Tuesday, June 25, 2024
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आपातकाल के दौरान स्वंतत्रता का अधिकार।

भारत के संविधान के अनुच्छेद 352 में यह उपबंध है कि राष्ट्रपति को इस तथ्य का समाधान हो जाए कि संवैधानिक व्यवस्था में गंभीर आपात विद्यमान है; जिसमें युद्ध, वाह्य आक्रमण या सशस्त्र विद्रोह से भारत या उसके किसी अभिन्न भाग में सुरक्षा संकट में है या ऐसा संकट सन्निकट है तो उद्घोषणा द्वारा इस आशय की घोषणा कर सकता है” संपूर्ण भारत के संबंध में या उसके किसी ऐसे भाग के संबंध कर सकेगा जो उद्घोषणा में उल्लिखित किया जाए”। भारत के संविधान में कहा गया है कि संकट की उद्घोषणा आक्रमण होने या विद्रोह होने के पूर्व की जा सकती है ,यदि राष्ट्रपति को समाधान हो जाएगी ऐसा कोई संकट सन्निकट है।

अमेरिका के राजनीतिक व्यवस्था /संवैधानिक व्यवस्था के अंतर्गत राज्य में आंतरिक अव्यवस्था उत्पन्न होने की स्थिति में राष्ट्रपति उस समय तक हस्तक्षेप नहीं कर सकता है, जब तक संबंधित राज्य का विधान मंडल ऐसा करने के लिए राष्ट्रपति से अनुरोध/ याचना ना करें। यदि राज्य विधानमंडल सत्र में नहीं है तो यह प्रार्थना उस राज्य के राज्यपाल के द्वारा की जा सकती है ।ऑस्ट्रेलिया के संवैधानिक व्यवस्था में इसी प्रकार का प्रावधान करते हुए यह कहा गया है कि किसी राज्य में उत्पन्न होने वाले आंतरिक अशांति को दूर करने के लिए केंद्र सरकार उसी समय हस्तक्षेप करता है, जब उस राज्य की कार्यकारिणी की ओर से ऐसा अनुरोध/ निवेदन किया जाए।

आपातकाल की स्थिति में राष्ट्रपति नागरिकों को संविधान के भाग 3 के द्वारा प्रदान किए गए संवैधानिक/ सांविधानिक उपचारों के अधिकार को स्थगित करते हैं जिसके फलस्वरूप सरकार कोई भी कानून का आदेश बना सकती है अथवा कार्यकारिणी कोई आदेश दे सकती है, भले ही वह कानून/ आदेश संविधान के भाग 3 में दिए गए मूलाधिकारों से विपरीत क्यों नहीं हो? आपातकाल में नागरिकों के मूल अधिकार स्थगित हो जाते हैं। संविधान में यह व्यवस्था है कि ऐसे आदेश यथाशीघ्र संसद के समक्ष रखे जाने चाहिए लेकिन इसके लिए कोई अधिकतम अवधि निश्चित नहीं की गई है। राष्ट्रपति महोदय से यह आशा की जाती है कि ऐसे आदेशों को एक विवेकयुक्त अवधि के भीतर संसद के समक्ष रखवाएगें।

संविधान के 44 वें संविधान संशोधन, 1978 द्वारा यह व्यवस्था की गई है कि आपातकाल में अनुच्छेद 20 एवं अनुच्छेद 21 द्वारा प्रदान की गई व्यक्तिगत स्वतंत्रता(दैहिक स्वतंत्रता/भौतिक स्वतंत्रता) से संबंधित मूल अधिकारों को स्थगित नहीं किया जा सकेगा। अनुच्छेद 358 एवं 359 में बताया गया है कि आपातकाल की घोषणा का मूल अधिकारों पर क्या प्रभाव पड़ेगा ? संविधान के 44 वें संशोधन ,1978 में संशोधित किए जाने के पश्चात इसका परिणाम होता है:-

1. संविधान के अनुच्छेद 358 मेंउपवंध है कि राज्य पर अनुच्छेद 19 द्वारा आरोपित मर्यादा /सीमाएं लागू नहीं होगी जिससे यह अधिकार आपात की उद्घोषणा के प्रभावी रहने के दौरान राज्य के विरुद्ध मान्य हो जाएंगे। अनुच्छेद 368 के अधीन राष्ट्रपति के आदेश द्वारा इन अधिकारों को या उनमें से किसी को क्रियान्वित कराने के लिए न्यायालयों में अभ्यावेदन/ प्रार्थना के अधिकार का निलंबन किया जा सकता है।

