Home Blog Page 1932

मोदी जी के ’मेक इन इंडिया’ नारे को ज़ी टीवी ने पहुँचाया थाईलैंड

 ज़ी टीवी का लोकप्रिय कार्यक्रम डांस इंडिया डांस भारत के किसी मनोरंजन चैनल (जीईसी) का पहला ऐसा रिएलिटी शो है जिसके प्रसारण का लायसेंस एक विदेशी ब्रॉडकास्टर जेकेएन ग्लोबल मीडिया लिमिटेड थाईलैंड ने लिया है

थाईलैंड/ भारत, 9 अप्रैल, 2015. ये तो जगजाहिर है कि भारतीय के टीवी के प्राईम टाईम में दिखाए जाने वाले अधिकाशं लोकप्रिय मनोरंजन कार्यक्रम लोकप्रिय अंतर्राष्ट्रीय कार्यक्रमों की तर्ज पर विदेशी कंपनियों से उनके प्रसारण के अधिकार खरीदकर बनाए जाते हैं। लेकिन ज़ी एंटरटेनमेंट एंटरप्राईज़ेज़ लिमिटेड (झील) ने ब्रॉडकास्ट की दुनिया में एक नया इतिहास बनाया है, ज़ी ने जेकेएन ग्लोबल मीडिया लिमिटेड, थाईलैंड को अपने लोकप्रिय कार्यक्रम डांस इंडिया डांस के प्रसारण के अधिकार प्रदान किए हैं।

आज जबकि दुनिया भर के टीवी चैनलों पर जो भारतीय कार्यक्रम प्रसारित किए जा रहे हैं वे लगभग एक जैसे हैं, ऐसे में ये ऐतिहासिक सौदा अपने आप मेँ एक बड़ी उपलब्धि है क्योंकि ऐसा पहली बार हुआ है कि किसी भारतीय टेलीविज़न के मौलिक कार्यक्रम को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर लायसेंस दिया गया हो!

इस ऐतिहासिक उपलब्धि पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए ज़ी एंटरटेनमेंट एंटरप्राईज़ेज़ लिमिटेड के सीईओ एवँ एमडी श्री पुनीत गोयनका ने कहा कि “ ज़ी टीवी में हमने हमेशा अपने मौलिक कार्यक्रमों के निर्माण पर ध्यान दिया है। ये डांस इंडिया डांस को लेकर हमारा पूरा विश्वास था कि ये कार्यक्रम क्षेत्रीय से लेकर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाएगा। जेकेएन ग्लोबल मीडिया लिमिटेड के साथ इस भागीदारी से डीआईडी दक्षिण एशियाई दर्शकों के साथ ही थाईलैंड के स्थानीय दर्शकों में भी अपनी पहचान बनाएगा।“
श्री गोयनका ने कहा, “ हम और आगे जाकर हम डांस इंडिया डांस के अलावा भी हमारे अन्य कार्यक्रमों को भी अंतर्राष्ट्रीय बाजार में उतारेंगे।“
इस भागीदारी पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए जेकेएन ग्लोबल मीडिया लिमिटेड थाईलैंड के प्रबंध संचालक श्री एंड्र्यू सुटीस्टरैपॉन ने कहा-“हम इस बात बेहद प्रसन्न हैं कि डांस इंडिया डांस जैसे बेहद लोकप्रिय कार्यक्रम को हम स्थानीय स्तर पर भी दिखाने जा रहे हैं। ज़ी के साथ भागीदारी करते हुए, मेरा दृढ़ विश्वास है कि प्रोफेशनल टीम और लंबे अनुभव जेकेएन चैनल डांस थाईलैंड डांस सफलता नई ऊंचाई तय करेगा।“

ज़ी एंटरटेनमेंट एंटरप्राईज़ेज़ की ग्लोबल हेड सिंडिकेशन, सुश्री सुनीता उचिल ने कहा, “ हमें इस बात पर गर्व है कि हमारा मौलिक कार्यक्रम डांस इंडिया डांस अब जेकेएन चैनल के माध्यम से थाईलैंड के 22 मिलियन घरों तक पहुँचेगा। पिछले कुछ वर्षों से दुनिया भर में भारतीय मनोरंजन कार्यक्रमों की माँग बेहद बढ़ी है, और हमने ज़ी बॉलीवुड अंब्रेला के तहत डबिंग से लेकर विदेशी भाषा में उपशीर्षकों के साथ इस माँग को पूरा किया है। इस नए सौदे से वसुधैव कुटुंबकम-पूरा विश्व मेरा परिवार है, के आदर्श सोच का प्रतीक है और साथ ही ज़ी बॉलीवुड दुनिया भर में भारतीय मनोरंजन कार्यक्रमों की जरुरतों को पूरा करने के लिए एक महत्वपूर्ण मंच के रूप में उभरा है।
डांस की प्रतिभाओं को मंच प्रदान करने वाले डांस इंडिया डांस भारत में दर्शक संख्या का रेकॉर्ड तोड़ने के बाद अब अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर दर्शकों में अपनी पहचान बनाएगा।

===============================================================

ज़ी बॉलीवुड के बारे में
ज़ी बॉलीवुड में भारतीय मनोरंजन कार्यक्रमों का दुनिया का सबसे बड़ा संग्रह है। ये एकमात्र ऐसा स्त्रोत है जहाँ 120,000 घंटे के एक से एक शानदार मनोरंजन कार्यक्रम जिसमें, पारिवारिक मनोरंजन, रोमांस, बच्चों के कार्यक्रम, गेम शो, कुकरी शो, रोमांच, संगीत, यात्रा, रिएलिटी, फिल्म आधारित कार्यक्रम मौजूद हैं। ज़ी बॉलीवुड पर मौलिक एचडी कार्यक्रम दिखाए जाते हैं और इसमें कई विदेशी भाषाओं, जैसे अंग्रेजी, रुसी, मैंडेरियन और मेलायु भाषा में डबिंग किए हुए फिल्मों से लेकर टेलीविज़न धारावाहिक उपलब्ध हैं। विस्तृत जानकारी के लिए देखें www.zeebollyworld.com

ज़ी एंटरटेनमेंट एंटरप्रीज़ेज़ (झील) के बारे में
ज़ी एंटरटेनमेंट एंटरप्राईजडेज़ लिमिटेड देश की अग्रणी टेलीविज़न मीडिया एवँ मनोरंजन कंपनी है। ये दुनिया की सबसे बड़ी कंपनी है जिसके द्वारा सबसे ज्यादा हिन्दी कार्यक्रमों का निर्माण किया गया है।कंपनी के पास 120,000 घंटों के टेलीविज़न कार्यक्रम हैं। 3500 फिल्मों का संग्रह है, जिसमें कई यादगार फिल्मों से लेकर जाने माने कलाकारों की फिल्में भी शामिल हैं। ज़ी के पास दुनिया की सबसे बड़ी हिन्दी फिल्म लायब्रेरी है।  दुनिया भर में अपनी सशक्त मौजूदगी के साथ ज़ी दुनिया भर में 169 देशों में 730 मिलियन दर्शकों का मनोरंजन करता है। ज़ी को 2010-11 में बिज़नेस सुपरब्रांड चुना गया है।
भारत में टेलीविज़न उद्योग की शुरआत करने के साथ ही ज़ी समूह में ज़ी टीवी, ज़ी सिनेमा, ज़ी प्रीमिअर, ज़ी एक्शन, ज़ी क्लासिक, &पिक्चर्स, ज़ी अनमोल, ज़ी स्माईल, 9एक्स, टेन स्पोर्ट्स, ज़ी सलाम, झिंग, इटीसी म्यूज़िक, ज़ी खाना खज़ाना, ज़ी क्यू, ज़िंदगी और &टीवी जैसे चैनल शामिल हैं। क्षेत्रीय भाषायी चैनलों में ज़ी मराठी, ज़ी टाकीज़, ज़ी बांगला, ज़ी बांग्ला सिनेमा, ज़ी तेलुगु, ज़ी कन्न्ड़ और ज़ी तमीज़ शामिल हैं। हाल ही में एचडी में ज़ी टीवी, एचडी, ज़ी सिनेमा एचडी, ज़ी स्टुडिओ एचडी, &पिक्चर्स एचडी और टेन एचडी भी शुरु किए गए हैं।

