भारतीय रेल्वे में काम करने वाला हर कर्मचारी इस मायने में भाग्यशाली है कि एक एक कर्मचारी एक साथ मिलकर प्रतिदिन 3 करोड़ रेल यात्रियों की सेवा करता है। रेल्वे के 13.50 लाख कर्मचारी आपसी तालमेल बनाए रखकर प्रतिदिन इन करोड़ों यात्रियों को अपने गंतव्य तक पहुँचाते हैं। दिल्ली में बैठा रेल कर्मचारी हजारों किलोमीटर दूर चेन्नई में बैठे रेल कर्मचारी से तालमेल कर इस रूट पर चलने वाली रेलगाड़ी को गंतव्य तक पहुँचाने के लिए पूरे रास्ते के हर एक रेल कर्मचारी से सतत् संपर्क में रहता है। भारतीय रेल अपने आप में एक अद्भुत चमत्कार है और मेरा मानना है कि रेल्वे में नौकरी करना किसी पुण्य से कम नहीं। भारतीय रेल्वे हमारी वैदिक मान्यता वसुधैव कुटुंबकम् का साक्षात प्रमाण है, जिसमें हर यात्री रेल्वे कर्मचारी के परिवार का सदस्य होता है।
ये विचार रेल मेंत्री श्री सुरेश प्रभु ने मुंबई में वेस्टर्न रेल्वे मजदूर संघ के वरिष्ठ नेता दादा जयवंतराव माहुरकर द्वारा अपने 50 वर्षो की जीवन यात्रा में रेल्वे से जुड़े अनुभवों को लेकर लिखी गई पुस्तक गार्ड टू गार्जियन के विमोचन समारोह में संबोधित करते हुए व्यक्त किए। श्री प्रभु ने कहा कि देश के लाखों रेल यात्रियों की तरह मैं भी भाग्यशाली हूँ कि मुझे प्रधान मंत्री ने रेल्वे जैसे मंत्रालय का काम सौंपा। उन्होंने कहा कि जैसे पूजा में बैठने वालों को पूजा करवाने वाले का पुण्य मिल जाता है ऐसा ही पुण्य मुझे रेल्वे कर्मचारियों की वजह से मिल रहा है। श्री प्रभु ने कहा कि श्री माहुरकर ने एक गार्ड के रुप में रेल्वे में नौकरी शुरु की और रिटायर होते होते वे सभी कर्मचारियों के गार्जियन हो गए। ये तभी हो सकता है जब कोई कर्मचारी रेल्वे में नौकर की तरह नहीं बल्कि रेल्वे के परिवार की तरह समझकर काम करे। दादा माहुरकर ने ये किताब लिखकर मेरा भी एक बड़ा काम कर दिया है। मैं चाहता हूँ कि रेल्वे का हर कर्मचारी ये किताब पढ़े ताकि वह समझ सके कि गार्ड से गार्जियन की यात्रा कितनी सुखद, रोमांचक और प्रेरक हो सकती है। ये पुस्तक हर कर्मचारी के लिए गीता, कुरान और बाईबिल बन जाए तो रेल्वे कर्मचारियों को एक नई दिशा और सोच मिल सकती है।
श्री प्रभु ने कहा कि रेल्वे एक पिरामिड की तरह है, इसमें शिखर पर तो एक ही व्यक्ति होता है मगर नींव में और इसके आधार में बहुत से हिस्से एक दूसरे से जुड़े होते हैं, रेल्वे के कर्मचारी इस पिरामिड के आधार हैं।
श्री प्रभु ने कहा कि मैं रेल्वे के 13.50 लाख कर्मचारियों का मुखिया हूँ, इनकी उपेक्षा करके रेल्वे को नहीं सुधारा जा सकता है, लेकिन दुर्भाग्य से भारतीय रेल एक विषम स्थिति से गुजर रही है। हमारे पास संसाधन नहीं हैं, और लोगों की व कर्मचारियों की अपेक्षाएँ बढ़ती जा रही है। उन्होंने कहा कि हम निजी निवेश करके इस स्थिति को सुधार सकते हैं, और कर्मचारियों की ताकत से ही आगे बढ़ सकते हैं। श्री प्रभु ने कहा कि हमें रेल्वे में पारदर्शिता लाने के लिए हर प्रोजेक्ट की ऑनलाईन मॉनीटरिंग शुरु करने जा रहे हैं।
श्री प्रभु ने कहा कि मैं जब रेल्वे के अधिकारियों के साथ बैठक करता हूँ तो उन्हें कहता हूँ कि आप रेल्वे के लिए ऐसा कुछ करें कि लोग तो आपको याद रखे ही जब आपके नाती –पोते आपकी गोद में खेलने आए तो उन्हें भी आप बता सकें कि आपने इतने बड़े पद पर रहते हुए ऐसा कौनसा काम किया है कि देश के लोगों को उसका लाभ मिला है। कहीं ऐसा न हो कि आपके नाती-पोते या बच्चे आपसे कभी ऐसा सवाल पूछ ले कि आपको शर्मिंदा होना पड़े।
ठहाकों के बीच श्री प्रभु ने कहा कि आजकल लोग रेल में यात्रा करने वालों को हैप्पी जर्नी बोलने में डरते हैं, ये मजाक की बात नहीं है, ये बहुत गंभीर बात है, इस स्थिति को हम और आप मिलकर बदल सकते हैं।
कार्यक्रम में अपने विचार व्यक्त करते हुए दादा माहुरकर के बेटे एवँ इंडिया टुडे के अहमदाबाद ब्यूरो प्रमुख श्री उदय माहुरकर ने कहा कि इतने वर्षों की पत्रकारिता और श्री नरेंद्र मोदी जैसी शख्सियत से लंबी निकटता के अपने अनुभव के बाद मैं दावे से कह सकता हूँ कि सुरेश प्रभु का रेल मंत्री बनना भारतीय रेल के लिए एक सुनहरे अध्याय की शुरुआत है। उन्होंने एक किस्सा सुनाते हुए कहा कि रेल्वे में अब तक बड़े पदों के लिए करोड़ों की बोलियाँ लगती रही है और ये खुला खेल खूब चलता रहता था, लेकिन जब सुरेश प्रभु रेल मंत्री बने तो उन्होंने रेल्वे बोर्ड में नियुक्ति के लिए अपनी पसंद का कोई व्यक्ति नहीं लिया, उन्होंने सीधे पीएमओ में कहा कि मुझे ईमानदार और काम करने वाले लोगों की सूची दे दें ताकि उन्हें रेल्वे बोर्ड में नियुक्त किया जा सके। श्री माहुरकर ने कहा ये कोई छोटी बात नहीं है, इस एक घटना से भारतीय रेल का एक नया और सुनहरा भविष्य तय हुआ है।
