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क्या बदलाव लेकर आई है नई शिक्षा नीति

भारत सरकार द्वारा लगभग 5 वर्षों तक राष्ट्र की शिक्षा हेतु परामर्शदाताओं, हितधारकों, शिक्षा संचालकों, आमजनता आदि के साथ कार्यशालाएं आयोजित करने के बाद, गहन विचार विमर्श करने के बाद, विभिन्न सेमिनार आयोजित कर लेने के पश्चात नई शिक्षा नीति को लागू किया गया है। अब यह सर्वजन के सम्मुख सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध है। कोई भी नीति दस्तावेज सरकार की मंशा का विवरण होता है। जो दिशा निर्देश प्रदान करता है। इस शिक्षा नीति दस्तावेज को उसमें उल्लेखित सभी नियमों और निर्देशों का पालन करके एक प्रक्रिया तथा प्रोटोकॉल के रूप में लागू किया जाना है। भारतीय शिक्षा में क्रांति लाने के लिए तय मार्ग को तोड़ते हुए बड़ी परिवर्तनकारी पहल के साथ ही साथ इसमें संरचनात्मक परिवर्तन किए गए हैं जो पूर्व की शिक्षा नीतियों में नहीं पाए गए हैं।

नई शिक्षा नीति की अनेक विशेषताएं हैं, अनेक नवीनताएं हैं।इस आलेख में उन विशेषताओं को संक्षिप्त में लिया जाएगा जो इस प्रकार से है:-

21वीं सदी के कौशल युक्त मूल्यों को मानने वाले तथा जीवन कौशल संयुक्त व्यक्तियों की उपेक्षा किए बिना समग्र एकीकृत व्यापक और सभी समावेशी उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा के लिए यह शिक्षा नीति दिशा प्रदान करती है।

34 वर्षों के लंबे इंतजार के बाद नई शिक्षा नीति मिली है, इसमें महत्वपूर्ण यह है कि यह 21वीं सदी के लिए है।
स्कूली शिक्षा की संरचना को 10+2 से बदलकर 5+3+3+4 संरचना में लाना एक नई अवधारणा है।
इसमें आंगनवाड़ी/बाल वाटिका/पूर्व विद्यालय के अंतर्गत 3 वर्ष की शिक्षा तथा चार चरणों में 12 वर्षीय विद्यालयी शिक्षा है, भी सम्मिलित है। इस प्रकार 15 वर्षीय विद्यालय शिक्षा सम्मिलित है।
प्रारंभिक बचपन की देखभाल और ईसीसीई (ECCE) को मुख्यधारा शिक्षा के अंतर्गत सभी आंगनवाड़ीओं, बाल विकास केंद्रों और अन्य पूर्व प्राथमिक कक्षाओं को लाना यह नवीन अवधारणा है।
पूर्व प्राथमिक शिक्षा के साथ निरंतर स्वास्थ्य देखभाल, स्व-सहायता, स्व-कौशल सुनिश्चित करने के लिए व्यवस्था करना भी नवीन और महत्वपूर्ण अवधारणा है.
व्यावसायिक शिक्षा पर जोर दिया गया है जो महत्वपूर्ण है।
साथ ही माध्यमिक शिक्षा तक शुन्य ड्रॉपआउट अर्थात 100% छात्रों को माध्यमिक स्तर तक बनाए रखने का लक्ष्य महत्वपूर्ण है ताकि सतत विकास लक्ष्यों एसडीजी (SDG) को प्राप्त किया जा सके।
FLN फाउंडेशन लिटरेसी एंड न्यूमेरसी: सीखने के परिणामों की गुणवत्ता और उपलब्धि को बेहतर बनाने की दिशा में यह महत्वपूर्ण परिवर्तन है।
स्कूल संसाधन और शिक्षकों के ताजा करने की बात भी इसमें नवीन अवधारणा है जो कि महत्वपूर्ण है।
भाषा सीखने में बाधा की तरह ही कार्य करते हैं इस बाधा पर नियंत्रण करना इस शिक्षा नीति की नवीन और महत्वपूर्ण बात है प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा में शिक्षण किया जाए यह महत्वपूर्ण है भारतीय भाषाओं में शिक्षा का महत्वपूर्ण पहलू है।
स्कूलों के लिए मानक तय करना इसका महत्वपूर्ण पक्ष है।
शिक्षक शिक्षा में सुधार भी करना इस शिक्षा नीति के अंतर्गत कहा गया है।

