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स्मृति तियानमेन चौक की और कम्युनिज्म का अंतर्विरोध

तियानमेन चौक नरसंहार की बरसी ( 4 जून) पर विशेष

1989 के चार जून को चीन की तियानमेन चौक में जो नरसंहार हुआ उसे आज 31 साल हो रहे हैं । चीन में लोकतंत्र की मांग करते हुए इस स्थान पर कुछ दिनों से हजारों की संख्या में लोग जिसमें अधिकतर छात्र थे, शांतिपूर्ण तरीके से विरोध प्रदर्शन कर रहे थे । चीन की कम्युनिस्ट सरकार ने इसे बल पूर्वक कुचलने का निर्णय किया । चार जुन की सुबह 4 बजे इन निहत्थे शांति से मार्च कर रहे छात्रों, बच्चों, बुजुर्गों के लिए चीनी सरकार ने बड़े बड़े मिलिट्री टैंक हथियारबंद जवानों को तियानमेन चौक पर खड़े कर दिया । लाल सेना के सौनिकों ने गोलीबारी शुरू कर दी । इस दौरान टैंक लोगों के ऊपर चढ़ाएं गए। देखते ही देखते प्रदर्शन के स्थान पर रक्त की नदी बहने लगी । तियानमेन चौक लाशों से पट गयी । क्योंकि चीन में पूर्ण रूप से सूचनाओं पर प्रतिबंध था इस कारण इसमें कितने लोगों की मौत हुई इसके बारे में शेष विश्व को सही जानकारी नहीं मिल सकी । चीन ने इन नरसंहार को छुपाने का प्रयास किया । चीन ने पहले माना कि इसमे 3 सौ लोगों की जान गई है । लेकिन ब्रिटिश पुरालेख के अनुसार इसमें कम से कम 10 हजार लोगों को मौत के घाट उतारा गया था । बाद में जब कुछ प्रत्यक्षदर्शी बाहर के देशों में शरण ले कर इस घटना के विवरण दिया तो शेष विश्व को इस रौंगटे खडे होने वाली घटना के बारे में विस्तार से जानकारी मिल सकी ।

इन छात्रों का कसूर क्या था ? केवल इतना ही कि वे शांतिपूर्वक तरीके से चीन की व्यवस्था पर सवाल उठा रहे थे । लेकिन चीन की वामपंथी सरकार इसे सहन नहीं कर सकी तथा इन निहत्थे आंदोलन को अत्यंत नृशंस तरीके से कुचल दिया।

कम्युनिजम शोषण मुक्त समाज की बातें करता है । शोषण का कोई समर्थन नहीं कर सकता । शोषण के खिलाफ परिवर्तन अपरिहार्य है । लेकिन मुख्य प्रश्न यह है कि परिवर्तन कैसे लाया जाए । भारत में भी साधु- संतों ने परिवर्तन की बात कही है । महात्मा बुद्ध ने भी परिवर्तन की बात कही है । महात्मा गांधी ने भी परिवर्तन की बातें कहीं है । भारत में परिवर्तन के लिए व्यक्ति को बदलने के प्रयास करने की बात पर जोर दिया गया है । लोगों से संवाद स्थापित कर उन्हें समझा कर व्यक्ति के मन, चरित्र उसके संस्कार, उसके चिंतन में परिवर्तन लाने के लिए प्रयास करना भारतीय तरीका है । भारत के मनीषियों ने परिवर्तन के लिए यही रास्ता बताया है ।

लेकिन कम्युनिज्म में परिवर्तन के लिए जो तरीका अपनाया जाता है वह अत्यंत अमानवीय व क्रुर है । कम्युनिज्म परिवर्तन के लिए अपने विरोधियों को मारने को ही सही मानता है । अगर सही ढंग से देखा जाए तो कम्युनिज्म में उनकी थ्योरी व इसके कार्यान्वयन का रास्ता को लेकर किसी प्रकार का विरोध को सहन नहीं करता ।