इस अवसर पर अपने विचार व्यक्त करते हुए दादा माहुरकर ने कहा कि आत्मकथा लिखना बहुत मुश्किल काम है। मैं जब भी अपने सचिव को अपने संस्मरण लिखाने बैठता मुझसे मिलने कोई भी कभी भी आ जाता था, लेकिन मेरा सिध्दांत है कि मेरे घर आने वाले साधारण से गैंगमैन से लेकर किसी भी व्यक्ति का तिरस्कार नहीं करता हूँ। मैने 56 साल की अपनी रेल्वे की यात्रा में स्टीम इंजिन से लेकर डीज़ल और अब इलेक्ट्रिक इंजिनों का दौर देखा है। उन्होंने कहा कि जब मैं गार्ड था और रेल पटरियों के किनारे गैंगमैन को बगैर जूते चप्पल पहने अपनी ड्यूटी करते देखता था तो मन को बड़ी टीस पहुँचती थी। गैंगमेन की हालत ये थी कि वे अपने बच्चों को पढ़ा नहीं पाते थे, उनके लिए कपड़े और जूते चप्पल तक नहीं खरीद पाते थे। लेकिन अब वो हालत नहीं है, हमने इन गैंगमैन और छोटे कर्मचारियों की हालत सुधारने के लिए लंबी लडाई लड़ी।
कार्यक्रम में दिल्ली से आए मजदूर नेता डॉ. एम राघवैया ने दादा महुरकर के साथ अपने लंबे मजदूर आंदोलन के दौर का उल्लेख करते हुए कहा कि दादा माहुरकर ने देश भर के 2.5 लाख ट्रैक मैंटेनेंस कर्मचारियों की हालत सुधारने के लिए लंबी लड़ाई लड़ी और र्लेवे को उनका वेतन बढ़ाने के लिए मजबूर किया। इसी तरह उन्होंने 1.3 लाख रनिंग स्टाफ को भी उनके अधिकार दिलाने में अहम भूमिका निभाई।
इस अवसर पर पश्चिम और सेंट्रल रेल्वे के महाप्रबंधक श्री एसके सूद ने भी संबोधित किया। इस कार्यक्रम में मुंबई से लेकर बड़ौदा और अहमदाबाद तक के रेल कर्मचारी आए थे। कार्यक्रम के प्रारंभ में वेस्टर्न रेल्वे मजदूर संघ के अध्यक्ष श्री शरीफ खान पठान ने सभी अतिथियों का स्वागत कर दादा माहुरकर का परिचय दिया।
इस समारोह में रेल्वे बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष श्री के सी जेना, सेंट्रल रेल्वे के पूर्व महाप्रबंधक, बीबी मुद्गिल, सेंट्रल रेल्वे के पूर्व महाप्रबंधक श्री रवींद्र गुप्ता, पश्चिम रेल्वे के एजीएम श्री आर पी भटनागर, बड़ौदा के डीआरएम श्री आशुतोष गांगल भी विशेष रूप से उपस्थित थे।
कार्यक्रम के अंत में वेस्टर्न रेल्वे मजदूर संघ के डिविजनल महासचिव श्री अजय कुमार ने धन्यवाद ज्ञापन किया।
वसुधैव कुटुंबकम् का साक्षात प्रमाण है भारतीय रेल्वेः श्री सुरेश प्रभु
हार्लिक्स और डाबर के दावे फर्जी
विज्ञापन उद्योग पर नजर रखने वाले भारतीय विज्ञापन मानक परिषद (ASCI) ने आइडिया सेलुलर, डाबर, ग्लैक्सोस्मिथक्लाइन (जीएसके) कंज्यूमर और हेइंज जैसी कंपनियों के 125 भ्रामक विज्ञापनों के खिलाफ शिकायतें सही पाई हैं। ये विज्ञापन इस साल फरवरी के हैं।
ASCI की ग्राहक शिकायत परिषद (सीसीसी) को फरवरी के दौरान 167 शिकायतें मिलीं और अधिकतम 73 शिकायतें पर्सनल और हेल्थकेयर वर्ग में भ्रामक विज्ञापनों को लेकर थीं जो सही पाई गर्इ।
परिषद ने आइडिया सेल्यूलर के विज्ञापन के खिलाफ शिकायत को सही ठहराया जिसमें हरियाणा की लड़कियों को पढ़ने के लिए घर से बाहर नहीं जाने देने की प्रथा दिखाकर हरियाणा की प्रतिष्ठा धूमिल की गई है। इसी तरह, हेइंज इंडिया के ‘ग्लूकॉन डी- वोल्ट’ के विज्ञापन में बच्चों को टैबलेट हवा में उछालकर उसे सीधे मुंह से पकड़ते हुए दिखाया गया है जो एक खतरनाक प्रयास है बच्चे इसकी नकल करने को प्रेरित हो सकते हैं।
वहीं, हॉर्लिक्स के विज्ञापन में दिखाया गया कि परीक्षा के समय हॉर्लिक्स का सेवन करने से एकाग्रता बढ़ती है। दूसरी ओर, डाबर के विज्ञापन में दावा किया गया है कि डाबर च्यवनप्राश प्रतिरोधक क्षमता तीन गुना कर देता है जिससे बच्चे अंदर से मजबूत होते हैं।
गिलगिट बाल्टिस्तान पाकिस्तान के अत्याचारों से कराह रहा है-शेंजे सीरिन
गिलगिट बास्टिस्तान जो जवाहरलाल नेहरु और अंग्रेजी राज के कुटिल अंग्रेजों की वजह से आज भारत का हिस्सा होते हुए बी पाकिस्तान के कब्जे में है, वहाँ के लोगों का लिए पाकिस्तान ने जीना हराम कर दिया है।
