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आसिफ़ और आसिफ़ा का द्वैत

दलील का उतना महत्व नहीं होता है, जितना कि नीयत का होता है.

आप किस नीयत से क्या दलील दे रहे हैं, यह चीज़ मायने रखती है.

मैंने तर्कों और कुतर्कों का बहुत अभ्यास किया है. मैं एक ही घटना के पक्ष में भी निबंध लिख सकता हूँ और विपक्ष में भी. मैं वाद विवाद स्पर्धा में तर्कों का मायाजाल रच सकता हूँ और फिर अपने ही विरुद्ध भी उतनी ही ताक़त से बोल सकता हूँ. कुछ कठिन नहीं है, बुद्धि का खेल है.

लेकिन अगर मैं दोनों बातें साबित कर सकता हूँ, इसके बावजूद एक ही को साबित करने पर तुल जाऊं तो अब यहां यह मेरी नीयत का इश्तेहार है.

नीयत नंगी होती है.

आप कुछ मत कीजिए, दो घटनाएं आमने सामने रख दीजिए और फिर उस पर प्रतिक्रिया देने वालों की नीयत परखिये. आपके हाथों में उनके ज़मीर की एक्सरे रिपोर्ट होगी, पसलियों को बेधती हुई!

मसलन यही कि मंदसौर मामले में यार लोग इसी अदा पर मर मिटे हैं कि क़ब्रिस्तान में जगह नहीं दी जाएगी!

जैसे कि किसी पोलिटिकल पार्टी द्वारा एक लाइन दी जाती है कि डिबेट में जाओ तो ये बोलकर आना, उसी तरह यहां से लेकर वहां तक हर लिबरल की वॉल पर एक ही दलील–

क़ब्रिस्तान में जगह नहीं दी जाएगी, ये ऐलान हमारे भाइयों ने किया है, देख लो.

एक दो कौड़ी की लफ़्फ़ाज़ी पर समूचा लिबरलिज़्म ऐसे झूल गया है, जैसे डूबते को तिनके का सहारा.

देखो, हमारे मुसलमान भाइयों ने कहा है कि क़ब्रिस्तान में जगह भी नहीं दी जाएगी, देख लो, देख लो, समूचा भारतीय उदारवाद इसी ताल पर नंगा होकर नाच रहा है!

जैसे कि हिंदू धर्म के लोग तो बलात्कारियों का विधिपूर्वक दाह संस्कार करने के लिए कंडे जलाकर बैठे रहते हैं, है ना?

यानी, आप क्या उम्मीद कर रहे थे कि रैपिस्ट्स का क़फ़न दफ़न बहुत शान से करने की घोषणा की जाएगी? जैसा कि कश्मीर में दहशतगर्दी के जनाज़े में दिखाई देता है. और जब वो नहीं हुआ तो बांछें खिल गईं?

अंधा क्या मांगे, दो आंख.

लिबरल क्या मांगे, मज़हब की आबरू.

यहां नंगी नीयत यह है कि जिसके साथ ज़ुल्म हुआ, उसके साथ दो पैसे की हमदर्दी नहीं, जिन्होंने ज़ुल्म किया, उनका बचाव करने की हवस ज़्यादा है. दलील के फटे हुए दामन से झांकने वाली यह निर्वसन नीयत है. छुपाए नहीं छुप रही.

आसिफ़ और आसिफ़ा का द्वैत है.

जब आसिफ़ा मज़लूम थी, तो एक पूरी क़ौम मज़लूम थी, और दूसरी पूरी क़ौम ज़ालिम!

जब आसिफ़ ज़ालिम था, तो एक पूरी क़ौम मासूम थी, दूसरी पूरी क़ौम बेसब्र!

तर्कणा गणिका होती है.

सुखशैया में बड़ी आसानी से करवट बदल लेती है. जैसा आपको रुचे.

किंतु जो नीयत उघड़कर सामने आ गई, उसको कैसे बचाओगे. दाई से पेट कैसे छुपाओगे?

कठुआ में ज़ुल्म की जगह देवस्थान थी, एक पार्टी विशेष की वहां साझा सरकार थी, एक क़ौम विशेष ज़ालिम थी, दूसरी फ़रियादी थी. हिंदुस्तान के माथे पर लांछन लग गया था. दुनिया धिक्कार कर उठी थी.

अभी? क़ब्रिस्तान में जगह भी नहीं दी जाएगी की झीनी चिलमन के पीछे समूचा भारतीय उदारवाद जा छिपा है, हमाम में नंगों की तरह!

मज़लूम से हमदर्दी नहीं, ज़ुल्म पर घिन नहीं, केवल एक फ़ौरी, फ़र्ज़ी, चलताऊ बयान की ओट.

राहत की एक लम्बी सांस.

क़ौम की बदनामी नहीं होनी चाहिए, तुम्हारे घर की बेटियां जीयें या मरें!

अगली बार देवीस्थान और हिंदुस्तान पर थूकने से पहले भी आप यह याद रखेंगे, लिबरल बंधुओ कि दूसरी क़ौम की भी बदनामी नहीं होनी चाहिए!

कठुआ के बाद जब हिंदू धर्म प्रतीकों पर कंडोम चढ़ाया जा रहा था, तब तो आपने यह कहने की ज़िम्मेदारी महसूस नहीं की थी ना कि देखिए इस घटना से हिंदू भी आक्रोशित और शर्मिंदा हैं, कृपया ऐसा करके उस कम्युनिटी के सेंटीमेंट्स को हर्ट करने की कोशिश ना कीजिए.

मजाल है जो एक लिबरल के मुंह से तब वैसी बात निकली हो, और आज वही क़ब्रिस्तान की ज़मीन नहीं देंगे पर निछावर हो गए हैं.

एक बात कहूं, लिबरल भाई?

तुम बेईमान हो!

तुम्हारी आत्मा अर्धसत्य की कालिमा से भरी हुई है.

तुम हिंदुस्तान की शर्म को बेचते हो. यही सच है.

दो अलग अलग घटनाओं पर, मज़लूम और ज़ालिम का नाम जानने के बाद, तुम्हारे भीतर से कैसी प्रतिक्रिया उभरकर सामने आती है, इसकी पड़ताल करोगे तो आईने का सामना नहीं कर पाओगे.

आईने में नंगी नीयत का मुज़ाहिरा जो हो जाएगा, दलीलों के दामन के पीछे जो रह रहकर छुप जाती है!

सुशोभित

पुनश्च– मंदसौर मामले में अपडेट यह है कि बलात्कार घात लगाकर किया गया था, पूरी योजना बनाई गई थी, ज़ुल्म के औज़ार जुटाए गए थे, बच्ची पर नज़र रखी गई थी. क्या यह फ़ौरी हवस थी? नहीं. क्या फ़िरौती मांगकर माल कमाने की मंशा थी? नहीं. क्या कोई पुरानी रंजिश थी? नहीं. अगर इस मामले के पीछे मज़हबी नफ़रत उभरकर सामने आई तो किस क़ब्रिस्तान में जाकर मुंह छुपाओगे, बेईमान लिब्रलो!

Sushobhit Singh Saktawat



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