Tuesday, April 23, 2024
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Homeजियो तो ऐसे जियोबचपन के संगी-साथी, 'ए मैलोडियस लिरिकल जर्नी' के साथी बन गए

बचपन के संगी-साथी, ‘ए मैलोडियस लिरिकल जर्नी’ के साथी बन गए

(सृजनात्मकता अवसर की तलाश में रहती है, रचनाधर्मी का मन सृजन की प्यास से बैचेन रहता है और यही बैचेनी हमारी कला, संस्कृति और साहित्य को समृध्द कर देती है। कुछ मित्रों के संस्कारों, सृजन और सक्रियता ने कैसे एक अभिनव प्रयोग को जन्म दे दिया और आज ये प्रयोग साहित्य, संगीत और संस्कृति की एक नई धारा प्रवाहित कर रहा है। )

‘बचपन के संगी साथी जैसे परछाई हो गए’… अपने इस गीत को लिखे ज़माना हो गया। बचपन में बड़े होने की इच्छा सबको होती है, हमें भी थी और हम सब बड़े हो गए थे, बड़े-बड़े शहरों में चले गए थे, किसी को किसी का ठौर-ठिकाना पता नहीं था। हमें बचपन में लौटने की इच्छा हो रही थी लेकिन अपने उसी गीत की सच्चाई सामने थी कि ‘मृग छौने जैसी धमाचौकड़ी, दौड़-भाग ही बन गई/ कल-कल करते झरने की,एक नदी-सी बन गई’, पर फिर लॉक डाउन लगा, वैश्विक आपदा ने सारी दुनियावी दौड़-भाग को थमा दिया। उस दौर में सब अपने अतीत को खँगालने लगे, हम लोग भी और अविश्वसनीय तरीके से हम सब मिल गए।

हम बचपन के संगी-साथी अपने पुराने दिनों को याद करने लगे, हँसने-खिलखिलाने लगे। अविश्वसनीय से और भी अविश्वसनीय यह हुआ कि हमारी तिकड़ी ऐसी जम गई कि तीन साल से हम अपने यू-ट्यूब चैनल ‘ए मैलोडियस लिरिकल जर्नी (A Melodious Lyrical Journey)’ पर लगातार कीर्तिमान से कीर्तिमान स्थापित किए जा रहे हैं। हिंदी के एक-एक अक्षर को लेकर चलने वाली वर्णमाला श्रृंखला हो या समाज के गुणीजनों से बातचीत का सिलसिला, बाल मनोविज्ञान पर केंद्रित ‘मुनिया की दुनिया’ की कड़ियाँ हों या वृद्धाश्रम की जानकारी हो या मूक-बधिर बच्चों पर फ़िल्माया गीत रचनात्मकता के आयाम खुलते चले जा रहे थे। आधार उसका गीत ही हैं, कविताएँ ही, साहित्य ही, भाषा ही या कह लीजिए हमारी मित्रता ही, जो हमें इस मुकाम तक ले आई है।

साहित्य कर्म से पुणे में बस गई मैं स्वरांगी साने और मेरे हर गीत-कविता, लेखन के हर पक्ष को बैंगलुरु में बसे भुवन सरवटे ने संगीतबद्ध किया है और कैलिफ़ोर्निया में स्थायी अमित जोशी ने हर संकल्पना में साथ दिया है। अमित के नाम से ए, भुवन के संगीत की मैलोडी और स्वरांगी के लिरिक्स से नाम बना है यह चैनल, ‘ए मैलोडियस लिरिकल जर्नी’, जिसे आप देख-सुन सकते हैं यू-ट्यूब पर। नवंबर 2020 से हमारी यह यात्रा अनवरत रूप में जारी है। हमारा चैनल इतना हिट हो गया है कि यू ट्यूब चैनल ने हमें लिंक का नाम स्वयं देने का अधिकार दिया तो ‘ए मैलोडियस लिरिकल जर्नी के साथ जुड़ गया- अभिस्वर’, https://youtube.com/c/AMelodiousLyricalJourneyABHISWAR ऋग्वेद की ऋचा में अभिस्वर का अर्थ इंद्र की स्तुतियों के अर्थों को यथावत् स्वीकार करने/कराने और गाने वाले… इस चैनल से इस अर्थ में भी एकरूप है कि तीनों के नाम इसमें आ जाते हैं।