ज़ी और इससे जुड़ी कंपनियाँ मीडिया, टेलीविज़न ब्रॉडकास्टिंग, कैबल डिस्ट्रीब्यूशन, डायरेक्ट-टू-होम सैटेलाईट सर्विस, डिजिटल मीडिया, और प्रिंट मीडिया सहित कई अन्य क्षेत्रों में सक्रिय है। विस्तृत जानकारी के लिए www.zeetelevision.com देखें।

ग्लोबल जेकेएन मीडिया लिमिटेड के बारे मेः
1987 में स्थापित जेकेएन ग्लोबल मीडिया कं. लिमिडेट थाईलैंड की अग्रणी मल्टी मीडिया कंपनी है, जो शैक्षणिक और मनोरंजन कार्यक्रमों का प्रसारण करती है। विगत 25 सालों से जेकेएन ग्लोबल मीडिया कं. लि. विगत कई सालों से अंतर्राष्ट्रीय स्तर की डॉक्यूमेंट्री और फिल्में दिखाने के क्षेत्रीय वितरक होने के साथ ही बीबीसी कार्यक्रमों के प्रसारण का अधिकार भी इनके पास है। जेकेएन ग्लोबल मीडिया कंपनी एशिया, यूरोप और उत्तरी अमेरिका के गुणवत्तापूरअम कार्यक्रमों का प्रसारण करती है और मीडिया और मनोरंजन जगत के हर क्षेत्र को कवर करती है। जेकेएल ग्लोबल मीडिया कंपनी ने थाईलैंड में कोरियन वेव –कोरियन फिल्म/ ड्रामा के प्रचार में भी महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है।

जेन्जम गाड़ी करेंगे तीन दिवसीय इण्डिया रनवे वीक की शुरूआत

नई दिल्ली। यंगेस्ट फैशन मूवमेंट के मोटो के साथ इण्डिया रनवे वीक अपने चैथे सत्र के साथ दिल्ली को अपने रंग में रंगने को तैयार है। शुक्रवार, 10 अप्रैल से शुरू होने जा रहे सबसे कम उम्र के फैशन वीक के साथ दिल्ली का यह वीकेण्ड रंग-बिरंगी रोशनी, ग्लैमरस रैम्प वाॅक और युवा फैशन में बितेगा।

इंडियन फेडरेशन फॉर फैशन डेवलपमेंट (आई.एफ.एफ.डी) द्वारा तीन दिवसीय फैशन महाकुम्भ होटल ओपुलेंट, छत्तरपुर, नई दिल्ली में 10 से 12 अप्रैल तक आयोजित किया जा रहा है। जिसमें युवा फैशन डिजाइनरों के बेहतरीन कलेक्शन देखने को मिलेंगे। युवा प्रतिभाओं को बढ़ावा देने ओर उन्हें एक बेहतर प्लेटफार्म देने के लिए आई.एफ.एफ.डी. की इस फैशन वीक का आयोजन किया जा रहा है। इसमें परिधानों के पारंपरिक व आधुनिक कलेक्शन के अलावा बेहतरीन आभूषण व एसेसरीज के कलेक्शन को भी प्रदर्शित किया जाएगा।

आई.आर.डब्लयू के चैथे सत्र में 34 डिजाइनरों के साथ तीन दिनों में लगभग 13 शो आयोजित किये जायेंगे। फैशन वीक की शुरूआत जाने-माने डिजाइनर जेन्जुम गाड़ी करेंगे। जो कि अपनी ही तरह की क्रियेशन के लिए जाने जाते हैं। उनके अलावा पहले दिन मासूमी मेवावाला, मनीष पटेल, विशाला श्री, मेघा व जिगर, वरीजा बजाज, अनविता देव, रोहिणी गुगनानी, मुक्ति तिबरेवाल व मनीष गुप्ता अपने कलैक्शन प्रस्तुत करेंगे।

दूसरे दिन की शुरूआत पहली ही बार बड़े मंच का अनुभव प्राप्त करने जा रहे फैशननिस्टा स्कूल के बच्चों के साथ होगी। उनके अतिरिक्त फरजाना रहमान, जिगर व पनेरी गोसर, रिफाली चन्द्रा, सान्या गर्ग, सुरभि जैन, कायशा स्टूडियो बाय शालिनी गुप्ता, सागर तेनाली, दिक्षा शर्मा, अशफाक अहमद और राजदीप रनावत भी अपने कलैक्शन प्रस्तुत करेंगे।

रनवे वीक का समापन एम्ब्रीन खान व तानिया खनूजा के शो से होगा। उनसे पहले वनिका छाबड़ा, गोविन्द राजू, नेहा यादव, स्वाति केडिया, राहुल कपूर, समयुक्ता वेंकटचलम, अनूप बिसानी, सुवागत साहा, बानी खुराना, आकाश के. अग्रवाल, मोएत बरार व रजनी के सेठी और समीर जुनैदी के कलैक्शन तीसरे दिन फैशन की छटा बिखेरेंगे।

आई.एफ.एफ.डी. के संस्थापक अविनाश पठानिया बताते हैं कि यह बहुत ही जबरदस्त सत्र होगा, जहां देश भर के  प्रतिभाशाली युवा डिजाइनर रनवे वीक के मंच पर अपना जलवा बिखेरेंगे। हमें उम्मीद है कि फैशनिस्टाज़ के लिए यह यादगार अनुभव रहेगा।

वहीं आई.एफ.एफ.डी. की फैशन निदेशक किरणा खेवा बताती हैं कि हम बहुत उत्साहित हैं। हमेशा की तरह हमने बहुत मेहनत की है और उम्मीद है कि फैशन जगत की अपेक्षाओं पर खरे उतरते हुए हमें नई ऊँचाईयां छूते हुए नई दिशा में आगे बढ़ेंगे।

मानवतावादी रचनाकार विष्णु प्रभाकर

कालजयी जीवनी आवारा मसीहा के रचियता सुप्रसिद्ध साहित्यकार विष्णु प्रभाकर कहते थे कि एक साहित्यकार को केवल यह नहीं सोचना चाहिए कि उसे क्या लिखना है, बल्कि इस पर भी गंभीरता से विचार करना चाहिए कि क्या नहीं लिखना है.  वह अपने लिखने के बारे में कहते थे कि प्रत्येक मनुष्य दूसरे के प्रति उत्तरदायी है, यही सबसे बड़ा बंधन है और यह प्रेम का बंधन है. उन्होंने लेखन को नए आयाम प्रदान किए.  उनके लेखन में विविधता है, जीवन का मर्म है, मानवीय संवेदनाएं हैं. अपनी साहित्यिक शक्तियों के बारे में उनका कहना था, मेरे साहित्य की प्रेरक शक्ति मनुष्य है. अपनी समस्त महानता और हीनता के साथ, अनेक कारणों से मेरा जीवन मनुष्य के विविध रूपों से एकाकार होता रहा है और उसका प्रभाव मेरे चिंतन पर पड़ता है. कालांतर में वही भावना मेरे साहित्य की शक्ति बनी. त्रासदी में से ही मेरे साहित्य का जन्म हुआ. वह मानतावादी थे. वह राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के दर्शन और सिद्धांतों से प्रभावित थे. वह कहते थे, सहअस्तित्व में मेरा पूर्ण विश्वास है. यही सहअस्तित्व मानवता का आधार है. इसीलिए गांधी जी की अहिंसा में मेरी पूरी आस्था है. मैं मूलत: मानवतावादी हूं अर्थात उत्कृष्ट मानवता की खोज ही मेरा लक्ष्य है. वर्गहीन अहिंसक समाज किसी दिन स्थापित हो सकेगा या नहीं, लेकिन मैं मानता हूं कि उसकी स्थापना के बिना मानवता का कल्याण नहीं है. उनकी रचनाओं में लोक जीवन की सुगंध है. उदाहरण देखिए, यह कैसी ख़ुशबू है? क्या यह ईख के खेतों से तो नहीं आ रही?  हां, यह वही से आ रही. यह भीनी-भीनी गंध और वह, उधर मकई के खेतों से आने वाली मीठी-मीठी महक.

