रिश्तों को,
तेज़ तपिश में जैसे सारे,
रंग फीके पड़ जाते हैं,
फिज़ा में जैसे शाख़ों से,
पत्ते सारे झड़ जाते हैं,
तेज़ दोपहरी में सड़कों पर,
धूल उड़ा करती है जैसे,
वैसे ही दुनिया के रिश्ते,
तेज़ तपिश में जल जाते हैं,
फिर भी ऐसे रिश्तों का,
बोझ उठाना पड़ता है,
फ़र्ज़, वफ़ा और ज़िम्मेदारी,
रोज़ निभाना पड़ता है,
एक अकेली जान को कितने,
क़र्ज़ चुकाना पड़ता है।

जब इंसान ख़ुद को पहचान लेता है तब वह दुनिया और समाज में अपना श्रेष्ठ योगदान देने योग्य बन जाता है और यह तब ही मुम्किन है कि हम ख़ुद को पहचानें । इसी ख़ुदी के फ़लसफे़ को लेकर इन्होंने नज़्म ‘तलाश’ लिखी। देखिए भाव कितने गहरे हैं,………….
तलाश कर रहा है तू सुकून को इधर-उधर,
बैठा थक के राह में आया नहीं सुकून नज़र,
कभी अपनी जीत पर और कभी उम्मीद पर,
और सुकून तलाशना प्रीत पर, मनमीत पर,
फिर कभी यह सोचना क्या यहीं सुकून है।
जिसकी तलाश है तुझे, आता नहीं फिर क्यों नज़र।
इस नगर है ढूंढता उस डगर है ढूंढता,
है सुकून आख़िर कहाँ, मिल पाएगा आख़िर किधर,
तू बैठ अपने साथ, कुछ देर ख़ुद से बात कर,
भीड़ से किनारा कर, वुजूद की तलाश कर,
मिल ख़ुद से रूबरू कभी, रूह को सरशार कर,
अपने ही अंदर डूब कर पा जा सुराग़ ए ज़िंदगी,
बेचैन होकर राह में फिरता है क्यों दर बदर।

जुदाई के जज़्बात और तड़प को ग़ज़लों और नज़्मों में जिस शिद्दत से बयां किया है, उसका एहसास ग़ज़ल के चंद अशआर में यूं झलकता है……………….
तुमसे होकर जुदा यूं लगा है
जैसा जीना मेरा एक सज़ा है।
ये ज़मीं आसमां सब हैं ग़ुमसुम
इन हवाओं पर पहरा लगा है।
राह तकती हैं बोझल निगाहें
पर न आएगा वो जो गया है।
अब तो तन्हाईयां है मुकद्दर
दूर तक फैली खामोशियां है।

इस बात से बिल्कुल इन्कार नहीं किया जा सकता है कि मर्दाना समाज ने औरत के प्रति हमेशा से दौग़ला व दोहरा रवैया अपनाया है, जबकी एक औरत किसी भी सूरत में मर्द से पीछे नहीं बल्कि, मौजुदा दौर में औरत मर्द के के साथ कंधे से कंधा मिला कर हर क्षेत्र में अपना मक़ाम दर्ज करवा रही है। इनकी नज़्म ‘औरत’ में औरत मर्दाना समाज को आइना दिखाती हुई नज़र आती है। नज़्म की खूबसूरती काबिले गौर हैं…………….
मैं जिस्म हूँ,
मैं हूँ जान भी,
कहीं चुप, कहीं हूँ बयान भी,
कभी सिसकियां तो कभी चीख़ हूँ,
तेरे ग़म की ख़ुशी में शरीक हूँ,
हूँ तितलियों सी क़बा लिए,
सब ज़ीस्त के रंग मुझसे हैं,
तू हिसा है मेरी ज़ात का,
तुझे ग़ुरूर है किस बात का,
फिर ख़ेलता है क्यों भला,
यह ख़ेल शेह और मात का।
इसी विषय को आगे बढ़ाते हुए नज़्म ‘वुजूद’ मर्दाना समाज से औरत सवाल करती नज़र आती हैं…………
मैं बेटी हूँ,
मैं बीवी हूँ,
और मैं माँ भी हूँ,
इतने रिश्तों का मैं एहसास हूँ,
इसलिए मैं ख़ास हूँ।
बेटी बनकर ख़ुशी लुटाऊँ,
बीवी बनकर घर को सजाऊँ,
माँ बनकर पूरी हो जाऊँ,
घर आंगन की मैं हूँ ज़ीनत,
मुझसे है घर कुल की इज़्जत,
बाप के आंगन की मिट्टी हूँ,
साजन की लिखी चिट्ठी हूँ,
हूँ बच्चों का मै संसार,
प्यार लुटाती हर रिश्ते पर,
मकान को बनाती हूँ मैं घर,
पहले से ही बँटी हुई हूँ,
हर रिश्ते से सटी हुई हूँ,
फिर क्यों मुझ को तोड़ा जाता।
हर ग़लती से जोड़ा जाता,
करती हूँ मैं एक सवाल,
क्यों बुनते हो इतने जाल।
क्यों चलते हो मुझसे चाल।
इनकी ग़ज़लों और नज़्मों का संग्रह शीघ्र ही प्रकाशित होने की प्रक्रिया में है।

परिचय :
जीवन के विविध रस – रंग में ग़ज़ल और शायरी लिखने वाली रचनाकार डॉ. शबाना ‘सहर’ का जन्म कोटा में 29 जून 1984 को पिता शबीर अहमद एवं माता नसीम के आंगन में हुआ। आपने गोल्ड मेडल के साथ उर्दू विषय में एम.ए. वोकल संगीत में एम.ए. ,बी.एड, उर्दू में एम.फिल., उर्दू नेट तक अध्ययन कर उर्दू विषय में पीएच.डी की उपाधि प्राप्त की।राजपूताना उर्दू रिसर्च अकैडमी में शोध लेख सहित उर्दू एवं अन्य भाषाओं के अनेक प्रतिष्ठित पत्र – पत्रिकाओं , साझा संकलनों, कॉलेज की पत्रिका, ऑन लाइन मंचों पर इनकी रचनाओं और लेखों का प्रकाशन होता है। आकाशवाणी केंद्र कोटा से आपका काव्यपाठ समय – समय पर प्रसारित होता है।

प्रसार भारती दूरदर्शन केन्द्र (जयपुर) ‘मुशायरा में शायर’ सहित विविध मंचों से और काव्य संगोष्ठियों में काव्य पाठ किया है और वर्तमान में भी यह क्रम जारी है। समय-समय पर इनको राजस्थान उर्दू अकादमी, कोटा राजकीय महाविद्यालय के उर्दू विभाग तथा कोटा की कई संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत और सम्मानित किया गया है। वर्तमान में आप कोटा के सर्वोदय कॉलेज, रानपुर में उर्दू विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर सेवारत हैं और साहित्य सृजन में सक्रिय हैं।

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