कोई भी नीति या योजना को सफलता तभी मिलती है जब उसके क्रियान्वयन में सभी क्षेत्र धारकों एवं भागीदारों को सम्मिलित करते हुए अत्यंत सावधानी के साथ रणनीति बनाते हुए देखभाल करके लागू किया जाए। शिक्षा नीति को लागू करने के लिए कुछ चुनौतियां है साथ में कुछ सुझाव भी अपेक्षित है जो निम्न प्रकार से है।

1. नई शिक्षा नीति के दस्तावेज को सभी शिक्षा हितधारकों द्वारा समझा जाना:- प्रभावी क्रियान्वयन तभी संभव है जब सभी हितधारक इस दस्तावेज के मिनट विवरण और विशिष्टताओं को समझें, यह चुनोती है। शिक्षाविदों, बुद्धिजीवियों, शिक्षा नेताओं, मीडिया और नीति कार्यान्वयनकर्ताओ को अच्छी तरह से समझना आवश्यक है कि इस नीति में क्या विशेषताएं है और पिछली नीतियों से अलग क्या है? यह किस प्रकार सभी 17 SDG (सतत विकास लक्ष्य) को प्राप्त करने में, भारत के युवाओं को वैश्विक प्रतिस्पर्धा का सामना करने में तैयार करता है?

2. इसकी सफलता जमीनी स्तर पर तथा स्कूलों में शिक्षकों पर निर्भर करती है:- शिक्षकों का प्रदर्शन शिक्षा के क्षेत्र में सबसे महत्वपूर्ण निवेश है। इस शिक्षा नीति का अंतिम विश्लेषण और व्यख्या कर कार्यान्वयन शिक्षकों द्वारा ही किया जाना है। देश में शिक्षकों की बहुत बड़ी संख्या है।

20 लाख बालवाटिक
20 लाख आंगनवाड़ी
80 लाख प्राथमिक शिक्षक
20 लाख माध्यमिक शिक्षक
30 उच्च शिक्षा शिक्षक

कुल 1.5 करोड़ शिक्षकों की शक्ति हैै। इन शिक्षकों को शिक्षा नीति को विस्तार सेे समझाना, उन्हें उनकी विशेष भूमिका का ज्ञान करवाना यह सरल कार्य नहीं है।सरकार के सामने इन सभी को नई शिक्षा नीति 20 के बारे में शिक्षित करना, सशक्त बनाना, उन्नयन करना, प्रशिक्षण देना और कुशल बनाना बहुत बड़ी चुनौती है।

3. प्रारंभिक शिक्षा सामग्री का निर्माण:- नई शिक्षा नीति में बहुभाषावाद पर अधिक बल दिया गया है। स्थानीय भाषा में उच्च गुणवत्ता वाली पाठ्य पुस्तकों के निर्माण के लिए बहुत परिश्रम करने की आवश्यकता है। ऐसी अनेक भाषाएं हैं जो बिना किसी लिपि के बोली जाती है। उनके लिए सामग्री निर्माण करना एक बड़ी चुनौती होगी।

4. पूर्व प्राथमिक शिक्षा की सामग्री निर्माण:- बचपन की देखभाल और शिक्षा यह एकदम नई अवधारणा है। अनेक निजी विद्यालयों ने इस दिशा में काम किया भी है। सरकार को इन सभी संगठनों निकायों एनसीईआरटी, एससीईआरटी, स्कूल शिक्षा विभागों आदि से सहायता लेकर इस पर कार्य करने की आवश्यकता है। जहां जहां अच्छे प्रयोग चल रहे हैं उनकी योजनाओं को भी देखकर, समझ कर आगे बढ़ना होगा।

5. समग्रता युक्त सामग्री निर्माण:- ज्ञान खण्ड खण्ड नहीं होता है। ज्ञान निरन्तर, एकीकृत और व्यापक होता है। इसलिए नई शिक्षा नीति 2020 में यह माना गया है कि अब पाठ्यचर्या में पाठ्यसहगामी या पाठ्येतर गतिविधियां अलग नहीं होगी। कला, मानविकी, विज्ञान के बीच अथवा अकादमिक व गैर शैक्षणिक धारा के बीच कोई कठोर अलगाव नहीं रहेगा। इस प्रकार की एकीकृत सामग्री का निर्माण एक चुनौती है जिसके लिए अकादमिक लोगों और बुद्धिजीवियों को आगे आना होगा।

6. प्रायोगिक और एकीकृत शिक्षा:- नई शिक्षा नीति में स्कूल स्तर पर अनुभवात्मक अधिगम को अपनाने की बात पर जोर दिया गया है। जिसमें मानक शिक्षा के साथ-साथ सीखने, कला और खेलने के साथ साथ एकीकृत शिक्षण भी सम्मिलित है। इस हेतु सीबीएसई ने दो दिशा निर्देश पुस्तकें भी प्रकाशित की है। इस प्रकार के अनुभवात्मक, प्रायोगिक पाठ्यक्रम हेतु सामग्री तैयार करना और इस प्रकार की शिक्षा के आयोजन के लिए शिक्षक को तैयार करना एक बड़ी चुनौती होगी। इसके लिए भी हमें आगे आना होगा।

