Thursday, July 25, 2024
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भारत और बांग्लादेश के राष्ट्रगान के रचयिता गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर द्वारा रचित उनकी मूल बांग्ला कविता का हिंदी अनुवाद

हे मेरी कविता!
कौन से बाज़ार में तुम बिकना चाहोगी?
कौन-सा स्थान है तेरे लिए?
अहंकार के ऊंचे आकाश में उड़ते हुए,
जहां दिन -रात चलते रहते हैं सूक्ष्म तर्क -वितर्क,
ढूंढ -ढूंढ कर निकालते हैं गलतियां।
पत्र पर तैल या तैल पर पत्र,
क्या तुम उस स्थान पर बैठना चाहोगी?
कविता ने सुना और
अस्पष्ट स्वर में कहा-
नहीं! नहीं! नहीं!

हे मेरी कविता!किस हाथ में तुम रहना चाहोगी ?
और किस दिशा में तुम चलोगी?
ऊंचे -ऊंचे महलों में निवास करते हैं भाग्यवंत,
महोगनी के ताक़ पर सोने की जिल्द में मढ़ी,
पांच हज़ार ग्रन्थों को झाड़ -पोंछ कर रख देते हैं!
पर आज तक खोलकर जिन्हें पढ़ा नहीं गया!
ओ मेरी छंदमयी कविता!
क्या तुम वहां की यात्रा करना चाहोगी?
कविता ने सुना-
कान पर हाथ रख कर कहा-
नहीं! नहीं! नहीं!

हे मेरे गान!किस हाथ में होगा तेरा विकास?
कहां पाओगी तुम मान!
परीक्षा की तैयारी करता एक युवा छात्र,
पढ़ने में अन्यमनस्क।
खुली पड़ीं हैं सामने अपाठ्य पुस्तकें,
बड़ों के भय से उन्हें छिपा देता है,
और मिला देता है उन्हें पाठ्य-पुस्तकों के बीच।
हे चपल कविता! क्या तुम उस स्थान पर खेलना चाहोगी?
कविता ने ध्यान से सुना,
मौन -मूक होकर (स्तब्ध खड़ी) है,
जाऊं, जाऊं, जाऊं !

हे मेरी कविता!किस हाथ में तुम रहना चाहोगी?
कहां मिलेगी तुम्हें मुक्ति?
गृह-कार्य में तल्लीन एक गृहिणी,
जब भी पाती है समय,
तकिए के नीचे से निकाल कर पुस्तक,
पढ़ डालती है कुछ पन्ने,
पढ़ते -पढ़ते आंखों का काजल, सिंदूर
और बालों की सुगंधि
लग जाती है किताब के पन्नों पर।
पढ़ते हुए शिशुओं द्वारा खींचे जाने पर,
क्षीण हो गए हैं कुछ पत्र।
दिन भर के कार्य से क्लांत,
जाती है शय्या पर विश्राम करने,
उसके नि:श्वास से उड़ते पन्ने।
क्या तुम वहां रुकना चाहोगी?
(कविता लोभ से कांपने लगती है)

हे मेरी कविता! तुम किस हाथ में रहना चाहोगी?
कहां पाओगी तुम प्राण?
एक -दूसरे की आंखों में आंखें डाले,
एक तरुण युगल हाथों में हाथ लिए,
लोगों की आंखों से छिपते मिलते हैं।
पक्षियों की आवाज़ उन्हें सुनाती है गीत।
नदी सुनाती है गान।
फूलों और लताओं के पत्ते सुनाते हैं छंद !
उस स्थान पर निर्मल हंसी है।
विश्वात्मा की वंशी है।
शिराओं में स्फुरित होता हुआ
आनंद छलक रहा है अश्रुजल बनकर।
क्या तुम वहां रहना चाहोगी?
अचानक ख़ुश होकर मेरी कविता ने कहा-
वही है!वही है!वही है मेरा स्थान।
—–
( राजस्थान से सरकारी विद्यालयों से प्रतिनियुक्ति पर”विदेशों में भारतीय भाषा और संस्कृति का प्रचार-प्रसार व प्रतिनिधित्व “करने वाली कोटा – राजस्थान से डॉ.अपर्णा पाण्डेय प्रथम शिक्षिका हैं। )

प्रस्तुति ः डॉ. प्रभात कुमार सिंघल , कोटा

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