मुंबई आए इंस्टीट्यूट ऑफ गिलगिट बाल्टिस्तान स्टडीज़ के अध्यक्ष एवँ शिया नेता श्री सेंजे हसन सेरिंग ने मुंबई में कहा कि गिलगिट बाल्टिस्तान का जम्मू कश्मीर से 20 गुना ज्यादा क्षेत्रफल है और इस पर पाकिस्तान ने कब्जा कर रखा है। गिलगिट बाल्टिस्तान भारत के लिए रणनीतिक महत्व का तो है ही यहाँ खनिज संपदा और सोना भी प्रचुर मात्रा में है। यह क्षेत्र भारत को सीधे रुस और अफगानिस्तान से लेकर मध्य पूर्व के सबी देशों से जोड़ता है। यहाँ की आबादी मात्र 20 लाख है। पिछले 500-600 साल से ये क्षेत्र जम्मू कश्मीर के अधीन रहा है। यहाँ की 80 प्रतिशत आबादी शिया मुस्लिमों की है जबकि 20 प्रतिशत आबादी सुन्नी मुस्लिमों की है। पाकिस्तान सुन्नी मुस्लिमों के माध्यम से यहाँ शियाओं को जबरन सुन्नी मुस्लिम बना रहा है और शियाओं पर अत्याचार कर उन्हें उनके अधिकारों से वंचित कर रहा है। आज हालात ये है कि अगल लोग अपने अधिकारों के लिए सड़क पर लड़ाई लड़े तो उन्हें या तो जेल में डाल दिया जाता है या गोली मार दी जाती है। अपने अधिकारों के लिए लड़ने वाले 12 लोगों को उम्र कैद की सजा दी गई है ते 400 लोगों पर राषट्र द्रोह के फर्जी मुकदमे थोप दिए गए हैं।
गिलगिट बाल्टिस्तान के पूरे क्षेत्र पर नियंत्रण के लिए पाकिस्तान सरकार के एक मंत्री को अधिकार दिए गए हैं। पाकिस्तान सरकार यहाँ की कीमती खदानें विदेशी कंपनियों को बेच रही है जबकि उसका यहाँ कोई अधिकार ही नहीं है। चीन यहाँ 100 अरब डॉलर का निवेश करके कारकन क्षेत्र में हाई वे बना रहा है, बाँध बना रहा है ताकि वह सीधे यहाँ अपना दखल दे सके। चीन इस क्षेत्र में 18 अरब डॉलर की एक सुरंग भी बना रहा है जो यहाँ की सुरक्षा के साथ ही पर्यावरण के लिए भी गंभीर खतरा है।
1280 किलो मीटर लंबा यह हाईवे पाकिस्तान के एबटाबाद के निकट हवेलियन रेलवे को चीन के झियांग प्रांत के कशगर को जोड़ता है। इसे चीन की मदद से 1978 में बनाया गया था। क्षेत्रीय सुरक्षा के लिहाज से खास तौर से भारत के कई सामरिक हित इससे जुड़े हैं। गुलाम कश्मीर में चीन की विकास परियोजनाओं का जिक्र करते हुए रिपोर्ट में कहा गया है चीन की कई कंपनियां नीलम-झेलम, गोमल जाम और मंगला बांध के पुनर्निर्माण समेत कई पनबिजली परियोजनाओं पर काम कर रही हैं।
श्री शेंजे सीरिन ने कहा कि विगत दो साल में विरोध करने पर पाकिस्तान ने 200 शिया मुसलमानों को मार दिया। यहाँ कोई कॉलेज इंजीनियरिंग कॉलेज पोलीटेक्नी कॉलेज नहीं है। यह क्षेत्र 10 जिलों में बँटा हुआ है और यहाँ विधानसभा की 24 सीटें है। पाकिस्तान के संविधान के अनुसार पाकिस्तान की कोई पार्टी यहाए चुनाव नहीं लड़ सकती लेकिन सभी प्रमुख पार्टियाँ संविधान की धज्जियाँ उड़ाकर यहाँ चुनाव लड़ती है और स्थानीय लोगों को अपने राजनैतिक और संवैधानिक अधिकारों से वंचित रखती है।
धर्मान्ध सुन्नी हत्यारों का एक दल-डेथ स्क्वैड-पश्चिमी पाकिस्तान के क्वेटा नगर में हजारा सम्प्रदाय के लोगों को खोज-खोज जातीय हिंसा से बचने के लिए अनेक युवा देश छोड़ कर दक्षिण पूर्वी एशिया के देशों, लंका व आस्ट्रेलिया या इन्डोनेशिया तक भी जाकर बस चुके हैं।
चीन के लिए यह क्षेत्र भौगोलिक स्तर से भी काफी महत्वपूर्ण है। चीन इस रास्ते मध्य एशिया से सीधा संपर्क कर सकता है। चीन यहां बड़े पैमाने पर निवेश कर समुद्र के रास्ते पश्चिम एशिया पर शिकंजा कसने के लिए काराकोरम में निर्माण कार्य करा रहा है।
श्री सेंजे शीरिन ने कहा कि भारत को कारगिल से बाल्टिस्तान का मार्ग खोल देना चाहिए ताकि दोनों क्षेत्रों के जो 15 हजार परिवार एक दूसरे के रिश्तेदार हैं वे आपस में मिल सकें। बारामूला से गिलगिट तीन घंटे में पहुँचा जा सकता है। उन्होंने कहा कि गिलगिट बाल्टिस्तान के सभी नागरिक अपने आपको पीढ़ियों से भारत का निवासी मानते आए हैं और आज भी वे अपनी संस्कृति, मूल्यों और जीवन शैली के हिसाब से भारत को अपने निकट पाते हैं। अगर भारत सरकार और भारत की जनता इस क्षेत्र के लोगों पर हो रहे पाकिस्तानी अत्याचारों के खिलाफ आवाज उठाती है तो इससे इस क्षेत्र के लोगों का भारतीय जनता और भारत सरकार में विश्वास पैदा होगा।
श्री शींजे सिरिन ने मुंबई में आईआईटी में छात्रों से भी संवाद कर उन्हें गिलगिट बाल्टिस्तान के बारे में जानकारी दी। वे मुंबई के कई प्रमुख शिया मुस्लिम नेताओं से भी मिले और पाकिस्तान द्वारा शिया मुस्लिमों पर किए जा रहे अत्याचारों के बारे में विस्तार से बताया।
क्या है गिलगिट बाल्टिस्तान का इतिहास?
