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वैदिक यज्ञ दर्शन

व्हाट्सप के मित्रों भाइयों और बहिनों के अनुरोध पर आज से हम वैदिक यज्ञ के लगभग सब मन्त्रों की व्याख्या आरम्भ करने जा रहे हैं| प्रभु से प्रार्थना है कि वह मेरे इस शुभ कार्य को पूर्णता की और बढाने में तथा उत्तम व्याख्या करने में सहयोग देते हुए मेरा मार्ग दर्शन भी करते रहें| इस से पूर्व ईश्वर स्तुति प्रार्थना उपासना के मन्त्रों की विशद् व्याख्या करके आपको भेंट कर चुका हूँ, जो आप लोगों को अति प्रिय लगी इस कारण ही आप सब सहयोगियों ने अग्निहोत्र की व्याक्या का भी आदेश दिया, जिसे मैं शिरोधार्य करता हुआ आज से आरम्भ करने जा रहा हूँ| इस क्रम में सब से पूर्व हमें आचमन और अंग स्पर्श के लिए जानना होगा| जो इस प्रकार है:-

१. आचमन
परमपिता परमात्मा ने हमारे कल्याण के लिए तथा कर्मभोग के लिए जिस सृष्टि की रचना की है, उसे हम पूरा दिन शोचादि तथा रोम रोम से निकल रही गंदगी से गन्दा करते हैं, इसे स्वच्छ रखना भी हमारा ही कर्तव्य है| इसलिए हम प्रतिदिन प्रात:काल उठ कर स्नानादि से निवृत हो कर दैनिक अग्निहौत्र की तैयारी आरम्भ कर देते हैं| कुछ स्थान पर लिपाई करके अथवा पोचा लगा कर , यहाँ हवन कुण्ड स्थापित करते हैं और आसन आदि लगाकर सब प्रकार से अग्निहोत्र के बर्तन तथा अन्य सामग्री जुटा कर सब प्रकार की तैयारी पूर्ण करते हैं और फिर यहाँ परिवार सहित बैठकर सर्वप्रथम हम आचमन तथा फिर अंग स्पर्श के मन्त्रों को बोलते हुए अपने अन्दर बाहर को शुद्ध करते हैं|

आचमन के लिए तीन बार अपने दायें हाथ की हथेली पर थोड़ा थोड़ा जल लेकर मन्त्र बोलने के पश्चात् इसे पी जाते हैं| इस के अन्तर हम बाएं हाथ की हथेली पर थोड़ा जल लेकर मन्त्र के अनुसार दिये हाथ के बीच की दो अँगुलियों को जल से छूकर शरीर के विभिनन अंगों पर लगाते हैं| अब मैं आचमन मन्त्रों पर विचार करता हूँ| यह सब कंठ के कफ को नष्ट करने, आलस्य को दूर करने तथा नई चेतना पैदा करने के लिए किया जाता है| दूसरे अर्थ में हम परमपिता से इन मन्त्रों के साथ यह प्रार्थना कर रहे होते हैं कि हे प्रभु! हमारे इन सब अंगों को पुष्ट करें, इन में ऊर्जा बनी रहे और यह अंग आजीवन हमारे लिए कार्यशील रहें| दूसरे हम यह भी प्रर्थाना करते हैं कि हमारी जीवन शक्ति बनी रहे, हम सदा पवित्रता और धर्मिकता के आगोश में ही रहें| आचमन मन्त्र इस प्रकार हैं:-
ओउम् अमृतोऽपस्तरणमसि स्वाहा ||१||
ओउम् अमृतापिधानमसि स्वाहा||२||
ओउम् सत्यं यश: श्रीर्मयि श्री: श्रयतां स्वाहा||३|| मानवग्रह्यसुत्र के अंतर्गत १.९.१५-१७||
ये तीनों मन्त्र मानवग्रह्यसुत्र के अंतर्गत १.९.१५-१७ से लिए गए हैं|