 

विष्णु प्रभाकर का जन्म 21 जून, 1912 को उत्तर प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर ज़िले के गांव मीरापुर में हुआ. उनका असली नाम विष्णु दयाल था. उनका पारिवारिक वातावरण धार्मिक था, जिसका उनके मन पर गहरा प्रभाव पड़ा. उनके पिता दुर्गा प्रसाद धार्मिक विचारों वाले व्यक्ति थे. उनकी माता महादेवी शिक्षित महिला थीं, जो कुपर्थाओं का विरोध करती थीं. उन्होंने पर्दाप्रथा का भी घोर विरोध किया था. विष्णु प्रभाकर की पत्नी सुशीला भी धार्मिक विचारधारा वाली महिला थीं. विष्णु प्रभाकर का बाल्यकाल हरियाणा में गुज़र. उन्होंने वर्ष 1929 में हिसार के चंदूलाल एंग्लो-वैदिक हाई स्कूल से दसवीं की परीक्षा उत्तीर्ण की. तत्पश्चात् परिवार की आर्थक तंगी के कारण उन्होंने पढ़ाई के साथ-साथ नौकरी भी कर ली. वह चतुर्थ वर्गीय कर्मचारी के तौर पर काम करते थे. उस समय उन्हें प्रतिमाह 18 रुपये मिलते थे. उन्होंने पंजाब विश्वविद्यालय से भूषण, प्राज्ञ, विशारद, प्रभाकर आदि की हिंदी-संस्कृत परीक्षाएं उत्तीर्ण कीं. उन्होंने पंजाब विश्वविद्यालय से ही स्नातक भी किया. उनकी पहली कहानी 1931 में हिंदी मिलाप में प्रकाशित हुई. इस कहानी को बहुत सराहा गया. परिणामस्वरूप उन्होंने लेखन को ही अपने जीवन का अभिन्न अंग बना लिया. पहले वह प्रेमबंधु और विष्णु नाम से लेखन करते थे, परंतु बाद में उन्होंने अपने नाम के साथ प्रभाकर शब्द जोड़ लिया और विष्णु प्रभाकर नाम से लिखने लगे. हिसार में रहते हुए उन्होंने नाटक मंडली में भी काम किया. देश के स्वतंत्र होने के बाद वह दिल्ली में बस गए और आजीवन दिल्ली में ही रहे. उन्होंने 1955 से 1957 तक दिल्ली आकाशवाणी में नाट्य निर्देशक के तौर पर कार्य किया. इसके बाद उन्होंने लेखन को ही अपनी जीविका बना लिया.

 

विष्णु प्रभाकर ने कहानी, उपन्यास, नाटक, जीवनी, निबंध, एकांकी, यात्रा-वृत्तांत और कविता आदि प्रमुख विधाओं में लगभग सौ कृतियां लिखीं, परंतु आवारा मसीहा उनकी पहचान का पर्याय बन गई. उनके कहानी संग्रहों में आदि और अंत, एक आसमान के नीचे, अधूरी कहानी, संघर्ष के बाद, धरती अब भी धूम रही है, मेरा वतन, खिलौने,  कौन जीता कौन हारा, तपोवन की कहानियां, पाप का घड़ा, मोती किसके सम्मिलत हैं.  बाल कथा संग्रहों में क्षमादान, गजनंदन लाल के कारनामे, घमंड का फल, दो मित्र, सुनो कहानी, हीरे की पहचान सम्मिलत हैं. उनके उपन्यासों में ढलती रात, स्वप्नमयी, अर्द्धनारीश्वर, धरती अब भी घूम रही है, पाप का घड़ा, होरी, कोई तो, निशिकांत, तट के बंधन तथा स्वराज्य की कहानी सम्मिलत हैं. उनके नाटकों में सत्ता के आर-पार, हत्या के बाद, नवप्रभात, डॉक्टर, प्रकाश और परछाइयां, 'बारह एकांकी, अब और नहीं, टूट्ते परिवेश, गांधार की भिक्षुणी और अशोक सम्मिलत हैं. उन्होंने जीवनियां भी लिखी हैं, जिनमें आवारा मसीहा और अमर शहीद भगत सिंह सम्मिलत हैं. उन्होंने यात्रा वृतांत भी लिखे हैं. इनमें ज्योतिपुंज हिमालय, जमुना गंगा के नैहर में, हंसते निर्झर दहकती भट्ठी सम्मिलत हैं. उन्होंने संस्मरण हमसफ़र मिलते रहे भी लिखा है.  उन्होंने कविताएं भी लिखी हैं. उन्होंने अपनी आत्मकथा भी लिखी, जो कई भागों में प्रकाशित हुई.

विष्णु प्रभाकर की पहचान कहानीकार के रूप में रही है, परंतु उन्होंने कविताएं भी लिखी हैं. उनका एक कविता संग्रह चलता चला जाऊंगा नाम से प्रकाशित हुआ है. उनकी कविताओं में जीवन दर्शन ही नहीं, मानव संवेदनाओं का मर्म है.  

कितनी सुंदर थी

वह नन्हीं-सी चिड़िया

कितनी मादकता थी

कंठ में उसके

जो लांघ कर सीमाएं सारी

कर देती थी आप्लावित

विस्तार को विराट के

कहते हैं

वह मौन हो गई है-

पर उसका संगीत तो

और भी कर रहा है गुंजरित-

तन-मन को

दिगदिगंत को

इसीलिए कहा है

महाजनों ने कि

मौन ही मुखर है,

कि वामन ही विराट है

 

उनकी उत्कृष्ट रचनाओं के लिए उन्हें अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किया गया. उनकी आवारा मसीहा सर्वाधिक चर्चित जीवनी है, जिसके लिए उन्हें पाब्लो नेरूदा सम्मान, सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार सदृश अनेक देशी-विदेशी पुरस्कार मिले. उन्हें उपन्यास अर्द्धनारीश्वर के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया. प्रसिद्ध नाटक सत्ता के आर-पार के लिए उन्हें भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा मूर्तिदेवी पुरस्कार मिला तथा हिंदी अकादमी दिल्ली द्वारा शलाका सम्मान प्रदान किया गया. उन्हें उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान का गांधी पुरस्कार तथा राजभाषा विभाग बिहार के डॉ. राजेंन्द्र प्रसाद शिखर सम्मान से भी सम्मानित किया गया. उन्हें पद्मभूषण पुरस्कार भी प्रदान किया गया, किंतु  राष्ट्रपति भवन में उचित व्यवहार न होने के विरोध स्वरूप उन्होंने पद्म भूषण की उपाधि लौटाने की घोषणा की.

 

यशस्वी साहित्यकार विष्णु प्रभाकर 11 अप्रैल, 2009 को इस संसार चले गए. संसार से जाते-जाते भी वह अपना शरीर दान कर गए. उन्होंने अपनी वसीयत में अपने संपूर्ण अंगदान करने की इच्छा व्यक्त की थी. इसीलिए उनका अंतिम संस्कार नहीं किया जा सका, बल्कि उनके पार्थिव शरीर को अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान को सौंप दिया गया. विष्णु प्रभाकर ऐसे मानवतावादी व्यक्तित्व के धनी थे.