दरअसल लॉक डाउन लगते ही सब घरों में कैद हो गए लेकिन विंडोज़ के पटल खुले और लोग आपस में मिले, वैसे ही कभी इंदौर में रहते हम भूले-बिसरे मित्र भी एक-दूसरे से टकरा गए। यह जून 2020 की बात थी, आपस में पूछताछ हुई कौन-क्या करता है और बातों ही बातों में अक्टूबर 2020 में पहला गीत बनकर तैयार हो गया। पुणे की स्वरांगी साने से बैंगलुरु के भुवन सरवटे ने पूछा कि क्या वह अब भी लिखती है, जैसा स्कूली दिनों में लिखती थी। जवाब हाँ था। स्कूल में भुवन गायक के रूप में जाना जाता था, जो अब आईटी में नौकरी करने के साथ कुछ संगीत देने का मानस बनाने लगा था। दोनों ने तय किया कि कुछ अलग किया जाए और पहला गीत ‘बातें’…आ गया, जिसे लिखा था स्वरांगी ने और संगीत दिया भुवन ने। उसका क्या किया जाए तो कैलिफ़ोर्निया में रहने वाले अमित जोशी ने कहा उसे यू ट्यूब पर अपलोड किया जाए। तीनों कक्षा चौथी से आठवीं तक एक ही स्कूल में साथ पढ़े थे लेकिन उसके बाद कोई मुलाकात नहीं थी। यह सन् अस्सी-नब्बे की बात है, तब सोशल मीडिया तो दूर टेलिफ़ोन तक बहुत कम घरों में थे। उनका इतने सालों तक कोई संपर्क नहीं था, जो तीस सालों बाद अब बना था और 4 नवंबर 2020 को ‘बातें’.. अपलोड हो गया। पहला ही गीत हिट हो गया, लोगों को उसकी प्रस्तुति, धुन बहुत पसंद आई और कारवाँ बढ़ता चला गया…यात्रा अभी जारी है….

हम पुणे के वृद्धाश्रम ‘जाणीण’ की जानकारी देकर अपनी सामाजिक प्रतिबद्धता को दर्शा चुके हैं। हमारी ‘संवादी लहजा’ श्रृंखला समाज को नई दिशा देने वाले कार्यकताओं, महिला पत्रकार, हिंदी साधकों, लेखकों, संगीतकारों, के इंटरव्यू की है। शास्त्रीय संगीत-नृत्य पर आधारित रचना है, तो एक कविता पर कथक भी। एक अलग प्रयोग बाल मनोविज्ञान पर ‘मुनिया की दुनिया-एमकेडी’ है। एक कविता का अंग्रेज़ी भावानुवाद भी है, तो एक कोशिश अंग्रेज़ी में कविता लिखने की भी की है, जैसे दो ग़ज़लें भी लिखीं, अपलोड की हैं। केवल वाद्यों को लेकर एक अभिनव प्रयोग है ‘द रिद्म।’ मल्टीमीडिया का प्रयोग करते हुए हमने एनीमेशन को भी कविताओं से जोड़ा है। एक कविता महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी, मुंबई द्वारा स्वीकृत अनुदान से प्रकाशित स्वरांगी साने के काव्य संग्रह “वह हँसती बहुत है” की टाइटल कविता है। मित्रता को नया कलेवर देते हुए उसे पढ़ा अमित ने और संगीत तथा महाराष्ट्र के वारली डिज़ाइन से सजाया भुवन ने। भुवन की पत्नी सोनाली सरवटे ने वारली का कंसेप्ट दिया था।

सोनाली ही उनके पहले गीत की गायिका भी थी। जैसे वारली का कंसेप्ट था, मल्टीमीडिया से उसे सजाया था वैसे ही अनूठे तरीके से इस चैनल पर वर्णमाला कड़ियाँ अपलोड की जा रही हैं। जिसे भाषाविद विजय कुमार मल्होत्रा की वैबसाइट ‘लर्न हिंदी एडुटेंनमेंट डॉट इन’ पर भी लगातार प्रसारित किया जा रहा है। इसमें क्रमशः अ से श्र तक हर वर्ण होगा, उस वर्ण से जुड़े सैकड़ों शब्द किसी रूपक में बँधकर पहुँचेंगे ताकि देखने-सुनने वाले एक ही स्थान पर रोचक शैली में उस एक वर्ण से बनने वाले सैकड़ों शब्दों, मुहावरों को जान पाएँ। दुनियाभर के हज़ारों विश्वविद्यालयों में हिंदी पढ़ने वाले लाखों छात्र इसका निःशुल्क लाभ ले रहे हैं। अभी इस चैनल के लगभग पंद्रह हज़ार से अधिक सब्सक्राइबर्स हैं, जिनकी संख्या लगातार बढ़ रही है। हम तीनों अहिंदीभाषी क्षेत्र में रहते हैं लेकिन हिंदी से, हिंदी में, हिंदी के लिए काम कर रहे हैं। बचपन की दोस्ती को यू-ट्यूब चैनल का जामा पहनाया और बिना किसी आर्थिक लाभ के मलेशिया, सिंगापुर, यूएस से लोगों को जोड़ते हुए हमने यह यात्रा शुरू की।

