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किर्गिस्तान में तीसरी बार तख़्तापलट: लोकतांत्रिक क्रांति से विद्रोह तक

किर्गिस्तान में सरकार के सिस्टम में बदलाव 2005 की ‘ट्यूलिप क्रांति’ और 2010 की ‘सेकेंड क्रांति’ के बाद हुए थे

पूर्व सोवियत गणराज्य का हिस्सा रहे किर्गिस्तान का सत्तावादी सरकार से लोकतांत्रिक रूप की तरफ़ बदलाव बेहद कम समय तक रहा. हाल के देशव्यापी प्रदर्शन के बाद राष्ट्रपति सूरोनबई जीनबेकोव किर्गिस्तान के तीसरे ऐसे राष्ट्रपति बन गए हैं जिनका तख्त़ापलट कर दिया गया. किर्गिस्तान में सरकार के सिस्टम में बदलाव 2005 की ‘ट्यूलिप क्रांति’ और 2010 की ‘सेकेंड क्रांति’ के बाद हुए थे. 5 अक्टूबर 2020 से किर्गिस्तान तीसरी क्रांति की लहर से अस्त-व्यस्त था. इस क्रांति की वजह से व्यापक प्रदर्शन हुए. प्रदर्शनों का ये सिलसिला चुनाव में धांधली और जीनबेकोव को सत्ता से बाहर किए जाने के बाद शुरू हुआ. इन प्रदर्शनों के बाद प्रधानमंत्री के तौर पर सदिर जापारोव की नियुक्ति मध्य एशिया के इकलौते उस देश के लिए एक विद्रोह की तरह लगती है जहां अभी भी लोकतंत्र है भले ही वो नाम मात्र का क्यों न हो. जेल से बाहर आए जापारोव एक अनुभवी राजनेता हैं जो पुराने संभ्रांत लोगों की नुमाइंदगी करते हैं और जिन्होंने प्रदर्शनों का इस्तेमाल अपने संकीर्ण मतलबों के लिए किया है. जापारोव के जेल से रिहा होने के सिर्फ़ 10 दिन बाद उनके समर्थकों ने राष्ट्रपति जीनबेकोव को इस्तीफ़े के लिए मजबूर कर दिया और इस तरह जापारोव के प्रधानमंत्री और कार्यकारी राष्ट्रपति बनने का रास्ता साफ़ हो गया.

5 अक्टूबर 2020 से किर्गिस्तान तीसरी क्रांति की लहर से अस्त-व्यस्त था. इस क्रांति की वजह से व्यापक प्रदर्शन हुए. प्रदर्शनों का ये सिलसिला चुनाव में धांधली और जीनबेकोव को सत्ता से बाहर किए जाने के बाद शुरू हुआ.

महामारी और चुनाव में धांधली
मौजूदा कोविड-19 महामारी का किर्गिस्तान पर काफ़ी असर पड़ा. यहां की अर्थव्यवस्था, ख़ास तौर पर ग़रीबों की स्थिति पर, महामारी का बेहद ख़राब असर पड़ा. महामारी के दौरान घटिया स्वास्थ्य इंफ्रास्ट्रक्चर, स्वास्थ्य सेवा और बढ़े हुए भ्रष्टाचार ने लोगों को बदलाव के लिए उत्सुक किया. बढ़ते अंतर्राष्ट्रीय क़र्ज़ और रूस से कम भेजी गई रक़म की वजह से राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था ध्वस्त हो गई. अनुमानों के मुताबिक़ 5 लाख से ज़्यादा लोग हर साल किर्गिस्तान छोड़कर पड़ोस के कज़ाकिस्तान और रूस में मौसमी काम के लिए जाते हैं. महामारी के दौरान वहां से पैसे भेजने में 60 प्रतिशत से ज़्यादा की कमी आई. महामारी का असर कच्चा माल इकट्ठा करने वालों से ज़्यादा उन लोगों ने महसूस किया जो कारखानों में काम करते हैं और जो तैयार माल बेचते हैं.