 

संपर्क 
डॉ. सौरभ मालवीय
सहायक प्राध्यापक 
माखनलाल चतुर्वेदी 
राष्‍ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्‍वविद्यालय, भोपाल  
मो. +919907890614 

भारत का कानून मंत्रालय अभी महारानी एलिजाबेथ के लिए काम कर रहा है!

विषय: कानून मंत्रालय ही कर रहा कानून का निरंतर उल्लंघन  
 
महोदय,
५ अप्रैल २०१५ को कानून एवं न्याय मंत्रालय के अधीन न्याय विभाग ने जो सम्मेलन आयोजित हुआ, उसकी तारीख को लेकर विवाद हुआ पर उसी कार्यक्रम में राजभाषा कानून की धज्जियाँ उड़ाई गईं। इस कार्यक्रम के सभी बैनर/पोस्टर, आगंतुकों के बिल्ले, आमंत्रण-पत्र, ईमेल आमंत्रण-पत्र एवं अतिथि न्यायाधीशों,मुख्यमंत्रियों के नामपट आदि केवल अंग्रेजी में बनाए गए थे।  ऐसा लग रहा था यह कार्यक्रम रानी एलिजाबेथ के लन्दन शहर में हो रहा हो। 
 
एक बात स्पष्ट है विधि एवं न्याय मंत्रालय सड़सठ साल बाद भी अंग्रेजों के लिए काम कर रहा।  न्याय व्यवस्था आज भी अंग्रेजी की गुलाम है भारत के नागरिकों के लिए कानून फिरंगी भाषा में बनाए जाते हैं और उनके अनुवाद भी उपलब्ध नहीं करवाए जाते। केवल अंग्रेजी के कारण देश में करोड़ों मामले अटके पड़े हैं। कटघरे में खड़े आरोपी को पता ही नहीं चलता है कि उच्च एवं उच्चतम न्यायालय में उसके केस पर क्या बहस चल रही है?   
 
मेरी पिछले शिकायतों की कड़ी में एक शिकायत और भेज रहा हूँ।  मैं इस सम्बन्ध में पहले भी कई शिकायतें कर चुका हूँ। विधि एवं न्याय मंत्रालय की मुख्य वेबसाइट एवं अधीनस्थ विभागों में से एक भी वेबसाइट राजभाषा हिंदी में नहीं बनाई गई है और मंत्रालय ने पिछले सोलह सालों में इसके लिए कोई भी कदम नहीं उठाया। ये कैसा कानून मंत्रालय है जो स्वयं कानून का पालन नहीं करता।
 
जब मंत्रालय में साधारण से रबर की मुहरें, पत्र-शीर्ष, लिफाफे, कार्यक्रमों /बैठकों/सम्मेलन आदि के बैनर/पोस्टर एवं अतिथि नामपट आदि हिंदी में बनाए जाने के क़ानूनी प्रावधान का भी पालन नहीं किया जा रहा है तो हिंदी के नाम पर "पुरस्कार" क्यों बांटे जा रहे हैं?
 
मंत्रालय द्वारा आयोजित कार्यक्रमों /बैठकों/सम्मेलन आदि में बैनर/पोस्टर/आमंत्रण पत्र एवं अतिथि नामपट हमेशा से केवल अंग्रेजी वाले ही बनाए जाते हैं यह बात एकदम स्पष्ट है पर राजभाषा क्या देखता है मेरी समझ से परे  है? इस विषय पर पिछले तीन साल में यह चौथा शिकायती पत्र है।  राजभाषा विभाग राजभाषा कानून के अनिवार्य और छोटे-२ प्रावधानों का पालन करवाने के प्रति भी विफल है। हर दिन दिल्ली में भारत सरकार के कई सम्मेलन/समारोह और बैठकें होती हैं पर 90 % आयोजनों में  बैनर/पोस्टर, आगंतुकों के बिल्ले, आमंत्रण-पत्र, ईमेल आमंत्रण-पत्र एवं अतिथि नामपट आदि केवल अंग्रेजी में बनाए जाते हैं और हर साल सैकड़ों हिंदी प्रेमी शिकायतें कर रहे हैं पर भारत सरकार के अधिकारियों के कानों पर जूँ भी नहीं रेंगती। बार-२ वही शिकायतें पर कोई सुधार की उम्मीद नहीं दिखती है.  
 
आपके द्वारा शीघ्र कारगर कार्यवाही की अपेक्षा है.
 
भवदीय,
सीएस. प्रवीण कुमार जैन, 
ए-१०३ आदीश्वर सोसाइटी, जैन मंदिर के पीछे, 
सेक्टर ९ ए, वाशी नवी मुंबई – ४००७०३ 

रिलायंस का जियो देगा व्हाट्सएप को टक्कर

एंड्रायड और दूसरे ओपरेटिंग सिस्‍टम्‍स पर व्‍हाट्सऐप बेहद पसंद की जाने वाली मैसेजिंग ऐप है। हालांकि, इसके सामने वी-चाट, टेलिग्राम और लाईन ऐप आई लेकिन व्‍हाट्सऐप हर बार विजेता बनकर उभरी है।
 
इस बार सबसे ज्‍यादा उपयोग की जाने वाली इस ऐप को टक्‍कर देने के लिए और किसी ने नहीं बल्कि रिलायंस ने बाजार में कदम रखा है। रिलांयस ने अपनी इंस्‍टेंट मैसेजिंग ऐप 'जिओ' लॉन्‍च की है। यह ऐप एंड्रायड और आईओएस दोनों पर काम करेगी।
 
रिलांयस की जिओ, यूजर को वह सारे फीचर्स दे रही है जो व्‍हाट्सऐप में मिल रहे हैं। इसके अलावा जियो के साथ यूजर्स वॉईस कॉल के अलावा ग्रुप वॉइस कॉल और वीडियो कॉल भी कर पाएगें।
 
जियो एक आम मैसेजिंग ऐप की तरह मैसेज के अलावा फोटो और वीडियो शेयरिंग की सुविधा तो देती ही है लेकिन इसके आलावा जियो की मदद से यूजर्स अपने डूडल्‍स और वॉइस नोट भी बना सकते हैं। इसके अलावा यूजर्स एेप का उपयोग करते हुए अपने चुनिंदा दोस्‍तों से अपनी लोकेशन भी शेयर कर सकते हैं।
 
ब्‍लैकबैरी के बीबीएम चैनल की ही तरह जिओ यूजर को न्‍यूज, अपडेट और स्‍पेशल प्रमोशन ब्राउज करने की आजादी भी देती है। इस चैनल की मदद से यूजर अपने खास लोगों के बीच लगातार बने रह सकते हैं।

अब छेड़ना होगा पॉलीथीन मुक्ति महासंग्राम

घर से खाली हाथ निकलने की आदत ने 
कपडे या कागज़ के थैलों को 
कुछ इस कदर कहा अलविदा 
कि हम पॉलीथीन पर हो गए फ़िदा !
प्लास्टिक और पॉलीथीन के थैले 
अब हमें बहुत सुहाते हैं
ये जुदा बात है कि 
पॉलीथीन ज़िंदा रहती है 
हम और आप मारे जाते हैं !