2. अनुच्छेद 352 में विनिर्दिष्ट आधारों में से किसी आधार पर घोषित उद्घोषणा को अर्थात युद्ध,वाह्य आक्रमण या सशस्त्र विद्रोह को अनुच्छेद पर अनुच्छेद 359 लागू होगा, किंतु अनुच्छेद 358 का लागू होना है ऐसे आपात तक ही सीमित है जो युद्ध, वाह्य आक्रमण के आधार पर घोषित किया है।

3. युद्ध का वाह्य आक्रमण के आधार पर आपातकाल की उद्घोषणा की जाती है वैसे ही अनुच्छेद 358 पर प्रभावी हो जाता है और अनुच्छेद स्वतः निलंबित हो जाता है, किंतु अनुच्छेद 359 का लागू करने के लिए राष्ट्रपति का आदेश किया जाना आवश्यक है जिसमें वे मूल अधिकार विनिर्दिष्ट हो जिनके विरुद्ध निलंबन लागू होता है।

4. अनुच्छेद 19 को अनुच्छेद 358 निलंबित करता है। अनुच्छेद 359 के अधीन अधिकार प्रभावी कराने का निलंबन ऐसे मूलाधिकारों के संबंध में है जो राष्ट्रपति आदेश में विनिर्दिष्ट करता है ।भारत के संविधान का अनुच्छेद 20 एवं 21 को छोड़कर सभी मौलिक अधिकार निलंबित हो जाते हैं।

दूसरे शब्दों में कहें तो आपातकाल के दौरान नागरिकों के सभी स्वतंत्रता निलंबित हो जाती हैं। भारत के लोकतंत्र में आपातकाल को “काले अध्याय /गला घोटू/लौह भार” की संज्ञा दी जाती है। आपातकाल के दौरान जनता के सभी स्वतंत्रता को निलंबित कर दिया जाता है, उनके स्वतंत्रता को कुचल दिया जाता है एवं प्रेस पर प्रतिबंध( अभिव्यक्ति की आजादी) को निलंबित कर दिया जाता है।

वरिष्ठ पत्रकार एवं इंदिरा गांधी कला केंद्र के अध्यक्ष श्री राम बहादुर राय जी ने लिखा है कि “वास्तविकता यह है कि 25 जून, 1975 को 12:30 बजे(रात्रि में) राष्ट्रपति महोदय से जबरदस्ती दस्तखत करा लिया गया था। 26 जून, 1975 को कैबिनेट (मंत्रिमंडल)ने इसका अनुमोदन किया था। इस समय अंतराल के मध्य राष्ट्र के समस्त सम्मानित नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया था।इसी दौरान श्री अटल बिहारी वाजपेई,श्री लाल कृष्ण आडवाणी,तत्कालीन प्रांत प्रचारक(अब सर कार्यवाह) श्रीमान दत्तात्रेय होसबोले जी को जबरदस्ती गिरफ्तार किया गया था। राजनीतिक व्यवस्था में आपातकाल की आवश्यकता क्यों महसूस हुई ?

इस प्रकरण का मापांक तत्कालीन परिस्थितियों, तत्कालीन परिस्थितियों के राजनीतिक वातावरण का अध्ययन करने से परिणाम महसूस होता है। 1971 के आम चुनाव के बाद श्रीमती इंदिरा गांधी जी को संसदीय दल के नेता के रूप में चुना जाना ,यह दल के वरिष्ठ नेताओं के बीच गुटबाजी की भावना को जन्म दिया था। भारत में बढ़ती महंगाई ,बेरोजगारी, इंदिरा सरकार में संजय गांधी का हस्तक्षेप ,बेलगाम नौकरशाही(चापलूसी की पराकाष्ठा हो चुकी थी) ने आपातकाल के लिए पिथिका तैयार किया था ।