जम्मू-कश्मीर के इस क्षेत्र को पाकिस्तान ने विधिवत अपना प्रांत घोषित कर उसका सीधा शासन अपने हाथ में ले लिया है। यह लगभग 63 हजार वर्ग किमी. विस्तृत भू-भाग है, जिसमें गिलगित लगभग 42 हजार वर्ग किमी. और वाल्टिस्तान लगभग 21 हजार वर्ग किमी. है। गिलगित का सामरिक महत्व है। यह वह क्षेत्र है जहां 6 देशों की सीमाएं मिलती हैं- पाकिस्तान, अफगानिस्तान,तजाकिस्तान, चीन, तिब्बत एवं भारत। यह मध्य एशिया को दक्षिण एशिया से जोड़ने वाला दुर्गम क्षेत्र है जो सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है तथा जिसके द्वारा पूरे एशिया में प्रभुत्व रखा जा सकता है।
अमेरिका भी पहले गिलगित पर अपना प्रभाव रखना चाहता था और एक समय चीन के बढ़ते प्रभुत्व को रोकने के लिये सोवियत रूस की भी ऐसी ही इच्छा थी,इसलिये 60 के दशक में रूस ने पाकिस्तान का समय-समय पर समर्थन कर गिलगित को अपने प्रभाव क्षेत्र में लाने का प्रयास किया था। वर्तमान में गिलगित में चीन के 11000 सैनिक तैनात हैं। पिछले वर्षों में इस क्षेत्र में चीन ने लगभग 65 हजार करोड़ रूपये का निवेश किया व आज अनेक चीनी कम्पनियां व कर्मचारी वहां पर काम कर रहे हैं।
1935 में जब सोवियत रूस ने तजाकिस्तान को रौंद दिया तो अंग्रेजों ने गिलगित के महत्व को समझते हुये महाराजा हरिसिंह से समझौता कर वहां की सुरक्षा व प्रशासन की जिम्मेदारी अपने हाथ में लेने के लिये 60 वर्ष के लिये इसे पट्टे पर ले लिया। 1947 में इस क्षेत्र को उन्होंने महाराजा को वापिस कर दिया। इसकी सुरक्षा के लिये अंग्रेजों ने एक अनियमित सैनिक बल गिलगित स्काउट का भी गठन किया।
मोदी राज में तो हि्न्दी की और दुर्गति कर दी सरकारी बाबुओं ने
जब नवभारत टाइम्स में एक सरकारी विज्ञापन देखा तो अचानक पाक्षिक पत्रिका सरिता की याद आ गई। तब मैं उसी संस्थान में था। एक बार रिपोर्टिंग के लिए इलाहाबाद गया था। वहां एक अधिकारी ने मेरी काफी आवभगत की और बातों ही बातों में कहने लगा कि भई मान गए। सरिता तो एकदम लाइफब्वाय साबुन की तरह से है। पिछले 30-35 सालों में कुछ भी नहीं बदला है। वही कलेवर, वही सामग्री, वैसा ही स्तंभ। ठीक जैसा कि इस साबुन के साथ है कि वही पुराना लाल रंग, वही पुरानी महक और तो और वही पुराना फुटबाल खेलते हुए खिलाड़ियों वाला विज्ञापन। तब सरिता में एक स्तंभ छपता था कि यह किस देश, प्रदेश की भाषा है? इसमें हिंदी की ऐसी तैसी करने वाली रचनाओं, अनुवादों, कृतियों को छापा जाता था। आज इसका जिक्र करना इसलिए जरुरी हो गया क्योंकि जब अच्छे दिनों का सपना दिखाने वाले व हिंदी भाषा पर गर्व करने वाले नरेंद्र मोदी सत्ता में आएं तो लगा कि कम से कम हमारी मातृभाषा के दिन तो जरुर बहुरेंगे।
जहां एक ओर वे नियम-कानूनों को सरल बनाने की बात कर रहे हैं तो कम से कम हिंदी के साथ होने वाले अन्याय को तो जरुर रोकेंगे, पर इस विज्ञापन में जिस तरह से अंग्रेजी के मूल का हिंदी में अनुवाद हुआ है उसे देखकर लगता है कि जो कुकर्म चंद अपराधियों ने 16 दिसंबर की रात निर्भया के साथ किया था, वही काम यह सरकारी बाबू हिंदी के साथ करने पर आमादा है।
लगभग आधे पेज के इस विज्ञापन का शीर्षक है कि विश्व पुस्तक तथा प्रतिलिप्याधिकार दिवस। नीचे लिखा है कि प्रतिलिप्याधिकार (कॉपीराइट) का सम्मान …। विज्ञापन के इसी पैरे में कहा गया है प्रतिलिप्याधिकार प्राप्त कृति के रचयिता अथवा स्वामी की कृतियों से संबंधित कतिपय विशिष्ट आर्थिक अधिकार होंगे। लेखक की सेवा संविदा के अधीन रोजगार के दौरान किए गए किसी कृति के मामले में किसी विपरीत करार की अनुपस्थिति में नियोजनकर्ता ही प्रतिलिप्याअधिकार का प्रथम स्वामी होगा…. लेखकत्व का आरोपन का अधिकार तथा सत्यनिष्ठा और सम्मान का अधिकार इस अधिनियम के तहत मान्य नैतिक अधिकार है। … आगे सृजनशीलता को संबंधित करने तथा प्रकाशित कृतियों के व्यवहार्य सुलभता हेतु उचित उपयेाग में सार्वजनिक हित के संरक्षण हेतु, संविधि में स्वामी के प्राधिकृत किए जाने बिना ही प्रतिलिप्याधिकृत कार्यों के अनेक प्रकार से उपयोग के लिए तथा सर्वाधिक अथवा अनिवार्य लाइसेंस जारी करने के लिए प्रावधान है। ….. यह सब पढ़कर लगा कि मैं अपना सिर पीट लूं। हिंदी मेरी मातृभाषा है। पिछले 45 साल से मैं हिंदी में लिख रहा हूं, छप रहा हूं। कम से कम मेरी समझ में तो यह नहीं आया कि जो कुछ हिंदी में लिखा गया है उसका मतलब क्या हैं! मामला यहीं तक सीमित नहीं आगे कहा गया है कि प्रतिलिप्याधिकार अधिनियम में संशोधन किया गया है जिसके द्वारा नेत्रहीन, दृष्टिबाधित और देख न पाने वालों के लिए रुपांतरित, पुर्नत्पादन करने… मेरी समझ से परे है कि नेत्रहीन, दृष्टिबाधित और देख न पाने वाले में क्या अंतर होता है?