उत्तरी किर्गिस्तान ज़्यादा विकसित है और यहां रहने वाले लोग कारखानों में काम करने और सामान बेचने पर ज़्यादा निर्भर हैं जबकि दक्षिणी किर्गिस्तान के लोग ज़्यादातर खेती पर निर्भर हैं. दक्षिण में रहने वाले लोगों का इतिहास कोकंड खानाते के समय से थोड़ा सुस्त रहने का है, जबकि उत्तरी किर्गिस्तान के लोग ज़्यादातर ख़ानाबदोश बने रहे, उन पर कोकंड खानाते का ज़्यादा असर नहीं पड़ा. पूर्व सोवियत गणराज्य के बनने के बाद उत्तरी किर्गिस्तान के लोग भी सुस्त बने. आर्थिक, वैचारिक और जातीय तौर पर अलग-अलग उत्तर और दक्षिण के इलाक़ों के राजनेताओं के बीच इस लंबी लड़ाई ने किर्गिस्तान की राजनीति में कई दशकों से भूमिका निभाई है. महामारी के असर और कारोबार के केंद्रों पर इसके आर्थिक असर ने उत्तर और दक्षिण के बीच बंटवारे को बढ़ा दिया है और इसकी वजह से हालात बिगड़ गए.

प्रदर्शनकारियों ने सरकारी इमारतों पर धावा बोल दिया और संसद की इमारत पर कब्ज़ा कर लिया. लोगों के विरोध और हिंसा के आगे झुकते हुए चुनाव आयोग ने चुनाव के नतीजे को रद्द कर दिया

किर्गिस्तान में 4 अक्टूबर को संसदीय चुनाव हुआ जिसमें किर्गिस्तान के राष्ट्रपति सूरोनबई जीनबेकोव के सहयोगियों और समर्थक पार्टियों को धांधली, मतदाताओं को ख़रीदने और सरकारी संसाधनों के दुरुपयोग के आरोपों के बीच विजेता घोषित किया गया. संसद की 120 सीटों के लिए दावेदार 16 पार्टियों में से सिर्फ़ चार पार्टियों को संसद में प्रवेश के लिए निर्धारित 7 प्रतिशत मत मिले. जीनबेकोव के छोटे भाई एसिलबेक जीनबेकोव की नई गठित पार्टी बिरिमदिक पार्टी और अन्य दो पार्टियों जैसे मेकेनिम किर्गिस्तान और किर्गिस्तान पार्टी- राष्ट्रपति की क़रीबी समर्थक- ने सबसे ज़्यादा सीटें जीतीं जिन्हें क्रमश: 24.5 प्रतिशत, 23.8 प्रतिशत और 8.7 प्रतिशत वोट मिले.

जीनबेकोव का विरोध करने वाली जिस पार्टी को संसद में प्रवेश मिला वो थी बुटुन किर्गिस्तान जो राष्ट्रवादी पार्टी है और जिसे 7.3 प्रतिशत वोट मिले. बाक़ी 12 राजनीतिक पार्टियां संसद में प्रवेश के लिए निर्धारित वोट पाने में नाकाम रहीं. जापारोव को यहां तक कि कुछ विरोधी राजनीतिक गुटों जैसे रेसबपब्लिका पार्टी और अता-मेकेन पार्टी के विरोध का भी सामना करना पड़ा. किर्गिस्तान की ज़्यादातर रजिस्टर्ड राजनीतिक पार्टियों का गठन प्रभावशाली कारोबारियों, राजनेताओं और अपराधियों ने किया है जो पारिवारिक संबंधों और क्षेत्रीय भावनाओं से एकजुट हैं.