पॉलिथीन छत्तीसगढ़ की ही नहीं, पूरे देश की एक गंभीर समस्या है। इसके खिलाफ अब छत्तीसगढ़ में भी मुहिम छिड़ चुकी है। इन दिनों इसके विरोध के स्वर और समझाइश के साथ दबिश की आवाज़ें सुनाई दे रही हैं। महिलाएं कागज के बैग और लिफाफे बनाकर मुफ्त में बांट रही हैं ताकि लोगों में जागृति आए और वे पॉलिथीन के मोह को छोड़ें। जैसे-जैसे अभियान जोर पकड़ता जा रहा है, व्यापारी और अन्य कारोबारी भी इससे जुड़ते जा रहे हैं। लोग घरों में ही पेपर बैग बनाने लगे हैं। लेकिन, सहूलियत के लिए या फिर फटाफट लेन-देन की गरज से कहें, पॉलिथीन का इस्तेमाल बंद नहीं हो सका है। यह एक चुनौती है। 

पहले हम-आप जब खरीदारी के लिए झोला लेकर जाते थे, तब दुकानदार के पास कागज के लिफाफे या अखबार के टुकड़े होते थे जिनमें वह सामान डाल देता था। लेकिन अब हम पॉलिथीन मांगते हैं। घर जाकर यह पॉलिथीन चली जाती है कूड़ेदान में, पॉलिथीन मवेशी के पेट में जमा होने लगती है और इससे वे कुछ ही दिनों में मर जाती हैं। मंदिरों, ऐतिहासिक धरोहरों, पार्क, अभयारण्य, रैलियों, जुलूसों, शोभा यात्राओं आदि में धड़ल्ले से इसका उपयोग हो रहा है। शहरों की सुंदरता पर इससे ग्रहण लग रहा है। पॉलिथीन न केवल वर्तमान बल्कि भविष्य को भी नष्ट करने पर आमादा है। पॉलिथीन का उपयोग मनुष्य की आदत में शुमार हो गया है। लगातार इस्तेमाल के कारण आज हर व्यक्ति इसी पर निर्भर दिखाई दे रहा है।

स्मरण रहे कि पृथ्वीतल पर जमा पॉलिथीन जमीन की जल सोखने की क्षमता खत्म कर रही है। इससे भूजल स्तर गिरा। सुविधा के लिए बनाई की गई पॉलिथीन आज सबसे बड़ा दुविधा का कारण बन गई है। प्राकृतिक तरीके से नष्ट न होने के कारण यह धरती की उर्वरक क्षमता को भी धीरे-धीरे समाप्त करने पर तुली है। पॉलिथीन से निकलने वाला धुआं ओजोन परत के साथ लोगों को भी नुकसान पहुंचा रहा है। इसको जलाने से कार्बन डाईऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड एवं डाईऑक्सींस जैसी विषैली गैस निकल रही हैं। लोग इस बात को लेकर भी चिंतित हैं कि विकास के नाम पर शहरों में पेड़ों की अंधाधुंध कटाई हुई है। तरह-तरह के निर्माण के दौरान भी कई पेड़ काटे गए। रोड चौड़ीकरण दौरान भी सैकड़ों पेड़ कुर्बान हो गए। पर उतने या उससे ज्यादा पेड़ वापस नहीं लगाए गए। 

अब एक अच्छी खबर है कि शहरों को सुंदर, स्वच्छ एवं प्रदूषण मुक्त बनाने का बीड़ा महिलाओं ने उठाया है। पेपर बैग बनाकर अभियान चलाया जा रहा है। आस-पास के दुकानदारों को मुफ्त में पेपर बैग भी दे रही हैं। उधर प्रदेश के स्कूलों में पॉलिथीन से पॉल्यूशन को सिलेबस में शामिल कर पढ़ाई का फैसला हाल ही में हुआ है। अब बिलासपुर यूनिवर्सिटी ने भी कॉलेजों के सिलेबस में इसे शामिल करने का निर्णय लिया है। पर्यावरण विषय में पॉलिथीन के दुष्प्रभाव और इससे दैनिक जीवन में क्या-क्या नुकसान होते हैं, यह पढ़ाया जाएगा। बोर्ड ऑफ स्टडीज से मंजूरी मिलते ही यह चैप्टर अगले सत्र से कॉलेजों में पढ़ाया जाने लगेगा। यह अच्छी बात है लेकिन पढ़े हुए को जीने की आदत बनाने की ज़रुरत बनी रहेगी। सुविधा की आदी लोगों को पटरी पर लाना मुश्किल काम है। 

बिलासपुर यूनिवर्सिटी ने भी कॉलेजों में इसका कोर्स पढ़ाने का निर्णय लिया है। कॉलेजों में भी इसके इसके बारे में बताने के लिए कोर्स बेहतर जरिया हो सकता है। इसे जागरूकता बढ़ेगी। एनएसएस,एनसीसी,रेडक्रॉस के स्वयं सेवक और छात्र संघ के सदस्य इसमें बड़ा सहयोग कर सकते हैं। इससे आने वाली पीढ़ियां पर्यावरण के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझेंगी। इसके बाद ही वे दैनिक जीवन में पॉलिथीन से परहेज करेंगे। चेंबर ऑफ कामर्स को भी आगे बढ़कर सहयोग देना चाहिए। सामाजिक संगठनों को अपने वार्षिक कार्यक्रम में पॉलीथीन के विरुद्ध मुहिम को शामिल करना चाहिए। 

गौरतलब है कि हाल ही में राज्य शासन ने पॉलिथीन के दुष्प्रभावों के बारे में स्कूलों में पढ़ाई कराने का निर्णय लिया है। बताया जा रहा है कि अगले सत्र से इसे स्कूली कोर्स में शामिल कर लिया जाएगा। यह एक माकूल कदम होगा। वास्तव में बड़े पैमाने पर इस्तेमाल हो रहे प्लास्टिक और पॉलिथीन ने इंसान की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। कभी न सड़ने वाली प्लास्टिक की पन्नियों से शहर के नाले, नालियां जाम हो जाती हैं। वहीं इसका बेधड़क प्रयोग लोगों को बीमार बना रहा है। पशुओं की मौत का कारण भी बनता जा रहा है। ऐसे में इस पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगाने की जरूरत है। पॉलीथिन का उपयोग पैर पर कुल्हाड़ी मारने जैसा है। 

प्लास्टिक का प्रयोग हमारे जीवन में सर्वाधिक होने लगा है। इसका प्रयोग नुकसान दायक है यह जानते हुए भी हम धड़ल्ले से इनका इस्तेमाल कर रहे हैं। यह  इसके प्रयोग पर रोक लगे तो बात बने। जो भी व्यक्ति प्लास्टिक का प्रयोग सर्वाधिक करता है वह अपने जीवन से खेलने का काम करता है। इतना ही नहीं वह पर्यावरण को प्रदूषित भी करता है। प्लास्टिक को जलाने से भी नुकसान होगा। इसका जहरीला धुआं स्वास्थ्य के लिए खतरनाक है।

पॉलिथीन की पन्नियों में लोग कूड़ा भरकर फेंकते हैं। कूड़े के ढेर में खाद्य पदार्थ खोजते हुए पशु पन्नी निगल जाते हैं। ऐसे में पन्नी उनके पेट में चली जाती है।बाद में ये पशु बीमार होकर दम तोड़ देते हैं। प्लास्टिक और पॉलिथीन का प्रयोग रोकने के लिए हमें लोगों को जागरूक करना होगा। तभी लोगों को इसके दुष्प्रभाव से बचाया जा सकता है। लोगों को पॉलिथीन की पन्नियों की जगह सामान लाने और रखने में कपड़े के थैले का प्रयोग करना होगा।

पॉलिथीन और प्लास्टिक गांव से लेकर शहर तक लोगों की सेहत बिगाड़ रहे हैं। शहर का ड्रेनेज सिस्टम अक्सर पॉलिथीन से भरा मिलता है। इसके चलते नालियां और नाले जाम हो जाते हैं। इसका प्रयोग तेजी से बढ़ा है। प्लास्टिक के गिलासों में चाय या फिर गर्म दूध का सेवन करने से उसका केमिकल लोगों के पेट में चला जाता है। इससे डायरिया के साथ ही अन्य गंभीर बीमारियां होती हैं। ऐसे में प्लास्टिक के गिलासों का प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए। रही बात पॉलिथीन के प्रयोग की तो वह भी खतरनाक है।

