Monday, June 17, 2024
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सौहाद्र निर्माण के मिल रहे अवसरों को संभाले मुस्लिम बंधु

श्री कृष्ण जन्माष्टमी पर जितनी प्रासंगिक परस्पर बधाई है, उतनी ही प्रासंगिक और सामयिक श्री कृष्ण जन्मभूमि की चर्चा भी है. हिंदू-मुस्लिम एकता और सौहाद्र, सद्भाव के कथित चिंतकों और गंगा-जमुनी संस्कृति का फटा ढोल पीटने वालो के लिए तो यह अति अति आवश्यक है.

इतिहास सदैव ही अपनी धुरी पर घूमते हुए अपनी परिक्रमा पूर्ण करते रहता है. समय का या वर्तमान युग का यही धर्म है कि इतिहास को उसकी परिक्रमा पूर्ण करने दी जाए. समय की इस परिक्रमा में जो मनुष्य या जाति या सभ्यता बाधक बनेगी वह विनाश को प्राप्त होगी. वर्तमान में समय अपनी परिक्रमा में उन गलतियों को ठीक कर रहा है जो भारत के मुस्लिम आक्रांताओं ने भारत के इतिहास और धर्म को मिटाने के अपने अभियान में की थी.

श्रीकृष्ण जन्मभूमि मथुरा के संदर्भ में पुरातात्विक प्रमाण की दृष्टि से सर्वाधिक प्राचीन शिलालेख महाक्षत्रप शोडस (ईसा पूर्व 80 से 57 तक) का मिलता है. ब्राह्मी लिपि में लिखे के इस शिलापट्ट पर उल्लेख है कि वसु ने श्रीकृष्ण जन्म स्थान पर एक मंदिर, तोरण द्वार और वेदी का निर्माण कराया था. लगभग चार सौ वर्षों पश्चात सम्राट विक्रमादित्य ने इसका भव्य पुनर्निर्माण कराया. चीनी यात्री फाह्यान और ह्वेनसांग ने भी इसका वर्णन किया है. तत्पश्चात राजा सम्राट विजयपाल व राजा ओरछा वीरसिंह देव ने बुंदेला भी इसका पुनर्निर्माण कराया.

सत्रहवीं शताब्दी में भारत आये फ्रांसीसी यात्री टैबरनियर ने भी इस मंदिर की भव्यता का उल्लेख किया है. इटली के यात्री और इतिहासकार मनूची के अनुसार तो इस केशवदेव मंदिर का स्वर्णाच्छादित शिखर इतना उंचाई वाला था कि दीपावली की रात उस पर जले दीपकों का प्रकाश मीलों दूर स्थित आगरा से भी दृष्टिगोचर होता था. कृष्ण जन्मभूमि के विध्वंस की दीर्घ श्रंखला में अंतिम विध्वंस मुग़ल आततायी औरंगजेब ने किया था और इसका पुनर्निर्माण महामणा मदनमोहन मालवीय व जुगलकिशोर बिड़ला जी ने कराया था.

श्रीराम जन्मभूमि मन्दिर, श्री कृष्ण जन्मभूमि मंदिर, काशी विश्वनाथ मंदिर, सोमनाथ मंदिर, द्वारिका मंदिर, मार्तंड सूर्य मंदिर अनंतनाग और हम्पी के मंदिर जैसे अनेकों अन्य विशाल मंदिरों के विध्वंस के साथ साथ मुस्लिम आतताइयों ने भारत में साठ हजार से अधिक मंदिरों का विध्वंस किया था. मुस्लिम आक्रमणकारी इन मंदिरों के अरबों रूपये के स्वर्ण, हीरे, माणिक, जवाहरातों के विशाल संग्रह को भी लूटकर अपने देशों में ले गए थे. मंदिरों के स्वर्ण भण्डार की इस लूट का माल इतना होता था कि इन मुस्लिम आक्रांताओं को लूट का माल ले जाने के लिए सैकड़ों हाथियों और ऊंटों की आवश्यकता पड़ती थी. अरबों और मुगलों की लूट से दुखती हुई इस नस को समझना ही भारत में हिंदू-मुस्लिम सौहाद्र को समझ लेना है और विवादों का हल कर लेना भी है.

स्मरण में आता है अयोध्या विवाद के दौरान दिया गया वह मुस्लिम समाज का वह वचन कि, “यदि अयोध्या मंदिर की पुरातात्विक खुदाई में उसके मंदिर होने के तनिक भी प्रमाण मिले तो हम यह मंदिर हिंदू समाज को अपने हाथों से सौंपने में उतना समय भी नहीं लगाएंगे जितना समय एक माचिस की डिबिया को देने में लगता है”. पुरातात्वविज्ञों ने खुदाई में मिले एतिहासिक प्रमाण प्रस्तुत कर दिए थे किंतु मंदिर को माचिस की डिबिया की तरह पल भर में हिंदू समाज को वह मंदिर सौंप देने का वह वचन अधूरा रहा.

आज श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर इन सब बातों का उल्लेख यहां इसलिए हो रहा है क्योंकि काशी में ज्ञानवापी मामला पुनः गति से आगे बढ़ रहा है. पूर्व की तरह अब भी भारतीय मुस्लिम समाज से इस विषय में कोई सकारात्मक प्रतिक्रिया या पहल नहीं आ पा रही है. अंजुमन इंतेजामिया मस्जिद कमेटी ने एएसआई सर्वे के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील की है. इस विषय में हमें सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण व लौहपुरुष वल्लभभाई पटेल की भूमिका का पुनर्स्मरण करना होगा. वल्लभभाई की दृष्टि में वे एक मंदिर मात्र का पुनर्निर्माण नहीं कर रहे थे बल्कि वे एक विदेशी आक्रान्ता द्वारा देश के एक महत्वपूर्ण मानबिंदु के अपमान का व विदेशी शक्ति का प्रतिकार कर रहे थे.

