Sunday, July 14, 2024
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मालिनी अवस्थी के लोक गीतों की बारिश से सराबोर हुआ लन्दन

 

मौसम सावन का हो और लोक राग रंग कज़री से सज जाए तो माहौल ख़ुशनुमा हो जाता है . अगर यह सब मिर्ज़ापुर और बनारस सेआठ हज़ार किमी पर लन्दन में हो तो फिर क्या कहिए . कल लन्दन में बसे उत्तर भारतीयों  के संगठन यूपीसीए और नेहरू केंद्र के संयुक्तआयोजन में उत्तर प्रदेश की जानी मानी लोक गायिका मालिनी अवस्थी ने जो सावन की कजरी , दादरा की तो बारिश की उसने नेहरूकेंद्र के आडिटोरियम में उपस्थित श्रोताओं के दिल को अंदर तक भिगो दिया.

इतर के शहर कन्नौज में जन्मी मालिनी ने संगीत की बुनियादी तालीम पहले रामपुर घराने  के सुजद हुसैन खां साहब और बाद मेंपटियाला घराने के राहत अली खां साहब से शिक्षा ली. बाद में बनारस आ कर अप्पा  साहेब  और गिरिजा देवी से भी सीखा . लेकिनअपनी दादी नानी से सुनी कजरी से उनकी एक अलग पहचान बनी है जो सच में कन्नौज के इतर की तरह से देस परदेस में खूब फैली है.

कजरी गीत मूलत: उन स्त्रियों के दुख दर्द हैं जिनके पति पैसा कमाने के लिए परदेस जाते थे, सालों साल उन्हें अपने पति का केवलइंतज़ार रहता था इस बीच न कोई चिट्ठी न कोई पत्री बस खर्चे के लिए मनीऑर्डर . कल मालिनी ने एक कजरी गाई उसमें विहरन उसरेल की खबर लेती है जो उसके पिया का परदेस ले कर गई है :

रेलिया बैरन पिया को लाए जाय

जौन  टिकसवा से बलम मोर जैहैं

पानी बरसे टिकस गैल जाए रे , रेलिया बैरन

जौने सहरिया को बलमा मोरे जैहें, रे सजना मोरे जैहें
आगी लागै सहर जल जाए रे, रेलिया बैरन
जौन सहबवा के सैंया मोरे नौकर, रे बलमा मोरे नौकर
गोली दागै घायल कर जाए रे, रेलिया बैरन
जौन सवतिया पे बलमा मोरे रीझे, रे सजना मोरे रीझें
खाए धतूरा सवत बौराए रे, रेलिया बैरन

 

इन दिनों भोजपुरी लोकगीतों में जहां अश्लीलता का बोलबाला है , मालिनी ने इन गीतों को एक साफ़ सुथरी पहचान देने की कोशिश की है  , उन्होंने यह गीत गैस कर उस स्त्री के दुख दर्द को जीने की कोशिश की जिसका पति गंगा जमुना पार करके गया है और वो चौड़ाईं केबाद नदी का जल स्तर सामान्य होने के बाद लौटेगा :

जमुनिया की डाल  में तोड़ लाई राजा , सोने की थारिया में जौना परोसा

ऐसा ही कज़री का रंग इस लोक गीत में मिला :

कैसे खेलन जेहें  सावन में  कजरिया बदरिया घिरी  आई ननदी

मालिनी अवस्थी कजरी जितना ही सहज दादरा सुर ठुमरी में भी महसूस करती हैं . बेगम अख़्तर साहिबा की मशहूर ठुमरी

‘अब के सावन घर आजा’ जब उन्होंने अपने अन्दाज़ में गाई तो लगा कि बेगम साहिबा की  शास्त्रीय संगीत की समृद्ध परंपरा अभी महफ़ूज़ है .

मालिनी ने भोजपुरी के साथ ही अवधी और बुंदेली में भी गाया है . खुली आवाज़ , सावन की कजरी की लोक धुनें , गायकी का स्टेजमैनरिज्म को  मिला कर  कर मालिनी ने लन्दन के नेहरू सेंटर में जो समाँ बाँधा वो काफ़ी दिनों तक याद रहेगा .

एक बात जो मालिनी ने इसी स्टेज से साझा की वह भी विस्थापन के दुख दर्द को बयान करती है. वे पाकिस्तान में प्रस्तुति के लिए जबगयीं तो वहाँ उन्होंने पाकिस्तानी लोक गायिका के गीत का कैसेट सुना जिसने वह विभाजन से पूर्व बिहार की महिला के पति के घर छोड़कर परदेस जाने के दुख को ठीक उसी अन्दाज़ में गा रही हैं जो बिहार के आंचलिक गीतों में प्रचलित है।

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