प्लास्टिक और पॉलिथीन का प्रयोग पर्यावरण और मानव सेहत दोनों के लिए खतरनाक है। कभी न नष्ट होने वाली पॉलिथीन भूतल जल स्तर को प्रभावित कर रही है। देखा जा रहा है कि कुछ लोग अपनी दुकानों पर चाय प्लास्टिक की पन्नियों में मंगा रहे हैं। गर्म चाय पन्नी में डालने से पन्नी का केमिकल चाय में चला जाता है। जो बाद में लोगों के शरीर में प्रवेश कर जाता है। चिकित्सकों ने प्लास्टिक के गिलासों और पॉलिथीन में गरम पेय पदार्थों का सेवन न करने की सलाह दी है।

याद रहे कि पॉलीथीन पर प्रतिबंध है, बावजूद इसके दुकानदार चोरी-छिपे पालीथीन का प्रयोग करते पाए जाते हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्‍यों नहीं सफल होता है पॉलीथीन पर प्रतिबंध? पर्यावरण एवं स्‍वास्‍थ्‍य दोनों के लिए नुकसानदायक 40 माइक्रॉन से कम पतली पॉलीथीन पर्यावरण की दृष्टि से बेहद नुकसानदायक होती है। चूंकि ये पॉलीथीन उपयोग में काफी सस्‍ती पड़ती हैं, इसलिए इनका उपयोग धड़ल्‍ले से किया जाता है। लेकिन इन्‍हें एक बार उपयोग करने के बाद कूड़े में फेंक दिया जाता है, जो प्रदूषण का कारण बनती हैं। इसके साथ ही साथ कुछ कंपनियां ज्‍यादा लाभ के चक्‍कर में प्‍लास्टिक को लचीला और टिकाऊ बनाने के लिए घटिया एडिटिव (योगात्‍मक पदार्थ) मिलाती हैं, जो प्‍लास्टिक में रखे खाद्य पदार्थों के संपर्क में आकर घुलने भी लगते हैं। इससे प्रदूषण के साथ-साथ ये पन्नियां तरह-तरह की बीमारियों का भी सबब बनती हैं।

अगर सरकारें चाहें तो प्‍लास्टिक कचरे को अनेक क्षेत्रों में इस्‍तेमाल किया जा सकता है। उदाहरण स्‍वरूप हम बंगलुरू को ले सकते हैं, जहां पर कूड़े कचरे में फेंकी जाने वाली पन्नियों अन्‍य कचरे के साथ ट्रीटमेंट करके खाद बनाई जा रही है। इसी तरह हम हिमाचल प्रदेश का भी उदाहरण हमारे सामने है, जहां केन्‍द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की मदद से पन्नियों को चक्रित करके सड़क निर्माण में उपयोग में लाया जा रहा है। जर्मनी में प्‍लास्टिक के कचरे से बिजली का निर्माण भी किया जा रहा है। इसके अलावा पन्नियों को चक्रित करके खाद भी बनाया जा सकता है। इसलिए यदि सरकारें इस दिश में गम्‍भीर हों, तो नुकसानदायक प्‍लास्टिक के कचरे से लाभ भी कमाया जा सकता है। ऐसे प्रयोगों को व्यापक बनाया जा सकता है। 

कैसे कारगर हो सकते हैं प्रतिबंध ?
—————————————–
पर्यावरण की रक्षा के लिए प्‍लास्टिक पर लगाए जाने वाले प्रतिबंध तभी कारगर हो सकते हैं,जब उनके लिए  कुछ इस तरह कदम उठाए जाएं –
1. प्‍लास्टिक निर्माण करने वाली फैक्ट्रियों पर कड़ी नजर रखी जाए, जिससे वे मानक के विपरीत प्‍लास्टिक का निर्माण न कर सकें। 
2. दुकानदारों को प्‍लास्टिक के विकल्‍प के रूप में जूट एवं कागज के बने थैले सस्‍ते दामों में और पर्याप्‍त मात्रा में नियमित रूप से उपलब्‍ध कराए जाएं। 
3. जूट एवं कागज से बने थैलों के निर्माण के लिए स्‍वयंसेवी संस्‍थाओं को प्रोत्‍साहन दिया जाए। 
4. प्‍लास्टिक के प्रयोग को निरूत्‍साहित करने के लिए स्‍कूल और कॉलेज स्‍तर पर जागरूकता कार्यक्रम चलाए जाएं। 
5. मानक के विपरीत पालीथिन का उत्‍पादन/व्‍यापार करने वालों के विरूद्ध सख्‍त कार्यवाही की जाए। लगातार मॉनीटरिंग और कारर्वाई की जाये। 

अंत में बस इतना ही कि अगर हम हमारी ही ज़िंदगी को तबाह करने वाली पॉलीथीन जैसी के इस्तेमाल से बाज़ नहीं तो एक दिन यही कहना बाक़ी रह जाएगा कि –
क्या बचाते किसी सफ़ीने को 
अपनी किश्ती ही खुद डुबो बैठे !

=================================
लेखक ख्याति प्राप्त प्रखर वक्ता और शासकीय 
दिग्विजय पीजी ऑटोनॉमस कालेज में प्रोफ़ेसर हैं। 
———————————————————

मुंबई के डिब्बेवालों की सेवा लेगी फ्लिपकार्ट

देश की प्रतिष्ठित आपूर्ति श्रृंखला से जुड़ने के लिए ऑनलाइन बाजार फ्लिपकार्ट ने मुंबई के डब्बावालों के साथ गठबंधन किया है। इसके जरिये कंपनी अंतिम छोर तक उपभोक्ताओं को सामानों की आपूर्ति सुनिश्चित करना चाहती है।
 
फ्लिपकार्ट, स्नैपडील और अमेजन जैसी ई-कामर्स कंपनियों के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा के बीच कंपनी को इस गठबंधन से काफी मदद मिलेगी। कंपनी ने कहा है कि डब्बावाले 120 साल से अधिक समय से टिफिन बॉक्स की डिलीवरी के पेशे में हैं।
 
करार के तहत डब्बावाले फ्लिपकार्ट के आपूर्ति केंद्रों से शिपमेंट लेकर संबंधित ग्राहकों तक पहुंचाएंगे। वे डब्बा उठाते समय एक साथ दोनों काम करेंगे। हालांकि, इस स्तर पर विक्रेताओं के साथ डिब्बावालों की कोई बातचीत नहीं हो पाएगी।
 
कंपनी ने कहा है कि डब्बावाले के पहले बैच को प्रशिक्षण के लिए फ्लिपकार्ट के आपूर्ति केंद्रों पर भेजा गया है। कंपनी ने कहा है कि वे फिलहाल कागज पर लिखे गए पते वाली ट्रैकिंग प्रणाली का इस्तेमाल करेंगे लेकिन बाद में उन्हें मोबाइल ऐप्लिकेशन के प्रशिक्षण के साथ-साथ पहनने लायक उपकरण भी दिए जाएंगे।
 
फ्लिपकार्ट के वरिष्‍ठ निदेशक नीरज अग्रवाल ने कहा कि मुंबई में डब्बावाला सबसे अधिक भरोसेमंद ब्रांड है। उनकी अनोखी आपूर्ति प्रणाली बिल्कुल स्वच्छ और भरोसेमंद है।