जरा और देखिए प्रतिलिप्याधिकार का अतिलंघन…तब होता है…. किसी कृति के अनाधिकृत वाणिज्यिक शोषण से…। इंसान का शोषण तो सुना था पर यहां तो कृति का भी शोषण हो रहा है। … कृति की यथार्थ प्रतियों… आप जिसके द्वारा सृजनात्मक वातावरण के संवर्धन में सहायता मिलती है। वगैरह-वगैरह! यह विज्ञापन साबित करता है कि अभी तक न तो हमने हिंदी में मौलिक लेखन शुरु किया है और न ही हम इस भाषा में सोच रहे हैं। अफसरशाही, विज्ञापन का मसौदा तैयार करने वाले बाबू सब अंग्रेजी से टीप रहे हैं। हिंदी का इससे ज्यादा दुर्भाग्य और क्या हो सकता है। बीमा कंपनियों द्वारा एक नारे का इस्तेमाल किया जा रहा है कि ‘बीमा आग्रह की विषय वस्तु है’। मैंने तमाम बीमा कंपनियों के अफसरों से पूछा कि भई इसका मतलब क्या होता है पर आज तक कोई नहीं बता सका। आज भी संसद में जो दस्तावेज हिंदी में उपलब्ध कराए जाते हैं उन्हें समझ पाना बहुत मुश्किल होता है। उन्हें समझने के लिए हिंदी के साथ अंग्रेजी की भी प्रति लेनी पड़ती है। ऐसा लगता है कि अनुवादकर्ता डिक्शनरी खोलता है और संबंधित शब्द के जितने अर्थ दिए होते हैं, उसमें से जो उसको अच्छा लगता है वह चुन लेता है। मैंने भी एक बार यही किया था पर जान बूझकर, हंगामा खड़ा करने के लिए। तब सीताराम केसरी कांग्रेस के अध्यक्ष थे। कांग्रेस पार्टी ने अपनी चुनावी संभावनाओं और अपने बारे में एक सर्वेक्षण करवाया। सर्वे करने वाली कंपनी ने अपनी रिपोर्ट में लिखा कि ‘पार्टी लीडरशिप इज एजेड एंड जेडेड’।
यह रिपोर्ट मेरे हाथ लग गई। मैंने डिक्शनरी खोली। उसमें ‘जैडेड’ शब्द के अर्थ देखे। तीन चार मायने दिए गए थे। एक था ‘मरियल घोड़ा’। बस फिर क्या था। मैंने खबर बनाई कि कांग्रेस का अपना सर्वे मानता है कि उसका नेतृत्व बूढ़ा और मरियल घोड़े जैसा है। खबर छपी नहीं कि हंगामा खडा हो गया। सबसे पहले चचा केसरी ने मुझे फोन करके जमकर कोसा। मैंने करीब दो दशकों तक कांग्रेस कवर की पर कभी वहां हिंदी में प्रेस रिलीज नहीं मिली। अब कमोबेश यही स्थिति भाजपा की भी है। पायनियर की लक्ष्मी अय्यर मेरे साथ ही हर जगह जाती थीं। उनके साथ रहने से मुझे फायदा होता था। जो नेता अपना नाम भी अंग्रेजी में नहीं लिख पाते थे वे भी चाहते थे कि उनकी खबर अंग्रेजी में छपे। जिस देश का प्रधानमंत्री विदेश जाकर भी हिंदी में बोलता हो उसकी सरकार में भाषा की इतनी दुर्गति कैसे सहन की जा सकती है?
कांग्रेस की बात तो समझ में आती थी। उसके प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कार्यालय तक में हिंदी अनुवाद की व्यवस्था नहीं थी। एक बार जब पंकज पचौरी से इस बारे में बात की तो वे कहने लगे कि आप हमारी तुलना अमेरिकी राष्ट्रपति के कार्यालय से न करें। जिस प्रधानमंत्री की सुरक्षा पर ही करोड़ों खर्च हो जाते हो वहां एक हिंदी अधिकारी या अनुवादकर्ता तक की नियुक्ति नहीं की जा सकती है। खैर कांग्रेस को इसकी सजा मिली। हिंदी भाषी राज्यों में जिस तरह से उसका सूपड़ा साफ हुआ व सबके सामने हैं पर अटल बिहारी वाजपेयी और मदन मोहन मालवीय को भारत रत्न से सम्मानित करने वाली राजग सरकार को तो हिंदी की अस्मत लुटने से बचाना चाहिए। –
(लेखक एक वरिष्ठ पत्रकार हैं। विनम्र उनका लेखन नाम है।)
साभार- http://www.nayaindia.com/ से
पत्नी सरपंच बनी, पति ने शपथ ले ली
मध्य प्रदेश के शुजालपुर के हन्नूखेड़ी में पंचायत चुनाव में पत्नी सरपंच चुनी गई लेकिन शपथ उसके पति ने ली। मामला 24 मार्च का है खास बात ये है कि सरपंच पति उज्जैन स्थित आरटीओ कार्यालय में आरक्षक के पद पर पदस्थ है। मामला सामने आने के बाद जनपद सीईओ ने सरपंच व उसके पति के विस्र्द्ध कार्रवाई के लिए उज्जैन कमिश्नर व शाजापुर कलेक्टर को पत्र लिखे हैं।
मामला शुजालपुर जनपद पंचायत की ग्राम पंचायत हन्नूखेड़ी का है। इस ग्राम पंचायत में सरपंच पद महिला के लिए आरक्षित होने के चलते गांव की ही महिला लक्ष्मीबाई पति नरेंद्रकुमार 300 से अधिक मत लेकर विजयी हुई थी लेकिन 24 मार्च को हुए शपथ समारोह में महिला सरपंच लक्ष्मीबाई के स्थान पर उनके पति ने शपथ ले ली। शपथ समारोह में विधिवत रूप से पंचायत सचिव दुर्गाप्रसाद धनगर ने सरपंच लक्ष्मीबाई के स्थान पर आरटीओ में पदस्थ नरेंद्रकुमार को शपथ दिलवाई।
परिजन बोले- महिलाएं सामने नहीं आती
