Thursday, February 22, 2024
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सुतत नाहीं हईं अम्मा, सोचत हईं!

मेरी पसंद का निर्मल आकाश

मेरी पसंद का आकाश बहुत बड़ा नहीं है। लेकिन है अनंत। निर्मल और चांदनी से भरपूर है यह आकाश। मेरी पसंद में लिखना और सोना, सोना और लिखना एक दूसरे से गुत्थमगुत्था रहते हैं। यही दोनों मेरे पसंदीदा हैं। सोना ताज़गी देता है और लिखना जीवन। यह दोनों मिलकर मुझे शांति, सुख और संतुष्टि से भर देते हैं। यही दोनों ऐसे काम हैं जिन्हें सब कुछ छोड़-छाड़ कर मैं करता हूं। एक बार भोजन छोड़ सकता हूं, पर सोना नहीं। दस बार नौकरी छोड़ सकता हूं पर लिखना नहीं। सोने के लिए मैं बचपन से बदनाम हूं। खासकर दिन में भी सोना मुझे बहुत प्रिय है। कभी-कभार को छोड़कर जैसे भी हो अवसर निकाल लेता हूं। एक समय तो मेरे पिता जी मेरे सोने को लेकर इतना तबाह थे कि पूछिए मत।

टीन-एज था। पूरा घर परेशान रहता था मेरे सोने को ले कर। दिन में घर में सोना एलाऊ नहीं था। तो मैं पड़ोसियों के घर जाकर सो जाता था। पिता जी पड़ोसियों के यहां पहुंच जाते मुझे खोजते-खोजते। पिताजी के क्रोध से आजिज़ पड़ोसी मुझे देखते ही कहते, न यहां मत सोना। तुम्हारे पिताजी आते होंगे। मैं कभी मंदिर में, कभी पेड़ के नीचे सो जाता। पिताजी खोजते ही रह जाते। पहले सुबह चार बजे घर में जगा दिया जाता था। पढ़ने के लिए। बाद के दिनों में सुबह देर तक सोने लगा। पिताजी समझाते रहते, ‘सुबह जल्दी उठ कर देखो, बहुत अच्छा लगेगा।’ एक बार मैंने कह दिया, ‘एक बार आप सुबह देर तक सो कर देखिए, स्वर्ग जैसा आनंद मिलेगा!’ पिताजी ने माथा पीट लिया।

दफ़्तर में भी झपकी मारते देख लोग फ़ोटो खींचने लगे। लेकिन मेरी झपकी बदस्तूर जारी है। कहीं भी जाता हूं, सोने की जगह और समय पहले खोजता हूं। विद्यार्थी जीवन में निरंतर बाइस घंटे सोने का रिकार्ड भी है मेरे पास। परिवारीजन, ख़ासकर पिताजी को यह मेरा रिकार्ड आज तक याद है। अभी चंद रोज पहले ही पिताजी, मेरे टीन-एज ख़त्म करने की ओर अग्रसर बेटे से, इस बाइस घंटे सोने के रिकार्ड का ज़िक्र कर रहे थे। जाने तारीफ़ के भाव में या चिढ़ के भाव में। यह बात बेटा भी नहीं समझ पाया। ऐसा उस ने बताया।

यह किसी वैज्ञानिक शोध का निष्कर्ष नहीं है। ऐसा मैं महसूस करता हूं कि सोने से ताज़गी तो मिलती ही है, ऊर्जा भी मिलती है। थकान दूर होती है। इस सब से भी ज़्यादा सोचने की क्षमता बढ़ जाती है। क्या और कैसे लिखना है सोने के समय, सोते-सोते भी इमैजिन करता रहता हूं। टीन-एज था, कविताएं लिखता था। गांव जाता तो अम्मा टोकती, ‘बाबू का करत हव। केतना सुतब। उठ।’ मुंह तक चद्दर ओढ़े मैं कहता, ‘सुतत नाहीं हईं अम्मा, सोचत हईं!’ एक निर्मल सच यह भी है। कई बार यह भी होता है कि सोते-सोते अचानक कोई बिंदु मिल जाता है, कोई कथा पक जाती है, कोई कविता सूझ जाती है। कोशिश करता हूं कि उठ कर तुरंत उसे दर्ज करूं। लिख दूं। अकसर ऐसा होता है। आधी रात जाग जाता हूं। सुबह तक लिखता रह जाता हूं। कई बार इस के अविस्मरणीय नतीज़े मिले हैं।

कई बार आलसवश नहीं उठ पाया। और दूसरे दिन बात भूल गया। सिरे से भूल गया। बहुत सोचने पर भी, बहुत ज़ोर देने पर भी याद नहीं आया। सारा चिंतन स्वाहा हो गया। वह अविष्कार फ़िल्म में कपिल कुमार का लिखा कानू रॉय के संगीत में मन्ना डे का गाया एक गाना है न, हंसने की चाह ने इतना मुझे रुलाया है/कोई हमदर्द नहीं, दर्द मेरा साया है! तो मैं कहता हूं, लिखने की चाह ने इतना मुझे रुलाया है! मीरा के गीतों को जैसे कोई विष सताता था, वैसे ही मुझे यह रचनाएं लिखने के लिए सताती हैं, इन की विवशताएं मुझे सताती हैं, रुलाती हैं, लिखने ख़ातिर। जैसे दबोच लेती हैं मुझे। अवश हो जाता हूं।