पाँच सालों में बैंको से 27 हजार करोड़ रु. गायब हो गए

बीते पांच सालों के दौरान पब्लिक और प्राइवेट सेक्टर के बैंकों को धोखाधड़ी और फर्जीवाड़े के चलते 27 हजार करोड़ रुपए का घाटा उठाना पड़ा है। इसमें से 24 हजार करोड़ रुपए का फर्जीवाड़ा सरकारी बैंकों में हुआ। खास बात यह है कि 27 हजार करोड़ रुपए के नुकसान का आंकड़ा भी केवल अनुमानित है जबकि हकीकत में यह नुकसान कई हजार करोड़ रुपए ज्यादा हो सकता है। अंग्रेजी अखबार डीएनए ने  आरटीआई से हासिल जानकारी से ये खुलासा किया है।    कुछ मामले ऐसे भी सामने आए जब बैंकों ने ग्राहकों को अपने द्वारा ही भेजे एसएमएस को नकार दिया और इससे ग्राहकों को भारी नुकसान हुआ। एक मामले में तो कैंसर मरीज को ही धोखा दे दिया गया जबकि दूसरे मामले में एक पेट्रोल पंप मालिक को बैंक ने 15 लाख रुपए का चूना लगा दिया।
 
निजी और सरकारी बैंकों ने धोखाधड़ी और फर्जीवाड़े के करीब 11,500 मामलों की जानकारी रिज़र्व बैंक को दी है। ये मामले केवल एक लाख रुपए या उससे ऊपर की राशि की हेराफेरी से जुड़े हैं। इससे कम अमाउंट के घपले के बारे में तो ये बैंक आरबीआई को जानकारी ही नहीं देते। अगर धोखाधड़ी में गए छोटे अमाउंट को भी जोड़ लिया जाए तो टोटल काफी बढ़ जाएगा। अकेले SBI ने ही कुल 1124 मामलों की जानकारी RBI को दी जिनमें उसे 3,494 करोड़ रुपए का घाटा उठाना पड़ा।
पब्लिक सेक्टर के बैंकों को हुआ ज्यादा घाटा
 
सभी बैंकों को हुए 27 हजार करोड़ रुपए के जिस नुकसान की बात सामने आई है उसमें से 24 हजार करोड़ का नुकसान तो केवल पब्लिक सेक्टर के बैंकों को हुआ है। बाकी तीन हजार करोड़ रुपए का नुकसान प्राइवेट सेक्टर के बैंकों को उठाना पड़ा है। पब्लिक सेक्टर में SBI तो प्राइवेट सेक्टर में ICICI नुकसान उठाने में सबसे आगे हैं। प्राइवेट सेक्टर के बैंकों को 1776 मामलों में 1089 करोड़ रुपए का घाटा उठाना पड़ा।
 
क्या सफाई देते हैं बैंक
स्टै बैंक  के एक प्रवक्ता का इस बारे में कहना है कि शिकायतों के आधार पर तो आप कह सकते हैं कि मामले काफी ज्यादा हैं लेकिन सच्चाई ये है कि जिन मामलों की शिकायत की गई है उनका अमाउंट काफी कम है। इस प्रवक्ता ने कहा कि धोखाधड़ी और फर्जीवाड़े के मामले कम होते जा रहे हैं क्योंकि बैंकों ने इन्हें रोकने के लिए टेक्नोलॉजी की मदद ली है। हालांकि ICICI बैंक ने इस बारे में कोई सफाई नहीं दी। खास बात यह है कि कुछ मामलों में कस्टमर्स को भी बैंकों को हुए इस घाटे का खामियाजा भुगतना पड़ा है जबकि बैंकों को तो हर मामले में ही नुकसान हुआ। साल 2012 में RBI ने सभी बैंकों को एक सर्कुलर जारी कर धोखाधड़ी और फर्जीवाड़े को रोकने के लिए एक सख्त गाइनलाइन जारी की थी।
 
लोन में फर्जीवाड़े के सबसे ज्यादा मामले
 
बैंकों और ग्राहकों को अगर सबसे ज्यादा घाटा कहीं से उठाना पड़ता है तो वह लोन सेक्टर है। दरअसल, ऐसे हजारों मामले सामने आए हैं जब क्रिमिनल्स या फ्रॉड लोगों ने फर्जी डाक्युमेंट्स के आधार पर तगड़ा लोन लिया और बाद में वे भाग गए। हैरानी की बात यह है कि ऐसे कई मामलों में बैंक कर्मचारियों की भूमिका भी संदिग्ध पाई गई, कुछ लोगों को गिरफ्तार भी किया गया। रॉयल बैंक ऑफ स्कॉटलैंड की पूर्व सीईओ मीरा सान्याल का कहना है कि धोखाधड़ी करने वाले आजकल नए तरीके अपना रहे हैं खासकर, ऑनलाइन फ्रॉड के मामलों में टेक्नोलॉजी का गलत इस्तेमाल हो रहा है। उनके अनुसार, इसका एक बड़ा नुकसान ये होता है कि जब तक इन फ्रॉड के मामलों की जांच होती है तब तक उस कस्टमर को परेशान होना पड़ता है जिसने अपना अमाउंट खोया है।
 
बैंकों की भी गलती
 
सीबीआई द्वारा फ्रॉड के जिन कुछ बड़े मामलों की जांच की गई उनमें सामने आया कि बैंकों के कर्मचारियों और अधिकारियों की कई मामलों में मिलीभगत होती है क्योंकि वे डॉक्युमेंट्स का वेरीफिकेशन सही तरीके से नहीं करते। ये आंकड़ा भी आपको चौंकाने के लिए काफी है कि विभिन्न बैंकों के करीब 7 हजार कर्मचारियों की धोखाधड़ी के मामलों में शामिल होने के लिए जांच चल रही है। ऐसे ही एक मामले में सीबीआई ने जांच के दौरान इंडियन ओवरसीस बैंक के एक कर्मचारी को गिरफ्तार किया जिसके कारण बैंक को सात करोड़ का नुकसान उठाना पड़ा।
आज तक नहीं मिले 15 लाख रुपए वापस
 
यूपी के बांदा में रहने वाले संतोष धांधरिया पेट्रोल पंप के मालिक हैं। 16 मार्च 2015 को उन्होंने इलाहबाद बैंक की एक ब्रांच 15 लाख रुपए जमा कराए कुछ दी देर में इसका sms भी उनके मोबाइल फोन पर आ गया। लेकिन उसी दिन शाम को उनके मोबाइल पर बैंक की तरफ से एक और sms आता है कि उनके अकाउंट से 15 लाख रुपए का ट्रांजेक्शन नहीं हुआ। परेशान संतोष बैंक पहुंचे तो बैंक अफसरों ने उनसे कहा कि उनके अकाउंट में 15 लाख रुपए कभी जमा ही नहीं किए गए। इसके बाद संतोष ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई। संतोष का कहना है कि इस तरह की घोखाधड़ी से उन्हें तगड़ा झटका लगा है क्योंकि यह पैसा उन्होंने कड़ी मेहनत से कमाया था।
कैंसर पीडि़त पत्रकार के साथ भी धोखा
 
32 साल के नागार्जुन कोपुला पत्रकार हैं और लंग कैंसर से पीडि़त हैं। उनके दोस्तों ने उनके इलाज के लिए करीब 1 लाख 23 हजार रुपए इकट्ठा कर उनके अकाउंट में जमा किए। 3 मार्च 2015 को एसबीआई की ओर से उनके पास फोन आया जिसमें उनसे अकाउंट की डीटेल्स पूछी गईं। इसके बाद से इन 1 लाख 23 हजार रुपए का कोई अता-पता नहीं चला। उनके दोस्तों ने बैंक जाकर जानकारी ली लेकिन अब तक कुछ नहीं हुआ। कोपुला कहते हैं कि इस पैसे के चले जाने से अब उनका इलाज कैसे होगा, उन्हें इस बात की चिंता सताए जा रही है।
 
साभार- डीएनए से 

दिग्विजय कालेज में हिन्दी भाषा और साहित्य में भविष्य की संभावनाओं पर उपयोगी मार्गदर्शन