इस संबंध में सरपंच लक्ष्मीबाई के ससुर व अन्य परिजनों से चर्चा की गई तो उनका कहना है कि गांववालों के सामने महिलाएं नहीं आती है। पड़ौसी गांव पगरावदकलां में भी हमारे ही रिश्तेदार की महिला सरपंच चुनी गई है लेकिन शपथ पुस्र्षों ने ही ली है। अपनी बात आगे बढ़ाते हुए सरपंच के ससुर ने कहा कि बैंक में चेकबुक पर साइन भी महिला के बजाए उनके पति ही करते हैं।
कमिश्नर, कलेक्टर को लिखे पत्र
जानकारी मिली है कि ग्राम पंचायत हन्नूखेड़ी की सरपंच लक्ष्मीबाई के स्थान पर उनके पति नरेंद्रकुमार ने शपथ ली थी। इस पर सचिव व सरपंच के खिलाफ धारा 40 के अंर्तगत शोकाज नोटिस जारी किए गए हैं। सरपंच व सचिव के जबाव से संतुष्ठ न होने के कारण प्रतिवेदन कलेक्टर को भेजा गया है। साथ ही परिवहन विभाग में पदस्थ नरेंद्रकुमार पर भी कार्रवाई के लिए उज्जैन कमिश्नर प्रतिवेदन भेजा गया है।
अमितकुमार व्यास, जनपद सीईओ शुजालपुर
साभार-दैनिक नईदुनिया से
कुछ हटकर सोचते हैं श्री सुरेश प्रभु
जीवाश्म ईंधन से इस्तेमाल से निकलने वाली ग्रीनहाउस गैसों के हानिकारक प्रभावों पर सचेत करते हुए रेल मंत्री सुरेश प्रभु ने सौर और पवन उर्जा जैसी वैकल्पिक उर्जा के उपयोग के माध्यम से उर्जा परिदृश्य में बड़े बदलाव की वकालत की है।
पिछले दिनों दिल्ली में एक स्मारक व्याख्यान में श्री प्रभु ने कहा, ‘दुनिया भर में बड़े पैमाने पर जीवाश्म ईंधन के इस्तेमाल से ग्रीन हाउस गैस का उत्सर्जन हो रहा है जिसका जलवायु पर बहुत बुरा असर पड़ रहा है। सभी लोग सहमत हैं कि जीवाश्म ईंधन के इस्तेमाल से निकलने वाली ग्रीन हाउस गैस वायुमंडलीय तापमान बढ़ा रही है और जलवायु में परिवर्तन ला रही है।’ ग्रीन हाउस गैस के उत्सर्जन के परिणामों की व्याख्या करते हुए उन्होंने कहा, ‘हाल की बेमौसम वर्षा और मौसम में इतने बड़े बदलाव की कल्पना नहीं की जा सकती। अतिवादी मौसम से कृषि पर बुरा प्रभाव पड़ रहा है मसलन फसलें नष्ट हो रही हैं।’ प्रभु ने कहा कि वर्तमान उर्जा परिदृश्य पर्यावरण की दृष्टि से टिकाउ नहीं है।
उन्होंने कहा, ‘हमें अवश्य ही उर्जा के नए स्रोत को ढूंढना चाहिए जो टिकाउ हो और आज यह एक बड़ी चुनौती है।’ सौर और पवन उर्जा की वकालत करते हुए उन्होंने कहा कि ये उर्जा परिदृश्य में एक बड़ा बदलाव ला सकती हैं। उन्होंने कहा, ‘भारत में 300 दिनों तक अच्छी धूप होती है। हमें सौर उर्जा का आयात नहीं करना होगा। हमें सौर उर्जा पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।’
सामाजिक समरसता की विशाल धर्मसभा मंगल को रेसकोर्स में, 50 हजार लोग भाग लेंगे
मुंबई। सामाजिक समरसता मंच द्वारा मुंबई में मंगलवार (21 अप्रैल) को विशाल धर्म सभा का आयोजन किया जा रहा है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह भैयाजी जोशी एवं महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस इस अवसर पर विशेष रूप से उपस्थित होंगे। मुंबई में हो रही अपनी तरह की इस पहली धर्म सभा में अनुसूचित जाति, जनजाति एवं इतर समाज के सभी प्रमुख संतों के मार्गदर्शन में सामाजिक विकास एक समरसता पर चिंतन होगा। इस अवसर पर दिन भर चलनेवाले विशेष आयोजनों में 50 हजार से भी ज्यादा लोग हिस्सा लेंगे।
‘एक सोच, एक दिशा’ के सामाजिक उद्देश्य को लेकर महालक्ष्मी रेसकोर्स के पोलो ग्राउंड में होनेवाली इस विशाल धर्मसभा में सामाजिक समरसता मंच के अखिल भारतीय संयोजक भीकूजी इदाते, महाराष्ट्र के सामाजिक न्यायमंत्री राजकुमार बडोले एवं सामाजिक न्याय राज्यमंत्री दिलीप कांबले भी विशेष रूप से उपस्थित होंगे। यह धर्म सभा शाम 5 बजे से रात 9 बजे तक चलेगी। इस अवसर पर सभा स्थल पर सुबह 9 बजे से समरसता यज्ञ शुरू होगा। सभा स्थल पर 30 से भी ज्यादा स्टॉल लगाए जा रहे हैं, जहां अनुसूचित जाति, जनजाति एवं इतर समाज के विकास के लिए चलाई जा रही विभिन्न सरकारी योजनाओं की जानकारी लोगों को दी जाएगी। इस अवसर पर महिलाओं के लिए विशेष हेल्थ चेकअप कैंप का भी आयोजन किया गया है। सभा स्थल पर पहुंचने के लिए महालक्ष्मी स्टेशन से बसों का विशेष इंतजाम किया गया है।