शब्दार्थ
अमृत=जल, उप-स्तरण=नीचे का बिछौना, अपि-धानं=ऊपर का ओढ़ना,असि=है| सत्यं=सत्य, यश: =यश, श्री:=आश्रयभूत, मयि= मुझ में, श्रयतां=धारण हो| स्वाहा=मैं मन, वचन और कर्म से यह स्व=अपने स्वरूप को समझकर, आह=कहता हूँ|
व्याख्या
हे प्रभु आप हमारे अमृत मयी बिछौना और ओढना हो
परमपित परमात्मा के साथ हम वह सब सम्बन्ध स्थापित कर सकते हैं, जो इस संसार में हमारे सम्बन्धियों तथा मित्रों आदि के रूप में हैं, यहाँ तक कि किसी अवसर पर हम उसे शत्रु के रूप में भी याद करते हैं| किन्तु सब से अधिक सुख देने वाली, सब से अधिक मार्ग दर्शन करने वाली और सब से अधिक प्रेम करने वाली केवल और केवल माता ही होती है| इसलिए हम इस मन्त्र में परमपिता परमात्मा को माता मान कर उसकी सेवा में खड़े हैं और वह सब कुछ मांगते हैं, जो एक माता अपने नन्हे से बालक को दिया करती है, बिना मांगे ही दिया करती है| माता का वह गोद ही नन्हे से बालक के लिए सब से महत्वपूर्ण स्थान होती है, जिस में बैठकर वह किलकारियाँ मारता है, कलोलें करता है, स्वयं को सुरक्षित मानते हुए अपने शत्रु को भी ललकारने लगता है तथा अनेक बार तो इस गोद में सौ भी जाता है| माता की गोद में रहते हुए बालक निश्चिन्त होता है और बिना किसी रोक-टोक के , बिना किसी भय –संकट के विश्राम करता है| इस के आधार पर ही हम इस मन्त्र में प्रभु को माता मानते हुए प्रार्थना करते हैं कि:-
ईश्वर हमारी माता है।

हे प्रभु! तुम हमारी माता हो| जिस प्रकार माता की गोद में हम लोग आमोद-प्रमोद करते हैं, आनंद लेते हैं और थक जाने पर सौ भी जाते हैं| इस प्रकार ही आपकी गोद हमें सदा उपलब्ध रहे| आपकी गोदी में रहते हुए हमें किसी प्रकार का कोई भय नहीं होता| हमे इस प्रकार अनुभव होता है कि आप हमारे बिछौने का काम कर रहे हो| इस में सौ कर हमें इस प्रकार का आभास होता है कि हम अमृत को पा गए हैं| कहा भी है कि यदि उत्तम बिस्तर मिल जाए तो यह अमृत के समान आनंद मिल गया है| इस अमृत रूपी बिस्तर को पाकर हमने मानो विश्व के सब सुखों को प्राप्त कर लिया है| इतना ही नहीं हे साधक! यहाँ यह भी स्मरण कर कि तु भी अमृत ही है| अपने शरीर रूपि वस्त्रों को समय समय पर बदलते हुए सत्व, तमस् और रजस् के चक्रों को पकड़कर ऊपर नीचे होता रहता है| इसलिए हे जीव तु अपने सब भ्रमों को दूर कर और अपने स्वरूप को समझ| वह प्रभु तो अमृतों का भी अमृत है| इस लिए उस के बिछौने रूपी गोद का आनंद उठा|

अमृतमयी ओढ़ना
जब बालक अपनी माता के अमृतमयी बिछौना अर्थात् गोदी को पाकर उसमें सौ जाता है तो इस बालक को मक्खी, मच्छर तथा गर्म हवाओं से बचाने के लिए माता उसके ऊपर अपना ओढ़ना ओढा कर उसके विश्राम के क्षणों को भी अमृत से भर देती है| इस प्रकार ही हम परमपिता के बालक है, उसकी अमृतमयी गोदी में विश्राम कर रहे हैं, वह प्रभु हमारा अमृतमयी बोछौना है तो वह हमारे लिए अमृतमयी ओढ़ने का काम भी करता है क्योंकि परमपिता परमात्मा सर्व व्यापक है| इस धरती पर हमें जो कुछ भी दिखाई दे रहा है, यह सब परमपित परमात्मा का दिया हुआ हमारे लिए बिछोना ही तो है| जब माता का का दुपट्टा इस में सौ रहे बालक पर आ जाता है तो बालक के सुखों का पारावार ही नहीं रहता| यह उसके लिए अमृत से भरपूर क्षण होते हैं| अत: जब हम परमात्मा की गोद में सौ रहे हैं तो वह आकाश परमात्मा के रूप में हमारे लिये ओढ़ने का काम करता है| यह अमृतमयी ओढ़ना होता है| इस के नीचे रहते हुए हम स्वर्ग के आनंद प्राप्त करते हैं| यह सब परम पिता परमात्मा तब ही देगा, जब हम उसका आशीर्वाद पाने के गुण अपने अन्दर धारण कर लेंगे|