राजनांदगांव। शासकीय दिग्विजय महाविद्यालय के स्नातकोत्तर हिन्दी विभाग के तत्वावधान में हिन्दी भाषा, साहित्य और उसमें भविष्य की संभावनाओं पर अतिथि व्याख्यान का आयोजन किया गया। प्राचार्य डॉ.आर.एन.सिंह के मार्गदर्शन में हुए इस आयोजन में अतिथि वक्ता के रूप में चंद्रपाल डड़सेना शासकीय महाविद्यालय पिथौरा, महासमुंद की प्राचार्य डॉ.आभा तिवारी उपस्थित थीं। हिन्दी विभागाध्यक्ष श्रीमती चन्द्रज्योति श्रीवास्तव में स्वागत उद्बोधन में कहा कि आज के लगातार बदलते परिवेश में भाषा और साहित्य का क्षेत्र भी काफी विस्तृत हो गया है। अब हिन्दी और हिन्दी साहित्य के विद्यार्थियों के लिए अवसर पहले से बहुत बढ़ गए हैं। इनकी जानकारी देकर विद्यार्थियों को लाभान्वित करना इस व्याख्यान का उद्देश्य है। डॉ.बी एन.जागृत ने अतिथि वक्ता डॉ.आभा तिवारी का परिचय आत्मीय शब्दों में देते हुए बताया कि उन्होंने शोधोत्तर ( डी.लिट् ) उपाधि अर्जित कर उच्च शिक्षा के क्षेत्र में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है, जिससे सहज प्रेरणा मिलती है। विभाग के प्राध्यापक डॉ.चन्द्रकुमार जैन ने संस्कारधानी की साहित्य विभूति, मानस मर्मज्ञ डॉ.बलदेवप्रसाद मिश्र जी पर डॉ.आभा तिवारी द्वारा किये गए विशेष अध्ययन को हिन्दी साहित्य की धरोहर निरूपित करते हुए उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त की। डॉ.नीलम तिवारी और विद्यार्थियों ने अतिथि वक्ता का भावपूर्ण स्वागत किया। 

अतिथि वक्ता एवं प्राचार्य डॉ.आभा तिवारी ने प्रेरणास्पद उद्बोधन में कहा कि परीक्षा और भविष्य की तैयारी एक समझदारी से भरा काम है। अपने पास  में उपलब्ध साधनों का अधिक से अधिक उपयोग करना बड़ी कला है। अपने लक्ष्य के स्पष्ट निर्धारण के साथ उसे हासिल करने के लिए सार्थक कदम उठाना सबसे बड़ी जिम्मेदारी है। उन्होंने बताया कि सिर्फ परीक्षा तक बात सीमित न रहे, ज्ञानार्जन का क्रम निरंतर चलना चाहिए। जरूरी बातों और विषयों को पढ़ने को आदत बना लेना सफलता का सही राजमार्ग है। कोर्स के बाहर की सामान्य जानकारी से अपने मस्तिष्क को पुष्ट बनाते रहें। यह मानकर पढ़ें कि कोई भी सूचना कभी भी आपके पथ को प्रदीप्त कर सकती है। 

डॉ.तिवारी ने बताया कि आज हिन्दी के विद्यार्थी अनुवाद के अलावा बैंकों, निगमों, सार्वजनिक क्षेत्रों में हिन्दी अधिकारी, शिक्षक, प्राध्यापक, पटकथा लेखक, उद्घोषक, समाचार वाचक, दुभाषिया, संवाददाता बन सकते हैं। स्वतंत्र लेखन, पर्यटन, फैशन, कार्यक्रम संयोजन  सहित सिविल सेवा में भी प्रवेश कर सकते हैं। यह सूची लगातार बढ़ती जा रही है। जरूरत इस बात की है कि प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए सही और उपयोगी किताबों का चयन किया जाये। नेट से भी मदद ली जा सकती है। उन्होंने विद्यार्थियों को विषयवार अनेक लेखकों और पुस्तकों के साथ-साथ उपयोगी वेबसाइट्स के पते भी बताये। विभाग के प्राध्यापक डॉ.चन्द्रकुमार जैन ने उक्त जानकारी देते हुए बताया कि उत्साहपूर्वक सहभागिता कर रहे स्नातकोत्तर हिन्दी के छात्र-छात्राओं ने अतिथि वक्ता डॉ.आभा तिवारी से करियर को लेकर प्रासंगिक प्रश्न किए और व्याख्यान के दौरान उनके सवालों के ज़वाब भी दिए। हिन्दी के होनहार विद्यार्थियों ने माना कि विभाग का यह आयोजन मार्गदर्शक सिद्ध होगा। 
———————————————
———————————————

जुग जुग जियो जस्टिस जिया पॉल

पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के जज एम. जियापॉल ने गजब किया। वे सुबह घूमने निकले थे कि उन्होंने देखा कि एक लड़की सुखना झील में बस डूबने ही वाली है। किनारे खड़े लोग चिल्ला रहे हैं लेकिन कोई कुछ नहीं कर रहा है। जज साहब ने आव देखा न ताव! वे कपड़े पहने हुए ही झील में कूद पड़े, उस लड़की को बचाने। जज साहब को कूदते देखकर उनके निजी अंगरक्षक यशपाल ने भी छलांग लगा दी। डूबती हुई लड़की इतने में और आगे बह गई। अंगरक्षक यशपाल कुशल तैराक है। उसने जाकर उस डूबती लड़की को पकड़ लिया लेकिन जज साहब ने देखा कि लड़की और यशपाल दोनों ही डूबने लगे। वे दम फूलने के बावजूद तेजी से तैरकर उनके पास चले गए।

यशपाल की हिम्मत बढ़ी और वह एक झटके से ऊपर आ गया। लड़की ने उसे कसकर पकड़ रखा था। तीनों बड़ी मुश्किल से पानी के बाहर आए। लड़की आधी बेहोश थी। उसे उल्टा लिटाकर उसके पेट से पानी निकाला और अस्पताल में भर्ती करवाया। जज और यशपाल ने अपनी जान दॉव पर लगाकर एक बच्ची की जान बचाई।

उस बच्ची ने इसलिए झील में छलांग लगा दी थी कि उसका पिता उसे आगे नहीं पढ़ाना चाहता था। उसने नौंवी पास कर ली थी। उसका पिता चंडीगढ़ में रिक्शा चलाता है। जस्टिस जि़यापॉल−जैसे कितने जज, कितने नेता, कितने प्रोफेसर, कितने डॉक्टर, कितने पत्रकार इस देश में हैं, जो एक अनजान लड़की को बचाने के लिए अपनी जान दांव पर लगा दें? उनके अंगरक्षक का नाम तो राजकीय सम्मान के लिए सुझा दिया गया है लेकिन जस्टिस जियापॉल तो राष्ट्रीय सम्मान के हकदार हैं। जि़यापॉल जैसे लोग राष्ट्र ही नहीं, मानवता की शोभा हैं। हमारे देश के टीवी चैनल और अखबार टटपूंजिए नेताओं (और अभिनेताओं) के लिए अपना समय और स्थान बर्बाद करते रहते हैं। उनके जीवन से किसी को कोई प्रेरणा नहीं मिलती लेकिन जियापॉल− जैसे विलक्षण पुरुष के शौर्य की कहानी को हाशिए में डाल देते हैं। जि़यापॉल जैसे सत्पुरुष को किसी पुरस्कार ओर सम्मान की जरुरत नहीं है। पुरस्कार और सम्मान पाने वाले लोग अपनी जान दांव पर नहीं लगाते। वे अपनी जान पुरस्कारों में लगाते हैं। दुनिया को वे ही प्रेरणा देते हैं और बदलते हैं, जिन्हें सिर्फ अपने कर्तव्य की परवाह होती है। न जान की, न शान की, न पुरस्कार की और न ही तिरस्कार की!

साभार-  http://www.nayaindia.com/ से