प्रदर्शन, क़ैदी, राष्ट्रपति और आपातकाल
धांधली वाले चुनाव ने लोगों और विरोधी पार्टियों को, ख़ासतौर पर विकसित उत्तरी इलाक़े में, सरकार के ख़िलाफ़ प्रदर्शन का मौक़ा दिया. संसदीय चुनाव में धांधली को उजागर करने के लिए सोशल मीडिया का इस्तेमाल किया गया. 5 अक्टूबर को प्रदर्शन भड़कने के बाद क़ानून लागू करने वाली एजेंसियों ने प्रदर्शनकारियों पर पानी की बौछारों, आंसू गैस और रबर के बुलेट का इस्तेमाल किया. इसके बाद हुई हिंसा में एक व्यक्ति की मौत हुई और 600 से ज़्यादा लोग घायल हो गए. प्रदर्शन तेज़ होने के बाद भीड़ को काबू करने में सुरक्षा एजेंसियों को संघर्ष करना पड़ा. प्रदर्शनकारियों ने सरकारी इमारतों पर धावा बोल दिया और संसद की इमारत पर कब्ज़ा कर लिया. लोगों के विरोध और हिंसा के आगे झुकते हुए चुनाव आयोग ने चुनाव के नतीजे को रद्द कर दिया जिसकी वजह से सरकार में खालीपन आ गया. दक्षिण की पार्टियों की व्यापक जीत ने उत्तर की परिवार आधारित पार्टियों को राजधानी बिश्केक पर धावा बोलने के लिए उकसाया.

संसद की इमारत पर धावा बोलने के बाद विपक्षी पार्टियों और प्रदर्शनकारियों ने कई हाई-प्रोफाइल राजनीतिक क़ैदियों को रिहा कर दिया. नेशनलिस्ट पार्टी के पूर्व सांसद सदिर जापारोव, जिन्हें 11 साल 6 महीने क़ैद की सज़ा दी गई थी, को भी रिहा करा लिया गया. जिन दूसरे लोगों को इन प्रदर्शनों के दौरान रिहा कराया गया उनमें दो पूर्व प्रधानमंत्री और एक पूर्व राष्ट्रपति शामिल थे जिन्हें भ्रष्टाचार के आरोप में गिरफ़्तार किया गया था.

राष्ट्रपति जीनबेकोव ने इन अराजक प्रदर्शनों, राजनीतिक क़ैदियों की रिहाई और ज़बरन सत्ता पर कब्ज़ा करने की कोशिश को विद्रोह बताया और आपातकाल का एलान कर दिया.

बिश्केक में अराजकता के बीच 2017 से किर्गिस्तान के राष्ट्रपति रहे जीनबेकोव को सुरक्षा के लिए एक अज्ञात जगह ले जाया गया. राष्ट्रपति जीनबेकोव ने इन अराजक प्रदर्शनों, राजनीतिक क़ैदियों की रिहाई और ज़बरन सत्ता पर कब्ज़ा करने की कोशिश को विद्रोह बताया और आपातकाल का एलान कर दिया. लेकिन आख़िरकार उन्हें नरम होना पड़ा और उन्होंने 15 अक्टूबर को इस्तीफ़ा दे दिया. अपने लिए मज़बूत समर्थन और अपने गुट के आमने-सामने की कार्रवाई के दम पर जापारोव किर्गिस्तान के निर्विवादित राजा बन गए. अपने लक्ष्य को हासिल करने के लिए उन्होंने अपने समर्थकों को हिंसा फैलाने की खुली छूट भी दे दी. जापारोव के समर्थकों ने पत्रकारों पर हमले किए, शांतिपूर्ण रैलियों पर पत्थरबाज़ी की और यहां तक कि पूर्व राष्ट्रपति आतमबायेव की हत्या करने की भी कोशिश की. प्रदर्शनों के दौरान आतमबायेव के समर्थकों ने उन्हें रिहा कराया था लेकिन जापारोव ने उन्हें फिर से गिरफ़्तार करके जेल भेज दिया.