सुबह 9 बजे से शुरू होनेवाले विभिन्न आयोजनों एक खास आयोजन होगा मुंबई मेघवाल पंचायत का सामूहिक विवाह का, जिसमें करीब 50 से ज्यादा जोड़े एक साथ परिणय बंधन में बंधेंगे। कुल 50 हजार से भी ज्यादा लोगों की सहभागिता वाले इस आयोजन को सफल बनाने में करीब 150 से भी ज्यादा कार्यकर्ता पिछले एक महीने से इस लगे हुए हैं। मुंबई में दलित समाज का अब तक का यह सबसे यूनिक आयोजन होगा, जिसमें विकास के साथ साथ सामाजिक समरसता व एक सोच – एक दिशा की धारा को आगे बढ़ाने पर चिंतन भी होगा।
हाथ उठते नहीं कि दुआ क़ुबूल हो जाती है
संसार में सब एक-दूसरे से मिलजुल कर ही काम कर सकते हैं। आपकी भावनाएं दूसरों के लिए साफ होनी चाहिए क्योंकि जैसी भावना आप दूसरे के लिए रखते हैं, वैसी ही वह आपके लिए रखता है। आप किसी को प्यार करते हैं तो वह आपको प्यार करता है। आप किसी को प्रसन्न करते हैं तो वह भी आपको प्रसन्न करता है। ऐसे ही अगर आप किसी से नफरत करते हैं तो वह भी आपसे नफरत ही करेगा। अगर आप किसी पर गुस्सा करते हैं तो वह भी आप पर गुस्सा ही करेगा। संसार में जैसा दूसरे के साथ व्यवहार करते हैं,वैसा ही वापस मिलता है। जीवन प्रतिध्वनि का दूसरा नाम है।
जब तक आप खुद के कामों को अनासक्त भाव से नहीं करेंगे, तब तक मन की सफाई नहीं होगी। क्योंकि साफ मन ही सबकी भलाई का भाव रख सकता है इसलिए भगवान कृष्ण कहते हैं कि तुम सभी के लिए प्रसन्नता का भाव रखो, बदले में वह भी तुम्हारे लिए प्रसन्नता का भाव ही रखेंगे और इस प्रकार एक-दूसरे को प्रसन्न रखते हुए तुम अपने लक्ष्य को पा सकोगे।
जब हम स्वार्थ और अहंभाव के साथ कोई काम करते हैं, तब वह कर्म और फल देता है। जब तक वह कर्म, फल नहीं दे देता तब तक उस कर्म का बंधन बना ही रहता है। लेकिन जब मन में ये भाव हो कि जो काम मैं करता हूं, वह प्रकृति में की गई मेरी एक सेवा है और उसमें मेरा कोई स्वार्थ नहीं है। ऐसे में वह काम फल देने वाला नहीं होगा।बाकी सभी किए गए सभी काम फल जरूर देंगे। काम तो करना ही है, क्यों न अपने कर्मों के फल की चिंताओं से धीरे-धीरे अलग होना शुरू करें।
कोई भी प्राणी कार्य किए बिना रह नहीं सकता। यदि वह शरीर से कार्य नहीं करेगा तो मन से कर लेगा। यह संसार सत्व,रज व तम, तीन गुणों से मिलकर बना है। ये गुण हर पल काम करते रहते हैं। हल्कापन, गति, भारीपन, सुख-दुःख और मोह इन तीन गुणों के कारण ही होते हैं। हमारा शरीर भी इन्हीं तीनों गुणों से मिलकर बना है इसलिए शरीर में भी इन तीनों गुणों के कारण हर वक्त काम होता ही रहता है। यदि कोई व्यक्ति कहे कि मैं कर्म नहीं करूंगा तो यह उसकी नासमझी होगी क्योंकि ऊर्जा गतिशील होती है।
बस एक चीज हमारे वश में है कि होते हुए काम को हम अपने अनुरूप दिशा दे सकते हैं। पुण्य कर्म भी कर सकते हैं और पाप कर्म भी, सकाम भी कर सकते है निष्काम भी। जब काम हम नहीं करते बल्कि गुण हमसे करवाते हैं तो अच्छा होगा कि हम यह न समझें कि मैं कर्ता हूं, बल्कि ऐसा मानें कि मैं बस इस काम का साधन हूं। ऐसा अकर्ता भाव रखने से हम कर्म के फल के बंधन में नहीं बंधेंगे और चित्त शुद्ध रहेगा। यही तो गीता के कर्मयोग का सार है।
कई लोग हैं जो भरपूर सुख-सुविधा मिलने के बाद भी अपने जीवन से असंतुष्ट रहते हैं। ऐसा क्यों? क्या धन, पद, सम्मान, ऐश्वर्य जीवन को आनंद नहीं दे पा रहे? क्या मनुष्य के भीतर कोई अपराधबोध बना रहता है? इस खुशी रहित स्थिति को ग्रीक भाषा में 'एन्हेडोनिया' कहते हैं- जिंदगी में आनंद को न समझने की दशा। इसका कारण है असंतुष्टि,अत्यधिक महत्वाकांक्षा,असीम लोकप्रियता की चाह और मानसिक एवं शारीरिक थकान।घड़ी की तेज सरकती सुइयां। सड़कों पर दूर-दूर तक फैली वाहनों की कतारें हैं। ट्रैफिक जाम, बॉस की तनी भृकुटियां, सहयोगियों की बीच की शीशे की दीवारें,दूषित पर्यावरण और आधुनिक दिनचर्या है। कमजोर पड़ता सामाजिक ढांचा, सुख-सुविधाओं की बढ़ती प्यास, घर-ऑफिस में खींचा-तानी, रोज के पल-पल के समझौते, दम तोड़ती आशाएं और मन की टूटन है।
अनासक्ति के भाव से किया गया काम मन को शांति देता है। जीवन को आनंदमय करने का सरल उपाय है- संसार के प्रति अपनी आसक्ति को कम करते जाना। जब हम अनासक्त भाव से कार्य करते हैं तो वह कर्मयोग कहलाता है और आसक्ति से करते हैं तो वह कर्मभोग होता है। कर्मयोग में हम कर्म करते हुए अपनी चेतना से जुड़े रहते हैं। इसके लिए अपने मन में थोड़ा भाव बदलना होता है कि मेरे द्वारा किए गए सभी कार्य प्रभु की सेवा है। मेरा अपना कोई स्वार्थ नहीं, जो कार्य सामने आता है,वह करता हूं!