सत्य को प्राप्त करें
जब हम परमपिता परमात्मा की अमृतमयी गोद में रहते हुए उसी के रूप रूपि ओढ़ने को ओढ़ रहे होते हैं तो हम ऐसा अनुभव करते हैं कि परमपिता के आशीर्वाद को पाकर हमें सब कुछ मिल गया है| इस गोदी में सोते हुए हम सत्य मार्ग के अनुगामी बन सत्य पथ पर ही सदा चलते रहने की प्रतिज्ञा लेते हैं| अत: प्रभु से हमें सत्य का मार्ग मिलता है|

यश को प्राप्त करें
जब हम सत्य को ग्रहन कर लेते हैं और सदा सत्य के मार्ग पर ही चलने लगते हैं तो हमें अमृत के रूप में सब प्रकार के सुखों की प्राप्ति होती है| अब हम दूसरे लोगों की सहायता के लिए भी अपना हाथ आगे बढाते हैं| जब हम निर्धन बे सहारा लोगों के लिए सहारा बनते हैं तो यह लोग हमारी चर्चा अपने दूर दूर रहने वाले मित्रों , सम्बन्धियों और परिजनों से करते हैं| इस प्रकार हमारा यश और कीर्ति दूर दूर तक चली जाती है| प्रभू की गोद में जाने का यह भी एक सुख है|

श्री को प्राप्त करें
श्री से अभिप्राय: सुखों से अथवा धन वैभव से लिया जा सकता है| जब प्रभू की गोद में रहने के हम अधिकारी बन जाते है तो हम सत्य पथ के अनुगामी बनते हैं| सत्य पथ पर चलने से हमारा यश और कीर्ति बढ़ जाती है| जब यश और कीर्ति बढ़ती है तो इस प्रकार के यशस्वी व्यक्ति से सब लोग मेल जोल रखना चाहते हैं तथा अपना सब प्रकार का व्यापार व्यवहार भी उसके साथ ही करना चाहते हैं| जब हमारे अनगिनत हितचिन्तक हो जाते हैं और व्यवसाय में हमें अनगिनत सहयोगी हो जाते हैं तो हमारे साधन भी बढ़ने लगते हैं| आय भी बढती है और इस बड़ी हुई आय से हम और भी अधिक परोपकार के कार्य कर सकते हैं| इस प्रकार हमें परमपिता परमात्मा रूपी बिछौने और ओढ़ने में विश्राम करते हुए पहले से भी कहीं अधिक अमृत प्राप्त होता है, जिसका आनंद लेते हुए हम स्वयं भी आनंदित होते हैं तथा दूसरों को भी करते हैं|

यश से हमारा अभिप्राय: विस्तार से होता है| अत: इस सब से हमारा कार्य, हमारा व्यवहार, हमारा संपर्क, हमारा कार्यक्षेत्र अत्यंत विस्तृत हो जाता है, इसकी छत्र छाया में रह्रते हुए अनेक लोगों को सहायता मिलती है, सुख के साधन मिलते हैं, भरण पौषण होता है| यह सब अमृत ही तो है, जिसे हमारा यह साधक निरंतर बाँट रहा है| इससे वह स्वयं भी अमृतमयी छाया प्राप्त कर रहा है और दूसरों को भी यह छाया पहुंचाने में सहायक हो रहा है| यह ही साधक की संपत्ति है, यह ही साधक के लिए अमृत है| इसलिए प्रत्येक प्रभु भक्त साधक को चाहिए कि वह इन सुखों रूपी अमृत को पाने के लिए अन्दर तक घुसता ही चला जावे और अन्यों को भी इस के लिए सहायता देता रहे|

डॉ. अशोक आर्य
पाकेट १/६१ रामप्रस्थ ग्रीन से.७ वैशाली
२०१०१२ गाजियाबाद उ.प्र. भारत
चलभाष ९३५४८४५४२६ E Mail [email protected]

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