अभी तक जिन दूसरे लोगों को गिरफ़्तार किया गया है उनमें आतमबायेव के भरोसेमंद और सहयोगी रईमबेक मातराईमोव शामिल हैं. मातराईमोव को उनके पैसों की वजह से “रईम मिलियन” के नाम से भी पुकारा जाता है. वो भ्रष्टाचार के बड़े स्तर के मामलों में शामिल रहे हैं और उन्हें राजनीतिक पार्टियों को फंड देने वाला माना जाता था. अपने पूर्ववर्तियों की तरह देश के प्रशासन पर जापारोव की पकड़ मज़बूत होने के साथ आने वाले दिनों में कई और गिरफ़्तारियां होने की उम्मीद है. कई मेयर और दूसरे अधिकारियों को इस्तीफ़ा देने के लिए मजबूर किया गया है और उनकी जगह जापारोव के समर्थक काबिज़ हो गए हैं.

महामारी ने समस्याओं को और बढ़ाया है. बढ़ती परेशानियों ने लोगों को विदेशी मालिकाना हक़ वाली सोने की खदानों पर हमला करने के लिए प्रेरित किया है.

किर्गिस्तान में विद्रोह का लंबा इतिहास रहा है, लेकिन इस बार अपराधियों के गिरोह ने अपने समर्थकों के साथ सत्ता पर जापारोव के दावा ठोकने में मदद की. चूंकि किर्गितान तस्करी के आकर्षक रास्ते में स्थित है, ऐसे में ज़्यादातर राजनेताओं के बारे में माना जाता है कि उनके संबंध अपराधियों के सिंडिकेट से हैं. उदाहरण के लिए, जापारोव के पीछे मज़बूती से खड़े कामचीबेक कोलबायेव को अमेरिका की सरकार ने “मध्य एशिया के कुख्य़ात अपराध सिंडिकेट के सरगना” के तौर पर बताया है. जापारोव के बारे में भी कहा जाता है कि उन्हें अपराधियों के गिरोह का समर्थन हासिल है. कार्यकारी राष्ट्रपति के तौर पर उन्होंने 22 अक्टूबर को एक घोषणा की है और 2021 तक नया चुनाव टालने के लिए क़ानून में फेरबदल पर हस्ताक्षर किए हैं. इस फेरबदल को रिफॉर्म पार्टी ने किर्गिस्तान के सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है.

चूंकि किर्गितान तस्करी के आकर्षक रास्ते में स्थित है, ऐसे में ज़्यादातर राजनेताओं के बारे में माना जाता है कि उनके संबंध अपराधियों के सिंडिकेट से हैं.

वैसे तो किर्गिस्तान अमेरिका, रूस और चीन के बीच भूराजनीतिक दुश्मनी के केंद्र में है, लेकिन मौजूदा अव्यवस्था पूरी तरह अंदरुनी लगती है. महामारी ने समस्याओं को और बढ़ाया है. बढ़ती परेशानियों ने लोगों को विदेशी मालिकाना हक़ वाली सोने की खदानों पर हमला करने के लिए प्रेरित किया है. कनाडा, रूस और चीन के स्वामित्व वाली सोने की ये खदानें देश की जीडीपी में सबसे ज़्यादा योगदान देती हैं. मौजूदा संकट उत्तरी किर्गिस्तान के हिंसक जातीय ख़ानदानों द्वारा किया गया विद्रोह है. अब ये तो समय ही बताएगा कि एक निचले पायदान के, दोषी राजनेता की प्रधानमंत्री के साथ-साथ राष्ट्रपति के पद पर नियुक्ति से किसको फ़ायदा होगा- अपराधियों के गिरोह को, भ्रष्ट राजनेताओं को या लोगों को. मौजूदा संविधान के मुताबिक़ अगर किसी राष्ट्रपति को हटाया जाता है या उसे बर्ख़ास्त किया जाता है तो राष्ट्रपति का चुनाव तीन महीनों में कराना ज़रूरी है.

साभार- https://www.orfonline.org/hindi/ से

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