Saturday, May 25, 2024
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मीनाकुमारी की ये कहानी आपको रुला देगी

धर्मेन्द्रनाथ ओझा

मुम्बई के दादर स्टेशन पूर्व में एक भीड़ भाड़ वाली सड़क है जिसका नाम है दादा साहेब फाल्के रोड। जहां इलेक्ट्रॉनिक दुकान से लेकर कपड़े, लुंगी और लस्सी बिकते नज़र आते हैं। इसी सड़क पर बड़े बड़े फिल्म स्टूडियो हुआ करते थे जिसमें रणजीत और रूपतारा स्टूडियो के अवशेष आज भी खड़े हैं।

हिंदुस्तान पर अंग्रेजों का राज है। दादर स्टेशन के पास वाली सड़क दादा साहेब फाल्के रोड का नाम नैगम क्रॉस रोड है। रूपतारा स्टूडियो के आगे फिल्मी कलाकारों की गाड़ियां आके रुका करती है। स्टूडियो के सामने दो मंजिला एक पुरानी बेरंग इमारत खड़ी है जिसका नाम मीतावाला चॉल है। उसमें ज़्यादातर परिवार भाड़े पे रहते हैं। उसमें एक परिवार मास्टर अली बख़्श और इक़बाल बेगम का है।

मास्टर अली बख़्श फिल्म और नाटक कम्पनी में हारमोनियम बजाते हैं। वे लाहौर से संगीतकार बनने का ख़्वाब लेकर मुम्बई आए है। मुम्बई के कृष्णा फिल्म कम्पनी के म्यूजिक डिपार्टमेंट में काम करते हुए मेरठ से आई एक क्रिश्चियन डांसर से उनकी आँखें चार हो जाती है। तीखे नैन नक्श वाली उस डांसर पे अली बख़्श फिदा हो जाते हैं। हालांकि अली बख़्श पहले से शादीशुदा हैं उनकी पत्नी लाहौर के पास अपने गांव में रहती है। उन्होंने उस क्रिश्चियन लड़की प्रभावती से दूसरी शादी रचाते हैं। वह क्रिश्चियन लड़की इस्लाम कबूल करके प्रभावती से इक़बाल बेगम बन जाती है।

दोनों फिल्म कम्पनी में काम करते हुए मुफ़लिसी में ज़िन्दगी काट रहे हैं। उनकी पहली औलाद लड़की होती है। अली बख़्श लड़का चाहते हैं लेकिन वह पहली औलाद को ख़ुदा की नेमत मानकर मंज़ूर कर लेते हैं।

जब इक़बाल बेगम दूसरी बार गर्भवती होती है तो अली बख़्श बेटे की चाह में माहिम दरगाह पर चादर चढ़ाता है। सेहतमंद बेटे की आस में बीवी को किशमिश और छुहारे खिलाता है।

जब बीवी प्रसव पीड़ा से तड़पने लगती है तो अली बख़्श उसे तांगे पे बिठाकर परेल में डॉ गाडरे के क्लिनिक ले जाता हैं। अगले दिन 1 अगस्त 1933 को इक़बाल बेग़म दुबारा एक बच्ची को जन्म देती है।

बेटे की चाह में अली बख़्श जब बेटी पैदा होने की ख़बर सुनते हैं तो उनके ऊपर दुःख का पहाड़ टूट जाता है।
सात दिन बाद इकबाल बेग़म अपनी नवजात शिशु को लेकर मीतावाला चॉल लौटती हैं। लेकिन अली बख्श अपनी नवजात औलाद का मुँह तक नहीं देखता। उसे लगता है ये दूसरी औलाद लड़की नहीं बल्कि एक बला है…जो उनकी ज़िंदगी तबाह करने आई है।

इकबाल बेगम के समझाने पर भी बाप अपनी बेटी के चेहरे तक को नहीं देखता। उसे अपने ख़ुदा से शिकायत है कि बेटे के बदले मुझे बेटी क्यों दिया ?

रात को जब इकबाल बेगम अपनी नवजन्मा बच्ची के साथ सो रही है अचानक आधी रात को उनकी नींद खुल जाती है। बिस्तर पर हाथ टटोल कर देखती है तो वहाँ बच्ची नहीं है। बेगम घबराकर उठती है और लैम्प जलाकर देखती है तो बड़ी बेटी बाप के बिस्तर पर सो रही। लेकिन नवजन्मा बच्ची और अली बख्श दोनों गायब हैं। इकबाल बेगम का आशंका से दिल धड़कने लगता है । वह कमरे से बाहर निकलती है तो देखती है कि लम्बे बालकनी में खड़े अली बख़्श बीड़ी पी रहे हैं। बेगम भागती हुई उनकी तरफ आती है और पूछती है कि मेरी बेटी कहाँ है ? अली ख़ामोशी से बीड़ी पी रहा है। बेगम जब गुस्से में कांपते हुए पूछती है कि मेरी बेटी कहाँ है…बता रहे हो या मैं चिल्लाकर पूरे चॉल को जगाऊँ ? अली बख़्श अपनी बीवी को एक नज़र देखता है और कहता है यतीमखाने की सीढ़ियों पर छोड़कर आया हूँ।

बावली होकर बेगम भागना शुरू करती है लेकिन वह इतनी कमज़ोर हो चुकी है कि पांच छह कदम के बाद ही लड़खड़ाकर बालकनी में बेहोश हो जाती है।

बेगम को जब होश आता है तो देखती है कि उसकी नवजन्मा बेटी उसके पास सो रही है। उसके चेहरे पर छोटे छोटे लाल दाग पड़ चुके हैं। पास में अली बख़्श बैठे हुए हैं। बेगम पूछती है ये मेरी बच्ची को क्या हुआ मास्टरजी ?

