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छोटे मोदी ने बड़े मोदी की बोलती बंद कर दी

लालकृष्ण आडवाणी ने बिना कहे ही सब बात कह दी है। देश की वर्तमान स्थिति पर इतनी दूरंदेश और प्रज्ञावान टिप्पणी आडवाणी ही दे सकते हैं। उन्होंने कहा है कि देश में आपातकाल का दरवाज़ा बंद नहीं हुआ है। संवैधानिक बंदिशें तो इंदिराजी के समय भी थीं और अब भी हैं लेकिन उन्हें वर्तमान नेताओं पर भरोसा नहीं है। वे अपनी कमियों के कारण भरोसे लायक नहीं हैं। अपने देश के नेताओं के बारे में उन्होंने कहा है कि उनमें लोकतंत्र की रक्षा का माद्दा नहीं है। उन्होंने पत्रकारिता को पहले के मुकाबले ज्यादा बुलंद बताया है लेकिन उन्हें पता नहीं है कि यदि आपातकाल आ गया तो वह भी कहीं घुटनों के बल रेंगने न लगे।

आडवाणी के इन विचारों के कारण में देश में एक नया तूफ़ान उठ खड़ा होगा या नहीं, यह मैं नहीं कह सकता हूं। मुझे यह शंका भी है कि आडवाणी को भाजपा के लोग ही मजबूर कर दें कि वे अपने बयान की व्याख्या को उलट दें और सफाई देने लगें कि मेरा मतलब ये था या वो था। लेकिन आडवाणी को मैं जैसा पिछले पचास साल से जानता हूं, वे पलटा खाने वाले आदमी नहीं हैं। देश में मोहभंग का वातावरण जितनी तेज़ी से अब बढ़ता जा रहा है, उतनी तेज़ी से कभी नहीं बढ़ा। इंदिरा गांधी से मोहभंग होने में जनता को 8-9 साल लगे,राजीव गांधी के बोफोर्स का पिटारा ढाई साल बाद खुला और मनमोहन सिंह को इस बिंदु तक पहुंचने में 6-7 साल लगे लेकिन हमारे “प्रधान–सेवक” का क्या हाल है? प्रचंड बहुमत से जीतनेवाले जन—नायक का क्या हाल है? उसका नशा तो दिल्ली की हार ने एक झटके में ही उतार दिया था,और अब वसुंधरा राजे की रोचक कथाओं और सुषमा स्वराज की भूल ने सम्पूर्ण भाजपा नेतृत्व और संघ परिवार को भी कटघरे में ला खड़ा किया है।

अब जो भी वसुंधरा या सुषमा के पक्ष में बोलता है, वह लोगों को ललित मोदी का वकील मालूम पड़ता है। और जो नहीं बोलता है, उसके मौन की दहाड़ सारा देश सुन रहा है। हमारे प्रधान सेवक का योग-दिवस (21 जून) अभी से शुरू हो गया है। नाक, कान, आंख और मुंह सब एक साथ बंद हो गए हैं। मोटे मोदी पर छोटा मोदी भारी पड़ रहा है। 56 इंच का सीना पता नहीं सिकुड़कर कितना इंच रह गया है? मोदी सरकार की प्रतिष्ठा पैंदे में बैठ गई है। मोटे मोदी को छोटा मोदी ले बैठा। देश के सामने दूसरा विकल्प उभरा था—अरविन्द केजरीवाल का, वह भी नौटंकी में बदल गया है। जन आंदोलनों के लिए देश फिर तैयार हो गया है। ऐसी स्थिति में आपातकाल के बादलों का घिरना बूझा है तो आडवाणी को बधाई कि उनको ये घिरते हुए बादल अभी से दिखाई पड़ने लगे।

(साभार: vpvaidik.com)

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