वह लिखना जिस से एक पैसे की प्राप्ति नहीं होती। दो पैसे जाते ही हैं। उस लिखने में लगा रहता हूं। लोग हर काम पैसा कमाने के लिए करते रहते हैं। और ऐसे दौर में मैं लिखने के काम में लगा रहता हूं। सोने के नुकसान भी मैं ने ख़ूब उठाए हैं। बारंबार। कई बार लगता है कि अगर सोना मेरा कम होता, आलस मेरा कम होता तो जितना लिखा है, इस का कम से कम चारगुना और लिखा होता। नौकरी में भी दसगुना क्या सौगुना उछाल मिला होता। तो इस सोने ने मुझे सोना तो दिया है, मेरा हीरा मुझ से छीन लिया है, यह भी एक निर्मम सच है।

लेकिन जीवन में जितना तनाव है, जो जद्दोजहद है, इस सब से, तमाम-तमाम मुश्किलों से सोने ने बहुत उबारा है। लोगों के पास पैसे बहुत हैं, संपत्ति बहुत है। ऐश्वर्य बहुत है। मेरे पास यह सब कुछ नहीं है। पर मेरे पास नींद बहुत है। इतनी नींद न होती मेरे पास तो निश्चित ही मैं ब्लड प्रेशर का मरीज होता। कई बार लगता है कि सोना है तो लिखना है। भले कम है। लेकिन है तो सही। मेरे बहुत से मित्र लिखना-पढ़ना भूल गए। तीन-तिकड़म में फंस गए। गंजे हो गए। बीमार-बीमार रहने लगे। चिड़चिड़े रहने लगे। लेकिन मैं गंजा नहीं हुआ। चिड़चिड़ा नहीं हुआ। तीन-तिकड़म में नहीं फंसा। दो-दो बार साक्षात मौत से लड़ कर लौटने के बावजूद बीमार-बीमार घूमने के बजाय मस्त-मस्त घूमता हूं। मस्त बहारों का आशिक बन कर। लिखता रहता हूं इसी मस्ती के साथ। मेरे आदरणीय पाठक मित्र अपने कंधे पर मुझे बिठाए घूमते हैं, अपना असीम पाठकीय प्यार मुझ पर लुटाते रहते हैं, न्यौछावर रहते हैं मेरे लिखे पर। चाहता हूं कि मेरे भगवान मेरे लिए यही चार चीज़ बनाए रखें, सोना, लिखना, पाठक मित्रों का प्यार और स्वास्थ्य। मैं शांति, सुख और संतुष्टि से सर्वदा भरपूर रहूंगा।

भोजन में भी कुछ चीज़ें बेहद पसंद हैं। रोटी, चावल, दाल, सब्जी तो रूटीन में हैं ही। लेकिन लिट्टी चोखा और चिकन भी मुझे बहुत पसंद हैं। दशहरी आम, भुट्टा भी बहुत पसंद है। मौसम में जब तक यह दोनों रहते हैं, रोज ही मुझ से मिलते हैं। हरे मटर की घुघुरी का भी यही हाल है। कटहली और भिंडी की सब्जी के क्या कहने। मुझे अच्छे और सलीक़े से कपड़ा पहनना भी अपने जितना ही प्रिय है। धोती-कुरता से लगायत सूट-बूट-टाई तक। लेकिन आत्म-मुग्ध नहीं हूं मैं। अच्छी औरतों को देखना, अच्छा संगीत सुनना और पहाड़ पर घूमना भी मेरा पसंदीदा काम है। इन दिनों की फ़ेहरिश्त में एक नया शग़ल और जुड़ा है जीवन में।

फ़ेसबुक पर गश्त करना। अच्छी फ़िल्मों का भी मैं आशिक़ हूं। प्रेम और सेक्स के बिना जीवन जीना भी मुझे बहुत मुश्किल जीवन लगता है। सोने और लिखने की तरह प्रेम और सेक्स भी मेरे जीवन के प्रिय और अनिवार्य विषय हैं। उतने ही महत्वपूर्ण। हजारी प्रसाद द्विवेदी, अज्ञेय, मोहन राकेश, निर्मल वर्मा और मनोहर श्याम जोशी की भाषा पर मैं मोहित हूं। सुंदर और सुलझी हुई स्त्रियां, सुंदर संगीत, ख़ूब लिखना, ख़ूब सोना, मेरा परिवार और मेरे प्यारे-प्यारे असंख्य पाठक मित्र मेरे जीवन को सर्वदा सुंदर और सानंद बनाए रखते हैं। बस और कुछ नहीं चाहिए। मेरी पसंद का निर्मल आकाश बस इतना ही है, चांदनी में नहाया हुआ।

साभार- https://sarokarnama.blogspot.com से

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