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व्यंग्य
 

  • रेल यात्रा पर एक शोध

    रेल यात्रा पर एक शोध

    रेल विभाग के मंत्री कहते हैं कि भारतीय रेलें तेजी से प्रगति कर रही हैं। ठीक कहते हैं। रेलें हमेशा प्रगति करती हैं। वे बम्‍बई से प्रगति करती हुई दिल्‍ली तक चली जाती हैं और वहाँ से प्रगति करती हुई बम्‍बई तक आ जाती हैं।

  • समस्याएं कांग्रेस हो गईं और कांग्रेस समस्या हो गई

    समस्याएं कांग्रेस हो गईं और कांग्रेस समस्या हो गई

    कांग्रेस को राज करते करते तीस साल बीत गए । कुछ कहते हैं, तीन सौ साल बीत गए । गलत है ।सिर्फ तीस साल बीते । इन तीस सालों में कभी देश आगे बढ़ा , कभी कांग्रेस आगे बढ़ी ।

  • बोलो अच्छे दिन आ गये

    बोलो अच्छे दिन आ गये

    देश के उन लोगों को शर्म आनी चाहिए जो सरकार की आलोचना करते हैं और कहते हैं कि अच्छे दिन नहीं आये हैं. उनकी समझ को दाद तो देनी पड़ेगी मेमोरी जो शोर्ट है. इन लोगों का क्या लोंग मेमोरी तो रखते नहीं.

  • हरेक बात पर कहते हो घर छोड़ो

    घर के मुखिया ने कहा यह वक्त छोटी-छोटी बातों को दिमाग से सोचने का नहीं है. यह वक्त दिल से सोचने का समय है, क्योंकि छोटी-छोटी बातें ही आगे चलकर बड़ी हो जाती हैं.

  • शिकार करने का जन्मसिद्ध अधिकार

    एक बार जंगल राज्य में राजा का चुनाव होना था. अजी चुनाव क्या... बस खाना-पूर्ति तो करनी थी ताकि जंगल लोकतंत्र का भी ख्याल रखा जा सके.

  • भारत माता की जय ….

    भारत माता की जय ….

    जब सवाल देशभक्ति का हो तो कभी पीछे नहीं हटना चाहिए. हम जिस देश में रहें और उसके प्राचीन सामन्ती विचारों की कोई कदर न करें और उसके प्रति निष्ठा न रखें ये कहाँ की बात हुई.

  • पानी नहीं है तो क्या, कोका कोला पीजिये !

    पानी नहीं है तो क्या, कोका कोला पीजिये !

    देखो भाई बात एकदम साफ है, क्रिकेट ज्यादा जरूरी है या खेती-किसानी? जाहिर है क्रिकेट ही ज्यादा जरूरी है क्योंकि ये तो राष्ट्रीय महत्व का खेल बन चुका है जो हमारे देश की आन बान शान है.

  • पुल गिरा है कोई पहाड़ नहीं

    पुल गिरा है कोई पहाड़ नहीं

    पुल गिरा है कोई पहाड़ नहीं गिरा जो इतनी आफत कर रखी है. रोज ही तो दुर्घटनाएं होती हैं. अब सबका रोना रोने लगे तो हो गया देश का विकास.

  • घोड़े की टांग पे, जो मारा हथौड़ा

    बचपन में गाय पर निबन्ध लिखा था. दो बिल्ली के झगड़े में बन्दर का न्याय देखा था. गुलजार का लिखा गीत ‘काठी का घोड़ा, घोड़े की दुम पे जो मारा हथौड़ा’ भी मिलजुलकर खूब गाया था.

  • मूर्खता बड़ी कि होशियारीः एक संक्षिप्त शोध प्रबंध

    मूर्खता बड़ी कि होशियारीः एक संक्षिप्त शोध प्रबंध

    मूर्खता बहुत चिंतन नहीं माँगती। थोड़ा-सा कर लो, यही बहुत है। न भी करो तो चलता है। तो फिर मैं क्यों कर रहा हूँ? यों ही मूर्खतावश तो करने नहीं बैठ गया? नहीं साहब। हमसे बाकायदा कहा गया है कि करके दीजिए। इसीलिए कर रहे हैं। संपादक ने तो यहाँ तक कहा कि यह काम आपसे बेहतर कोई नहीं कर सकता और मूर्खता की बात चलते ही सबसे पहले आपका ही खयाल आया था।

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