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लॉक डाउन के बाद और भी बेहतर हो सकती है ज़िंदगी

लॉक डाउन को हम जीवन रक्षा की समझ का खुला विश्वविध्यालय भी मान सकते हैं।इससे पहले किसी महामारी से सारी दुनिया का इतना व्यापक लोक शिक्षण नहीं हुआ।लाक डाउन ने आज तक हम जिस तरह बिना चिन्ता के लापरवाह अंदाज में जीते रहने के आदि थे उसे इतिहास का हिस्सा बना दिया हैं।अब यदि हम खुद इतिहास नहीं बनना चाहते हैं तो हमें हर दिन हर पल स्वैच्छा से सतर्क जीवन जीने का नया इतिहास बनाना या लिखना होगा।लाक डाउन में हमें जीवनावश्यक कारणों से कुछ छूट मिली पर लाक डाउन खुलने पर सतर्कता में छूट का कोई सवाल ही नहीं हैं।अब हम सब अपने मन में यह गांठ बांध लें की अब हमें जरा भी लापरवाही नहीं करनी है और नहीं किसी पर दोष डालना है।हम सबने विपरित परिस्थिति में कठिनआपदा से अपनी समझ और क्षमता अनुसार मुकाबला किया है और आगे भी पूरी समझदारी से सामने आयी चुनौती से हिलमिल कर निपटेगें।

सतर्कता और चिन्ता दोनों में गुणात्मक अंतर होता हैं।चिन्तकों ने चिन्ता को चिता समान माना है,चिन्ता चित्त को भयभीत करती है।सतर्कता चित्त को सचेत करती हैं।अब आगे की दुनिया की जीवन शैली सतर्कता पर केन्द्रित सचेत जीवन के आधार पर हम सबको चलानी होगी।इस महामारी ने हमें पहला पाठ यह पढ़ाया है वायरस भले ही सूक्ष्म हो पर उसका विस्तार वैश्विक हैं।भविष्य में दुनिया में कभी भी किसी हिस्से में वायरस का प्रभाव दिखाई देता है तो तत्काल सारी दुनिया को हर हिस्से में सुरक्षा उपायों को सरकार और समाज के स्तर पर तत्काल कदम उठाने ही चाहिये इसमें देरी और भोगोलिक दूरी की गफलत में नहीं पड़ना चाहिये।क्योंकि आज की दुनिया परस्पर आवागमन के मामले में इतने निकट है जितनी पहले कभी नहीं थी।इसे समझने में सारी दुनिया की सरकारों और लोगो से भारी चूक हुई है इसे स्वीकारते हुए भविष्य के लिये सतर्कता बरतना होगी।

अभी तक बिमारियों को लेकर हमारी समझ व्यक्तिगत थी,कोई बीमार होता था तो घर,परिवार और पहचान वाले आगे बढ़कर सेवा को तत्पर रहते थे।इस महामारी ने सिखाया एक दूसरे से सुरक्षित दूरी बना के रखो।महामारी में सबसे पहले सब एक दूसरे से दूर रहो कोई पास न आये।जो पास आये हो वे भी एकान्तवास में चले जाय यह सुरक्षा उपाय सुझाया।ऐसी महामारी जिसमें मरीज,चिकित्सक,घर परिवार,समाज सरकार,व्यवस्था सबके हाव भाव एवं व्यवहार ही एकाएक बदल गये। जीवन का ऐसा विकट भाष्य समूची दुनिया ने इससे पहले नहीं पढ़ा या देखा वह भी घर बैठे।

अब हम सबकी हर पल परिक्षा हैं, हर क्षण सतर्क रहकर अपना और सारी दुनिया के लोगों के निरोगी और निरापद जीवन कायम रखने के लिये।आज की दुनिया बहुत भीड़ भरी है।पहली चुनौती है भीड़ से परहेज़।लाक डाउन के हटने पर भी स्वैच्छिक लाकडाउन खुद ही खुद पर लागू करें।जीवनावश्यक जरूरत के लिये पूरी सुरक्षा रखते हुए घर से बाहर जाकर काम पूरा होते ही घर-वापसी का ध्यान रखें।न तो हमें भीड़ का हिस्सा बनना है न ही अपनी उपस्थिति से भीड़ बढ़ानी है।