जनता लोकनायक जयप्रकाश नारायण के साथ लामबंद होने लगे थे। आपातकाल के लिए उत्तरदाई कारक श्रीमती गांधी की शासकीय विफलता और श्री यशपाल कपूर नौकरशाह होते हुए भी श्रीमती गांधी का व्यक्तिगत सहायक के तौर पर काम करना। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने श्रीमती गांधी के चुनाव को असंवैधानिक करार दिया था।19 71 में हुए लोकसभा चुनाव में श्रीमती गांधी रायबरेली सीट से विजई हुई थी, लेकिन उनके प्रतिद्वंदी श्री राज नारायण जी ने इंदिरा गांधी के चुनाव परिणाम को इलाहाबाद उच्च न्यायालय में चुनौती प्रदान किया था।

1.सरकारी मशीनरी(नौकरशाही/अधिकारी तंत्र) का दुरुपयोग;
2. सत्ता (विधिक शक्ति) के दबाव के कारण चुनाव के नतीजे को प्रभावित करने जा आरोप लगाया था।

माननीय इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने श्रीमती गांधी के निर्वाचन को रद्द कर दिया एवं उनको 6 साल तक चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगा दिया था। श्रीमती इंदिरा गांधी ने सर्वोच्च न्यायालय में अपील दायर किया। 24 जून ,1975 को उच्चतम न्यायालय का निर्णय आया:-
1. निर्वाचन रद्द को बरकरार रखा गया;
2. 6 साल के चुनाव लड़ने के प्रतिबंध को बरकरार रखा गया था;
3.प्रधानमंत्री के पद पर बने रहने को उच्चतम न्यायालय ने आदेश दिया, वह संसद में मतदान प्रक्रिया में भाग नहीं ले सकती है।

लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने दिल्ली के रामलीला मैदान से श्री रामधारी सिंह दिनकर की कविता के को पढ़कर कहा कि” सिंहासन खाली करो कि जनता आती है”। उन्होंने कहा कि मुझे गिरफ्तारी का डर नहीं है और मैं इस रैली में भी अपने उस आवाहन को दोहराता हूं ताकि कुछ दूर संसद में बैठे संसदीय व्यक्तित्व भी सुन सके। मैं आज फिर सभी पुलिसकर्मियों और जवानों को आवाहन करता हूं कि सरकार के आदेश नहीं माने क्योंकि इस सरकार ने शासन करने की अपनी राजनीतिक वैधता/ राजनीतिक आभार खो चुकी हैं।

संविधान के भाग 18 में आपातकाल का उपबंध किया गया है। सभी विरोधियों को ‘ मीसा ‘ के अंतर्गत गिरफ्तार किया गया था। देशभर में क्या हो रहा है? चंद्रशेखर जी कैसे डायरी रखते थे? जॉर्ज फर्नाडीज कब गिरफ्तार होंगे? आपातकाल घोषित होने के पश्चात मूल अधिकार निलंबित हो जाते हैं। आपके साथ अमानवीय व्यवहार होगा उसके लिए आप न्यायालय नहीं जा सकते हैं। अखबारों और समाचार पत्रों के नियंत्रण करने के लिए कठोर कानून बनाए जाते हैं। पीटीआई, यू एन आई, हिंदुस्तान समाचार और समाचार भारती को समाप्त करके “समाचार एजेंसी” का गठन किया गया था। प्रेस के लिए ‘ आचार संहिता’ की घोषणा कर दी गई थी। संपादकों को सरकार विरोधी लिखने, मुद्रित के कारण गिरफ्तार कर लिया गया था। अमृत नहाता की फिल्म “आधी “पर पाबंदी लगा दी गई थी। आर्थिक मोर्चे पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा था, आपातकाल के कारण ‘ परिवार नियोजन एवं सुंदरीकरण कार्यक्रम ‘ पर अधिक नकारात्मक प्रभाव पड़ा था।

42 वें संविधान संशोधन द्वारा व्यापक बदलाव किया गया एवं संवैधानिक लोकतंत्र को’ नियंत्रित लोकतंत्र ‘ के रूप में बदल दिया गया था, इसलिए 42 वें संविधान संशोधन को’ लघु संविधान ‘ कहा जाता है। 39 वें संविधान संशोधन से 42 वें संविधान संशोधन के द्वारा राष्ट्रपति को सर्वोच्च बना दिया गया था ,जबकि लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता का सदन( लोकसभा) सर्वोपरि होती है।

(लेखक राजनीतिक विश्लेषक हैं)

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