7. माध्यमिक शिक्षा का व्यवसायीकरण और स्कूली शिक्षा के दौरान कौशल:- नई शिक्षानीति में भविष्य की चुनोतियों और आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए महत्वपूर्ण सुधारकारी उपाय के रूप में स्कूली शिक्षा के साथ कौशल विकास पर वल देने की व्यवस्था को देखा जाना चाहिए। इसके लिए स्थानीय स्तर की आवश्यकता और उपलब्धता का ठीक से अध्ययन और विचार करने के बाद जोड़े जा सकने वाले कौशलों व्यवसायों का निर्धारण कर सूची बनना, उसके पाठ्यक्रम, मूल्यांकन दक्षताएं आदि का निर्धारण करना भी एक चुनोती भरा कार्य है। इसके लिए भी विद्वानों का आवाहन है।
8. पाठ्यक्रम में स्थानीय सामग्री जोड़ना:- पाठ्य पुस्तकों में न्यूनतम 20- 30% स्थानीय सामग्री का समावेश होना चाहिए। इसके लिए राज्यों की एससीईआरटी की सहायता के लिए भी विद्वानों शिक्षाविदों को आगे आकर सामग्री चयन और निर्माण में सहयोग देना होगा।

9. पाठ्यक्रम में जीवन कौशल जीवन मूल्य के साथ नियमित विषयों का एकीकरण:- तय की गई दक्षताओं और सीखने के परिणामों के साथ हमें वैज्ञानिक स्वभाव/प्रकृति , साक्ष्य आधारित सोच , रचनात्मकता, नवीनता, सौंदर्यशास्त्र, कला की भावना, मौखिक और लिखित संचार, स्वास्थ्य, पोषण, शारीरिक फिटनेस, कल्याण, खेल, टीम भावना का विकास आदि गुणों के विकास के साथ ही साथ समस्या समाधान, तार्किक, सोच डिजिटल साक्षरता, कोडिंग, कंप्यूटेशन, नैतिक तर्क आदि का एकीकरण करना होगा। इन सबके लिए शिक्षकों को प्रशिक्षित करना, उन्हें कुशल बनाना आवश्यक है। यह भी एक बड़ी चुनौती है।

10. समग्र प्रगति कार्ड/ मूल्यांकन प्रणाली:- नई शिक्षा नीति में मूल्यांकन प्रणाली को अधिक व्यापक और समग्र करने की बात कही गई है। रचनात्मक और दक्षता आधारित मूल्यांकन किया जाएगा। इसके लिए शिक्षकों को प्रशिक्षित करना और पर्याप्त टूल्स का विकास करना भी आवश्यक है। बच्चे की प्रगति का 360 डिग्री बहुआयामी आकलन करने की विधियों इसके टूल्स आदि का विकास करना होगा। इसके लिए शिक्षकों को मानसिक रूप से तैयार करते हुए प्रशिक्षित करना भी चुनौती होगी। आकलन का परिणाम एक समग्र रिपोर्ट कार्ड में दिखे इस प्रकार का समग्र प्रगति कार्ड भी विकसित करना होगा। मूल शिक्षण उद्देश्यों और वास्तविक जीवन की स्थिति में सामंजस्य वाली आकलन की पद्धति आनी चाहिए। स्व मूल्यांकन, सहकर्मी मूल्यांकन, शिक्षक और अभिभावक मूल्यांकन का प्रतिनिधित्व करता हुआ प्रगति कार्ड को डिजाइन करना होगा। जो संज्ञानात्मक, सामाजिक-भावनात्मक, और मनोचिकित्सा के क्षेत्र की भी विशिष्टता को प्रतिबिंबित करे।

11. वैश्विक रुझानों के साथ जीना:- प्रौद्योगिकी के आधार पर वैश्विक रुझानों और नए उभरते क्षेत्रों के साथ हमारे शिक्षकों को भी चलने का अभ्यास करना होगा। प्रौद्योगिकी का एक उपकरण के रूप में उपयोग करने की कला को जानना होगा। मानवता और नैतिकता के साथ चलते हुए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, इंटरनेट ऑफ थिंग्स, क्वांटम कंप्यूटिंग,ब्लॉक चेन टेक्नोलॉजी, अप्लाइड आर्ट, डाटा साइंस, साइबर सिक्योरिटी, ऑगमेंटेड एंड वर्चुअल रियलिटी आदि तकनीकी पर आधारित नए उभरते क्षेत्रों में भी सीखने की प्रक्रिया में तेजी लाना होगा। (इन क्षेत्रों का विस्तार किसी अन्य आलेख में किया जाएगा)