जैसे शुगर की बीमारी में व्यक्ति मन से जीभ को काबू कर मीठा नहीं खाता,वैसे ही सभी इंद्रियों को मन से वश में कर लिया जाता है! इंसान सोचता है कि किसी को मेरे विषय-विकारों का पता ना चले और खुद को अच्छा जताने के लिए ऊपर से अच्छेपन को ओढ़ लेता है। इसी प्रकार अच्छा खाने-पीने और मौज-मस्ती में ज़िंदगी बीत जाती हैं। ये बुराइयां केवल युवावस्था में ही अपना जोर नहीं मारतीं बल्कि बुढ़ापे में भी उनका जोर बना रहता है, बस तब शरीर साथ नहीं देता। इसलिए अच्छा यही है कि हम पाखंडी बनकर न रहें, मन को निर्मल बनाकर जियें।
जो बाहर से तो शरीर को संचालित करने वाली इंद्रियों को नियंत्रित कर लेता है; परन्तु मन से उन इंद्रियों के विषयों का चिंतन करता रहता है, वह तय है कि दुहरी ज़िंदगी जी रहा है। …और जिसने पाक दिल और साफ़ मन से उसे याद किया,उसकी प्रार्थना कभी खाली नहीं जाती। वह बरबस बोल उठता है –
तेरी रहमत देखकर मेरी आँख भर आती हैं
हाथ उठते नहीं कि दुआ क़ुबूल हो जाती है
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प्राध्यापक,शासकीय दिग्विजय
पीजी ऑटोनॉमस कालेज,
राजनांदगांव। मो.9301054300
मीडिया डेस्क
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कैनेडा से प्रकाशित हिन्दी चेतना का नया अंक इंटरनेट पर
कैनेडा से प्रकाशित त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका 'हिन्दी चेतना' का अप्रैल-जून 2015 अंक अब इंटरनेट पर उपलब्ध है। अंक में शामिल है- कहानियाँ : इमेज (प्रज्ञा ), मोहभंग (वंदना देव शुक्ल ), शारदा (महेन्द्र दवेसर दीपक ), गॉड ब्लैस यू … (डॉ. वंदना मुकेश ), रस्म-ए-इजरा (भूमिका द्विवेदी अश्क )। लघुकथाएँ : आख़िरी पड़ाव का सफर (सुकेश साहनी ), भीतर की आग (डॉ. सतीशराज पुष्करणा ), चेतना (मधुकान्त )। विश्व के आँचल से: एक थी माया (गरिमा श्रीवास्तव ), प्रवासी साहित्य की अवधारणा और स्त्री कथाकार (निर्मल रानी )।
दृष्टिकोण: अमेरिका में बसे प्रवासी और उनकी काव्य साधना (मंजु मिश्रा )। गीत (रजनी मोरवाल )। कविताएँ: डॉ. कविता भट्ट , प्रिया राणा , प्रेम गुप्ता ‘मानी’, सुशीला शिवराण , अभिनव शुक्ल , सौरभ पाण्डेय , रेखा भाटिया, पारुल सिंह , सविता अग्रवाल ‘सवि’, नीलम मलकानिया । दोहे: अशोक अंजुम । ग़ज़लें: सुशील ठाकुर , रमेश तैलंग । हाइकु: डॉ. सुरेन्द्र वर्मा , डॉ. अर्पिता अग्रवाल , डॉ.गोपाल बाबू शर्मा। भाषांतर: ज़ेबा अल्वी। अविस्मरणीय: नज़ीर बनारसी। संस्मरण: सैली बलजीत। ओरियानी के नीचे: रेनू यादव। पुस्तक समीक्षा: देवी नागरानी , पूनम माटिया । पुस्तकें। साहित्यिक समाचार। विश्व पुस्तक मेले की झलकियाँ। साथ में सम्पांदकीय, साहित्यिक समाचार, चित्रमय झलकियाँ, विलोम चित्र, तथा आख़िरी पन्ना।
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खिलाड़ियों के लिए कंद्र सरकार की योजनाएँ
युवा कार्यक्रम और खेल राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) श्री सर्बानंद सोनोवाल ने बताया कि युवाओं के कल्याण और खिलाड़ियों के लिए एथलेटिक्स सहित खेलों को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न स्कीमों को तर्कसंगत बनाने के लिए सचिव, युवा कार्यक्रम तथा महानिदेशक, भारतीय खेल प्राधिकरण (साई) की अध्यक्षता में क्रमशः युवा कार्यक्रम विभाग और खेल विभाग प्रत्येक में एक समिति का गठन किया गया है।
किसी भी खेल विधा के विकास और संवर्धन की मुख्य जिम्मेदारी राज्य सरकारों और संबंधित मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय खेल परिसंघों (एनएसएफ) की होती है। एथलेटिक्स के लिए यह जिम्मेदारी भारतीय एथलेटिक्स परिसंघ (एएफआई) की है। सरकार तो सम्मत दीर्घावधि विकास योजनाओं के अनुसार भारत में राष्ट्रीय/अंतर्राष्ट्रीय खेल स्पर्धाओं के आयोजन, विदेशों में अंतर्राष्ट्रीय खेल स्पर्धाओं में खिलाड़ियों/टीमों की भागीदारी, भारतीय और विदेशी कोचों के माध्यम से राष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ियों/टीमों के प्रशिक्षण/ कोचिंग, उपकरणों और उपभोज्य वस्तुओं की खरीद आदि के लिए वित्तीय सहायता प्रदान करके एनएसएफ के प्रयासों की पूर्ति करती है।
राज्य स्तर पर, विभिन्न खेल विधाओं के विकास की जिम्मेदारी राज्य स्तर के परिसंघों और संबंधित राज्य सरकारों की है। इसके अतिरिक्त, भारतीय खेल प्राधिकरण निम्नलिखित संवर्धन स्कीमें चला रहा है जिनमें एथलेटिक्स एक खेल विधा है और राष्ट्रीय/अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उत्कृष्टता प्राप्त करने के लिए खिलाड़ियों को अनुभवी कोचों द्वारा वैज्ञानिक बैकअप सहित प्रशिक्षण प्रदान किया जाता हैः
1) राष्ट्रीय खेल प्रतिभा प्रतियोगिता स्कीम (एनएसटीसी)
2) सेना बाल खेल कंपनी (एबीएससी)
3) साई प्रशिक्षण केंद्र (एसटीसी)
4) विशेष क्षेत्र खेल (एसएजी)
5) उत्कृष्टता केंद्र (सीओई)
साई में खेल संवर्धन स्कीमें हैं जिनके अंतर्गत एथलेटिक्स की विधाओं में प्रशिक्षण दिया जाता है। ये स्कीमें निम्मलिखित हैः
· राष्ट्रीय खेल प्रतिभा प्रतियोगिता
· सेना बाल खेल कंपनी
· साई प्रशिक्षण केंद्र
· विशेष क्षेत्र खेल
· एसटीसी/एसएजी के विस्तार केंद्र
· राष्ट्रीय खेल अकादमियां
एथलेटिक्स खेल विधा के पिछले तीन वर्षो का स्कीम-वार और केंद्र-वार विवरण अनुबंध में दिया गया है। वर्ष 2015-16 के लिए प्रवेश प्रक्रिया अभी शुरू हुई है।
सरकार राजीव गांधी खेल अभियान (आरजीकेए) स्कीम के अंतर्गत वार्षिक खेल प्रतियोगिताओं के माध्यम से ग्रामीण प्रतिभाओं का पता लगाती है। भारतीय खेल प्राधिकरण (साई) की विभिन्न स्कीमों के अंतर्गत विचार किया जाता है, यदि वे अऩ्यथा पात्र हों। भारतीय खेल प्राधिकरण समाज के सभी वर्गों से खिलाड़ियों की पहचान और पोषण करता है। इसके क्षेत्रों में ग्रामीण और जनजातीय क्षेत्र शामिल हैं।
मंत्रालय ने राष्ट्रीय खेल प्रतिभा खोज स्कीम (एनएसटीएसएस) भी शुरू की है जिसका उद्देश्य ब्लाक के प्रत्येक स्कूल में छात्र पर प्रत्येक चयन स्तर पर 6 परीक्षण करके देशभर के स्कूलों से 8-12 वर्ष की आयु समूह में प्रतिभावान बच्चों (लड़के और लड़कियों) का पता लगाना है और उनका विकास करना है।