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छत्‍तीसगढ़ में वन औषधियों से जुड़ रही लोगों की टूटी हड्डियां

  जगदलपुर। वनौेषधियों का लाभ उठाने वालों की संख्या तेजी से बढ़ रही है और इन्हीं जड़ी- बूटियों से सीमावर्ती ग्राम गिरला में भतरा परिवार 53 साल से लोगों की टूटी हड्डियां जोड़ता आ रहा है।

वनौषधियों से ठीक होने वाले हजारों मरीजों का नाम सौ से ज्यादा रजिस्टरों में दर्ज हैं। वैद्यराज रन्नू भतरा के वैद्यई से प्रभावित कोटपाड़ के विधायक वासुदेव मांझी ने चिकित्सालय के साथ ही एक धर्मशाला बनाकर दिया है। वहीं ओड़िशा सरकार ने वैद्यराज को सम्मानित किया है।
जिला मुख्यालय से 31 किमी दूर सीमावर्ती राज्य ओडिशा के कोटपाड़ से सात किमी की दूरी पर ग्राम गिरला है। यहां भतरा परिवार की तीन पीढ़ियां लोगों की टूटी अस्थियां जोड़ता आ रहा है। प्रतिदिन गिरला औषधालय में दर्जनों मरीजों की कतार रहती है।
लोगों की सुबह से शाम तक सेवा करने वाले दीनबंधु और रघुनाथ भतरा ने बताया कि 50 साल तक उनके पिता रन्नू भतरा आसपास के वनों से प्राप्त वनौषधी से लोगों की टूटी हड्डियां जोड़ते रहे हैं। वे सेवा के बदले मरीजों से कोई शुल्क नहीं लेते थे।
दीनबंधु ने बताया कि टूटी हड्डियों को जोड़ने के लिए वे परंपरागत्‌ वनौषधि हडजोड़ और उड़द की दाल का उपयोग करते हैं। टूटी हड्डी को सही बिठाना ही कला है।
जरा सी चूक मरीज के शरीर को विकृत और कथित हिस्से को खराब कर सकती है। वे पिता व्दारा सिखाए गए हुनर को आगे बढ़ाते हुए परंपरा का निर्वाह कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि उनके पिता की जड़ी – बूटियों के अचूक प्रयोग से प्रभावित होकर आदिम जाति कल्याण विभाग ओड़िशा सरकार व विभिन्न सामाजिक संगठनों ने प्रशंसा पत्र प्रदान किया है।
वहीं रन्नू वैद्य के कार्य से प्रभावित होकर कोटपाड़ के कांग्रेस विधायक वासुदेव मांझी ने एक अस्पताल व मरीजों के ठहरने के लिए बड़ा धर्मशाला बनवाया है। यहां किसी से कोई शुल्क नहीं लिया जाता। बस यहां आने वाले मरीज को रजिस्टर में अपना नाम दर्ज करना होता है। यहां आने वाले मरीजों का नाम दर्ज करने के कारण अब तक सौ से अधिक रजिस्टर भर चुके हैं।
यहां पहुंचे रामनाथ नाग कलचा, सीतादई भतरा भानपुरी, कोमल कुमार बेलोरी , सुनील नायक जैतगिरी आदि ने बताया कि गांव के कुछ लोग यहां से ठीक होकर लौटे हैं। उनके दिशा निर्देश व अनुभव को सुनकर वे इलाज कराने गिरला आए हैं। इधर औषधी और पट्टी आदि का खर्च कैसे निकलता है ?
यह पूछे जाने पर वर्तमान बडे वैद्य दीनबंधु ने बताया कि मरीज स्वेच्छा से जो भी छोड़ कर जाते हैं, वही सेवा में खर्च होता है। पैतृक कृषि ही आय का प्रमुख जरिया है।
साभार- http://naidunia.jagran.com/

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