सोमनाथ मंदिर का एक केन्द्रीय मंत्री द्वारा पुनर्निर्माण कराया जाना वस्तुतः भारतीय स्वाभिमान को पुनर्स्थापित करने का एक बहुआयामी प्रयास था. लौहपुरुष की मान्यता थी कि विदेशी आक्रमणकारी के इस दुष्प्रयास के चिन्हों को राष्ट्र की आत्मा से मिटाना ही होगा, राष्ट्रगौरव जगाना ही होगा, माथे के इस कलंक को हटाना ही होगा. इसी दृष्टि से अब मुस्लिम समाज को स्वयं आगे आकर श्रीकृष्ण जन्मभूमि, मथुरा और ज्ञानवापी मंदिर के विषय में सम्मानपूर्वक मंदिर पुनर्निर्माण का भी मार्ग प्रशस्त करना चाहिए.

अयोध्या के श्रीराम जन्मभूमि मंदिर के समय में यह स्पष्ट देखने में आया था कि भारत का आम मुसलमान मंदिर की भूमि पर से अपना दावा छोड़ना चाहता है और इस विवाद से मुक्ति चाहता है. कुछ कट्टर इस्लामिक संगठन और कट्टर नेता (जिनकी राजनीति ही हिंदू मुस्लिम टकराव के आधार पर चलती है) ऐसा नहीं चाहते थे. भारत के कई महत्वपूर्ण राजनैतिक दलों सहित कांग्रेस भी अयोध्या विवाद को सुलझने देना नहीं चाहते थे. कांग्रेस ने तो इन सेकुलर दलों का प्रतिनिधित्व करते हुए न्यायालय में अयोध्या सम्बंधित मामले के हल होने के मार्ग में वकील तक खड़े कर दिए थे. यह स्वाभाविक भी है यदि इन नेताओं ने और इन जैसे अन्य कट्टर और सियासती भूखे मुस्लिम नेताओं ने यदि अड़ंगे न डाले होते तो अमनपसंद आम मुसलमान कभी का इस मुद्दे पर हिन्दू समाज के साथ एक पंगत एक संगत में बैठ चुका होता. भारतीय मुस्लिमों को यह बात विस्मृत नहीं करना चाहिए की मथुरा और काशी में औरंगजेब द्वारा मंदिर को तोड़कर उस पर जो मस्जिद बनाई गई है वह मूलतः तो एक मंदिर ही है.

भारतीय मुस्लिम समाज को यह भी स्मरण में रखना चाहिए की हम सभी भारतीयों के लिए औरंगजेब महज एक विदेशी आक्रमणकारी व लूटेरा था. भारतीय मुस्लिमों की रगो में औरंगजेब का रक्त नहीं बल्कि उनके भारतीय (पूर्व हिंदू) पुरखों का रक्त बहता है. भारतीय मुसलमान उस समाज से हैं जिनके पुरखों ने कभी बलात होकर, कभी मजबूर होकर, कभी भयभीत होकर तो कभी माँ, बेटी, बहु की इज्जत व सम्पत्ति की रक्षा करने के उद्देश्य से विवश होकर इस्लाम ग्रहण किया था. नब्बे प्रतिशत भारतीय मुस्लिम अरबी फ़ारसी वंशज न होकर डीएनए से तो हिंदू ही है. जब हमारें पुरखे एक हैं तो आज हमें हमारा वर्तमान और भविष्य भी एक ही होना चाहिए. अयोध्या विवाद के समय न्यायालय ने कई बार ऐसे अवसर निर्मित किए थे जब मुस्लिम समाज आगे आकर अयोध्या की विवादित भूमि को अपने दोनों हाथों से हिंदू समाज को आदरपूर्वक दे सकता था और एक नया इतिहास लिख सकता था. ऐसे प्रयास हुए भी थे.

मुस्लिम समाज में इस प्रकार की चर्चाएं चली भी थी किंतु कट्टरपंथी मुस्लिम संगठनों ने अमनपसंद मुस्लिमों के ये सद्प्रयास सफल नहीं होने दिए थे. कट्टर मुस्लिम हावी हुए और अमनपसंद मुस्लिम पराजित हो गया था. अब पुनः इतिहास ने मुस्लिम समाज को यह अवसर प्रदान किया है कि वह एक विदेशी आक्रमणकारी द्वारा विध्वंस किये मंदिर के विवादित स्थान को हिंदुओं को वापिस सौंपकर एक नजीर पेश करे. यद्दपि इस मार्ग में अड़चने अनेक हैं, कई कट्टर मुस्लिम नेता, हिन्दुओं का भय बताते हुए मुस्लिम नेता और कई अवसरवादी मुस्लिम नेता अपनी नेतागिरी की दूकान बंद होनें के डर से इस मार्ग में रोड़े अटकाएंगे, तथापि विश्वास है कि अमनपसंद भारतीय मुसलमान इस बार इन दोगले कट्टर नेताओं की बातों में न आकर सम्पूर्ण विश्व के सामनें भारतीय मुस्लिमों की एक नई पहचान व नई तहजीब की नजीर पेश करेगा.

(लेखक विदेश मंत्रालय, भारत सरकार में राजभाषा सलाहकार हैं)

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