बड़े शहरों महानगरों के लोगों को यह सामान्य पूर्वानुमान करना जीवन की सुरक्षा की स्वैच्छिक अनिवार्य शर्त होगा की किस समय कहां जाना है और कहां जाने से बचना हैं।बड़े शहरों में आवागमन भोगोलिक परिस्थितिवश प्राय:वाहनों से ही करना होता है अत:शुरूआत में निजी वाहनों का ही प्रयोग ही ज्यादा होगा।अत:बाहर निकलने से पहले दूरी के हिसाब से भोजन पानी साथ में रखने का ध्यान रखना होगा।बहुत अनिवार्य स्थिति को छोड़ बाहर खाने से बचना होगा।

निजी और सार्वजनिक जीवन की मर्यादाओं की स्पष्ट समझ पूरी संवेदनशीलता के साथ बढ़ाते रहना होगा।व्यक्तिगत जीवन के प्रसंगों को अपने घर तक ही सीमित रखें,उन्हें भव्य आयोजन का स्वरूप देने के लोभ मोह से बचें।धार्मिक,सामाजिक,राजनैतिक भीड़ भरे रोज मर्रा के आयोजन,भजन ,सत्संग, नाटक मेले,पर्यटन साहित्य संगोष्ठी ,शिविर,गीत ग़ज़ल संगीतसंध्या,शोभायात्रा,जूलुस,प्रदर्शन,कथा,तकरीर,भाषणमाला जैसी सार्वजनिक गतिविधियों,समारोहों को संकट टलने तक स्थगित रखें और इस सम्बन्ध में संचार माध्यमों से सतर्कता रखने बाबद निवेदन करें।

रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में कम खाने और गम खाने का ध्यान रखें।कम खाने का अर्थ धर पर ही प्राय:खाना हैं पहले की तरह रास्ते चलते खाते रहने को स्वनियंत्रित करना है।गम खाने का मतलब बिना बात की किसी भी बहस या निजी तथा सार्वजनिक विवाद से बचना,जितना शांत और संयत रहेंगे उतना ही हम महामारी को रोकने में सतर्क और चौकस रह पावेगे।

लॉक डाउन की समाप्ति पर अपने निकटतम रिश्तेदारों,नये पुराने परिचितो,धनिष्ठ मित्रों,साथी सहयोगियों से सामान्य स्थिति होने तक लाक डाउन काल की तरह फोन,मोबाईल से ही हालचाल पूछे।सौजन्य भेंट को प्रत्यक्ष रूप से टालना ही सतर्कता की दृष्टि से उचित होगा।बिना बुलाये धनिष्टतम साथी,सहयोगी,परिचित या परिजन के यहां न पहुंचे और न ही उन्हें आमंत्रित कर दुविधा में डाले।आपतकालीन स्थिति में दोनों की सुरक्षा की मर्यादा का पालन करते हुए सामाजिक ,पारिवारीक सम्बन्धो का निर्वाह करने में मदद करना या करवाना चाहिए।प्रत्यक्ष मदद करना करवाना संभव न हो सकने की परिस्थिति में मोबाईल फोन से मार्गदर्शन तथा मदद पहूंचाने की तत्परता भी सामाजिक सतर्कता का हिस्सा है।

लॉक डाउन की समाप्ति पर हम सब को परस्पर आपसी व्यवहार में बोलचाल की भाषा के प्रयोग में अतिरिक्त सतर्कता रखनी होगी।हम सब एक असामान्य काल से गुजर रहे हैं।पूरी मनुष्यता को इस काल में जिस असामान्य,अनचाही,कठिन परिस्थिति से गुजरना पड़ा है वह समूची मनुष्यता के जीवन काल काअप्रिय काल है।ऐसी स्थिति में एक दूसरे के साथ संवेदनशीलता के साथ सकारात्मक व्यवहार हमारे जीवन को सामान्य बनाने में परस्पर मदद करेगा।विपरित परिस्थिति में ही हमारी हिम्मत और होंसले की परिक्षा होती है।विपरित एवं आकस्मिक परिस्थिति में हम सबने मिलजुल कर लाक डाउन का काल पूरा कर महामारी को रोकने का हौंसला जुटाया और अब पूरी सजगता,सतर्कता के साथ पूरी दुनिया के मनुष्य हिमिलकर संवेदनशीलता के साथ निरापद ज़िन्दगी के लक्ष्य को हासिल करने का हौंसला भी जुटायेंगे।यह हम सब का एक जुटता के साथ एक मात्र सामान्य लक्ष्य होना चाहिये, जिसे हम हिलमिल पूरा करेंगे।

अनिल त्रिवेदी- स्वतंत्र लेखक तथा अभिभाषक
त्रिवेदी परिसर,304/2 भोलाराम उस्ताद मार्ग,ग्राम पिपल्याराव ए बी रोड़ इन्दौर म प्र
Email aniltrivedi.advocate @gmail.com
Mob. 9329947486

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