12. शिक्षक शिक्षा में बदलाव :- शिक्षक शिक्षा ऐसा क्षेत्र है जिसमें सबसे कम बदलाव हुए हैं या यूं कहें कि आधुनिकीकरण में सबसे उपेक्षित शिक्षक शिक्षा ही रही है। नई शिक्षा नीति के साथ कदम मिलाते हुए शिक्षक शिक्षा में भी बड़े बदलावों की आवश्यकता होगी। इसलिए भी विद्वानों को आगे आना होगा। संपूर्ण शिक्षा नीति को धरातल पर उतारने वाला शिक्षक ही है। इसलिए शिक्षक शिक्षा को इसके अनुरूप करना अनिवार्य कदम होगा और यह भी एक बड़ी चुनौती होगी।

13. स्कूल गुणवत्ता मूल्यांकन के ढांचे को विकसित करना:- एक नियत समय में नई शिक्षा नीति लागू करने के लिए स्कूल गुणवत्ता मानक तय करना होगा। गुणवत्ता मानक के मूल्यांकन के तरीके भी विकसित करने होंगे। स्कूल मॉनिटरिंग के तरीके भी बदलने होंगे।

14. सभी स्तरों पर कार्यान्वयन की निगरानी करना:- स्कूल शिक्षा विभाग लगातार सुधार के लिए जिम्मेदार होगा। वही इसकी निगरानी भी करेगा जिसको स्वयं भी अद्यतन होने की आवश्यकता होगी। एससीईआरटी द्वारा पाठ्यक्रम, पाठ्यपुस्तकों आदि का एनसीईआरटी की परामर्श से तैयार किया जाएगा। इन सब की निगरानी का तंत्र भी हमें विकसित करना होगा।

15. छोटे समूहों में चर्चाएं:- इस नीति के अनुसार चलने के लिए समस्त हितधारकों को छोटे-छोटे समूह में बैठकर कार्यशालाएं करनी होगी। लगातार बैठकें करनी होगी। स्थान स्थान से सुझाव लेने होंगे और उन सब का समेकन करके ही दिशा तय करनी होगी।

16. प्रशासनिक इकाइयों से सामंजस्य:- प्रशासनिक इकाई के लिए भी यह दुष्कर कार्य होना है। समस्त प्रशासन अंग्रेजों के काल से औपनिवेशिक हित साधन की दृष्टि से निर्मित किया गया है। वही हमें विरासत में मिला है। अब नई शिक्षा नीति के प्रकाश में शिक्षा का भारतीय परिवेश कायम रखते हुए आधुनिक विश्व से कदम मिलाना है। इसलिए प्रशासनिक इकाइयों का भी ठीक ढंग से उपयोग कर उन्हें इसके बारे में ठीक से समझा कर ही आगे बढ़ा जा सकेगा।

17. मूल रूप कायम रखना:- क्योंकि नई शिक्षा नीति मैकाले और मार्क्स के मानस पुत्रों के नखदार पंजों से निकलकर भारत पुत्रों के साथ कदम मिलाने की दिशा में पहला कदम है। अतः मैकाले और मार्क्स के मानस पुत्रों के षड्यंत्रों से सावधान रहकर ठीक दिशा बनाए रखना भी एक बड़ी चुनौती होगी।

नई शिक्षा नीति में स्कूल शिक्षा, कॉलेज शिक्षा, प्रोढ़ शिक्षा आदि अनेक पहलू है। किंतु प्रस्तुत आलेख में मैंने कार्यान्वयन पक्ष की दृष्टि से स्कूल शिक्षा को ही ध्यान में रखकर अपने सीमित विचार रखे हैं । यह राष्ट्र के शिक्षाविदों, शिक्षकों, विद्वानों से नई शिक्षा नीति में कार्यान्वयन हेतु अधिकतम योगदान करने के लिए आवाहन करता है। मैंने प्रयास किया है कि यह आलेख विचारोत्तेजक बन पड़े। यदि ऐसा हुआ है तो यही आशा करते हुए सभी से आग्रह है कि आगे आए और भारत की भारतीयता कायम रखते हुए नए विश्व के साथ चलने को आतुर हमारी नई पीढ़ी के लिए प्रस्तुत नई शिक्षा नीति NEP20 के कार्यान्वयन में अपना अधिकतम योगदान करने की प्रतिज्ञा लें।

संपर्क
मनमोहन पुरोहित
मनुमहाराज
7023078881
फलोदी राजस्थान

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