अली बख़्श शर्मिंदगी महसूस करते हुए कहते हैं बेगम, तुमने मेरे हाथों बहुत बड़े गुनाह से बचा लिया। जब आप बालकनी में बेहोश होकर गिर पड़ी तो मैंने आपको फ़ौरन कमरे में लाकर बिस्तर पे लिटाया और फिर भागते हुए यतीमखाने पहुँचा। हमारी बेटी यतीमखाने की सीढ़ियों पर पड़ी घुटी हुई आवाज़ में रोती जा रही थी। अल्लाह का शुक्र है कि किसी आवारे कुत्ते की इसपे नज़र नहीं पड़ी। जब मैंने इसे गोद में उठाया तो पाया कि हमारी नन्ही जान के बदन को लाल चींटियों ने घेर रखा है। मैंने अपने अंगोछे से इसके बदन की चींटियों को साफ किया। बेगम कहती है अगर मेरी नींद नहीं खुलती तो रात भर में हमारी बच्ची को चीटियाँ खा डालती। अली बख़्श अपने गुनाह के लिए बार बार माफी मांगता है। बेगम का नर्म दिल उसे माफ़ कर देता है।

इस बच्ची का नाम रखा जाता है माहज़बीं । माहज़बीं बहुत खूबसूरत और संजीदा लड़की के रूप में बड़ी होने लगती है। उसके घर के सामने रूपतारा स्टूडियो है और बीच का सड़क उन बच्चों का खेलने का मैदान है। माहज़बीं अपने दोस्तों के साथ रूपतारा फिल्म स्टूडियो के सामने मोटरगाड़ियां देखने के लिए खड़ी हो जाती है उस मोटरगाड़ियों में फिल्मी दुनिया के लोग अक्सर आते जाते हैं। वो फिल्म स्टूडियो माहज़बीं के लिए एक जादू का पिटारा है। जिसमें बड़ी बड़ी गाडियां अंदर जाके गायब हो जाती है। गेटकीपर स्टूडियो गेट तक बच्चों को फटकने नहीं देता है।

एकदिन स्टूडियो गेट पर बैठे पठान के लिए माहज़बीं माँ के हाथ का बनाया हुआ गर्म गर्म पकौड़े लेकर जाती है और कहती है अंकल, माँ ने आपके लिए पकौड़े बनाए हैं खा लो। पकौड़े खाने के बाद पठान कहता है मेरा बच्चा, तुझे अंदर जाना है। वह हाँ में गर्दन हिलाती है। पठान उसे अंदर जाने देता है और कहता है किनारे चुपचाप खड़े होकर फिल्मी सितारों को देखना। वह अंदर जाती है । अंदर गाड़ी, तांगे और दुकान की सेट देखती है। कुछ औरतें साड़ियां पहनकर घूम रही है। अचानक अंदर एक गाड़ी आकर रुकती है उसमें एक लंबा चौड़ा गोरा फिल्मी सितारा उतरता है। माहज़बीं उसे पहचान लेती है। उसे फिल्म सीता के पोस्टर पर उसने देखा था। उस स्टार का नाम होता है पृथ्वीराज कपूर।

अली बख्श अपनी बड़ी बेटी ख़ुर्शीद को फिल्म की शूटिंग के लिए स्टूडियो ले जाते हैं। लेकिन उससे घर का खर्चा नहीं चल पाता। चार साल की माहज़बीं को अली बख़्श सोहराब मोदी के स्टूडियो मिनर्वा टॉकीज लेकर जाते हैं जहाँ फिल्म जेलर की कास्टिंग हो रही है। कमाल अमरोही उसके स्क्रिप्ट राइटर हैं। उनको चार पाँच साल की एक लड़की की ज़रूरत होती है। कमाल साब 5 साल की माहज़बीं को देखते हैं उससे कुछ सवाल करते हैं। लेकिन उसका चुनाव फिल्म के लिए नहीं होता।

एकदिन इकबाल बेगम अपनी बेटी माहज़बीं को लेकर मुम्बई के अंधेरी ईस्ट में स्थित प्रकाश स्टूडियो जाती हैं। निर्माता निर्देशक विजय भट्ट से वह अपनी बेटी की बात करती हैं। माहजबीं इतनी बातूनी है कि विजय भट्ट उसके साथ दो फिल्मों का कांट्रेक्ट कर लेते हैं। 1939 में माहजबीं की दो फिल्में लेदर फेस और अधूरी कहानी रिलीज होती है। पाँच साल की उम्र से माहजबीं पांच सदस्यों का घर की जिम्मेवारी उठा लेती है। अली बख़्श के हाथों में रुपये आने लगते हैं। ज़रूरत के साथ रुपये की अहमियत बढ़ने लगती है। दादर वाली खोली छोड़कर बांद्रा में एक छोटा सा पुराना बंगला खरीद लिया जाता है जिसका नाम रखा जाता है इकबाल मैन्शन।

माहजबीं से दुनिया, मर्द जात और हालात भले बेवफ़ाई करते रहे लेकिन मरते दम तक वो लड़की अपनी हाड़ मांस गलाके बेटी होने का फ़र्ज़ निभाती रही। कुछ ही सालों में यह माहज़बीं हिन्दी सिनेमा के आसमान पर मीना कुमारी नाम का सितारा बनकर चमकने लगती है। जिस बच्ची को ग़ैरज़रूरी मानकर उसका बाप यतीमखाने की सीढ़ियों पर चींटियों का आहार के लिए छोड़ देता है वो बच्ची मीना कुमारी के रूप में हिंदुस्तान की महान अदाकारा बनकर मोहब्बत, शायरी और अपनी अदाकारी से दुनिया का दामन भर देती है।

मीना कुमारी की 52वीं पुण्यतिथि 31 मार्च 1972

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