कम्युनिज्म में संवाद का कोई स्थान नहीं है । कम्युनिस्ट मानते हैं जो ‘वर्ग शत्रु’ हैं उनका सफाया अत्यंत जरुरी है । उन्हें हत्या करना अत्यंत आवश्यक है । इसके बिना ’क्रांति ’ असंभव है । इसके बिना परिवर्तन असंभव है ।

कम्युनिज्म की थ्योरी में शोषण मुक्त समाज की स्थापना व क्रांति के लिए तो वर्ग शत्रु को सफाया करना जरुरी माना जाता हैं ही लेकिन यदि उनके अपने लोग भी किसी प्रकार की असहमति व्यक्त करते हैं तो उनके साथ कैसा व्यवहार किया जाता है । चीन के तियानमेन चौक में कम्युनिस्टों ने इसका उत्तर भी दे दिया था । कुल मिला कर कहा जाए वर्ग शत्रु से लेकर उनके अपने लोग जो सामान्य असहमति भी व्यक्त करें तो उनकी हत्या को भी वे जायज मानते हैं । यही कारण है कि कम्युनिस्टों ने अब तक विश्व में करोडों लोगों को मौत के घाट उतारा है । तिआनमैन चौक घटना को थोडी प्रसिद्धि प्राप्त हुई अन्यथा कम्युनिस्ट शासित देशों में ऐसे सैकडों घटनाएं घटी है जो इतिहास गर्भ में है ।

वैसे यह कहा जा सकता है कि कम्युनिज्म ’शोषणमुक्त समाज’ के गठन करने की बात करती है लेकिन सबसे पहले वह उन लोगों को खाती है जिनके लिए वह शोषण मुक्त समाज बनाना चाहती है । यही कम्युनिजम का अंतर्विरोध है तथा यही कम्युनिज्म की त्रासदी है ।

1999 में ’द ब्लैक बूक आफ कम्युनिज्म : क्राइम, टेरर, रिप्रेशन’ नामक पुस्तक प्रकाशित हुई है । फ्रांस के पैरिस स्थित सुप्रसिद्ध राष्ट्रीय बैज्ञानिक शोध संस्थान से विद्वानों ने इस लिखा है । इस पुस्तक में लेखकों ने कम्युनिस्टों द्वारा विचारधारा के नाम पर पूरे विश्व में कितनी लोगो की नृशंसता के साथ हत्या की है उसका संपूर्ण विवरण है । इस पुस्तक के अनुसार कम्युनिस्टों में कम्युनिजम के नाम पर पूरे विश्व में अभी तक कम से दस करोड लोगों की हत्या कर चुके हैं । यह सब शोषण मुक्त समाज स्थापित करने के नाम पर हुई है।

मनुष्य की मूल प्रवृत्ति मानवता, दया करुणा आदि है । धीरे धीरे मनुष्य अपने में इन सत् प्रवृत्तियों को विकास कर सकता है । आध्यात्म मनुष्यों में इन मानवीय प्रवृत्तियों को बढाने का काम करता है । लेकिन कम्युनिजम मनुष्य इन मूल प्रवृत्तियों को समाप्त कर उनमें राक्षसी प्रवृत्ति का विकास करता है जिसमें विचारधारा के नाम पर उनसे असहमति रखने वाले नीरिह- निरपराध लोगों की हत्या को जायज ठहराया जाता है । यह वास्तव में कम्युनिजम का वह अमानवीय, राक्षसी रुप है जिसमें विचारधारा के नाम पर नीरिह- निरपराध लोगों की हत्या का सिलसिला लगातार जारी है। थ्यानमेन चौक उसका एक उदाहरण मात्र है । यदि भारत में कोई उनकी बर्बरताओं को देखना चाहता है तो वे दंडकारण्य के जंगलों मे भी इसे अभी भी देख सकते हैं ।

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