इस चैनल पर गीत हैं, कविताएँ हैं और बाल मनोविज्ञान पर आधारित छोटी-छोटी कहानियाँ भी। ओरिजिनैलिटी ही हमारा विश्वास है मतलब गीत भी हमारे, संगीत भी हमारा। गीत ‘सायलेंट हैप्पीनेस’ मूक-बधिर बच्चों को लेकर अपलोड हुआ। हमें लगता है कि वे बोल नहीं सकते, सुन नहीं सकते लेकिन कहीं ऐसा तो नहीं कि हम ही उनकी बातें सुनने और उनसे बातें कर पाने के काबिल नहीं हैं। यह गीत जब अपलोड हुआ तो त्रिभाषा के अलग ही फ़ार्मूले को लेकर था, गीत हिंदी में गाया जा रहा था, अंग्रेज़ी में सबटाइटल्स आ रहे थे और बच्चे साइन लैंग्वेज में गीत को अभिनीत कर रहे थे। सद्गुरु साईबाबा सेवा ट्रस्ट द्वारा संचालित स्व. सी.आर. रंगनाथन् निवासी कर्ण बधिर विद्यालय एवं कॉलेज ऑफ़ स्पेशल ऐजुकेशन (एच.आई.) से मैं लगभग बीते दस सालों से जुड़ी हूँ।

इन सालों में इन बच्चों से मिलते हुए लगातार लगता रहा कि वे कितनी बातें करते हैं, उनमें आपस में कितनी अच्छी बॉन्डिंग है लेकिन हम उनकी भाषा साइन लैंग्वेज समझ नहीं पाते इसलिए उनसे जुड़ नहीं पाते और लगता रहा कि वे हमारे लिए आउटसाइडर्स नहीं, हम भी उनके लिए आउटसाइडर्स हैं। बस विचार कौंधा, कलम ने कागज़ों का पैहरन बनाया और उनकी खुशी को शब्द मिल गए। निवासी स्कूल-कॉलेज होने से महाराष्ट्र के दूर-दराज के गाँवों से बच्चे आते हैं, वे शुरू में अपने परिवार को याद करते हैं लेकिन धीरे-धीरे जैसे-जैसे वे सक्षम होने लगते हैं वे कह पड़ते है कि अब वे खुश हैं क्योंकि साथ हैं…As we are happy and together now… गीत बन गया तो संगीत से सजा दिया भुवन ने और अमित ने सुझाव दिया कि यदि इसे हम तीनों के यू-ट्यूब चैनल पर ला रहे हैं तो इसे मित्रता दिवस पर लाएँगे। पर समस्या यह थी कि उनकी भाषा हमारी भाषा से अलग है, उनकी साइन लैंग्वेज में सेतु का काम करती है अंग्रेज़ी तो वरिष्ठ संपादक भुवेंद्र त्यागी जी ने इसका भावानुवाद उपलब्ध करा दिया, अब बच्चों को लिखे को पढ़ना आसान हो गया, उनके शिक्षकों श्रद्धा शिंदे एवं प्रियंका जोशी ने उसे और गहराई से समझाया और बच्चों ने खुद कोरियोग्राफ़ कर कमाल कर दिया। उन्हें सुनाई नहीं देता तो वहाँ के प्रोफ़ेसर ऋषिकेश रायकर ने स्पीकर पर उन्हें सुनवाया ताकि वे अपने श्रवणयंत्र की मदद से थोड़ी-बहुत लय समझ पाएँ। एक बार, दो बार, बार-बार री-टेक करने पर भी बच्चों का उत्साह कम न हुआ, न वे थके, न रुके और दोस्ती निभाने का यह गीत उन दोस्तों ने हम तीन दोस्तों (मैं, भुवन और अमित) के सामने ला दिया, जब भी उनसे मिलने गए तो वे बच्चे हमें भी अपनी दोस्ती में शामिल करते हुए हँसकर मिले, दिल से मिले। युवा तकनीकी विद् बालेंदु शर्मा दाधीच हमारे यू ट्यूब चैनल पर हमारी ‘संवादी लहजा’ श्रृंखला के तहत इंटरव्यू देने के लिए ख़ास दिल्ली से शिरकत लाए तो हम उन्हें इस महाविद्यालय में भी ले गए ताकि बच्चे देख सकें कि दुनिया कितनी बड़ी और कितनी संभावनाओं से भरी है।

ख़ुशी को सुना नहीं, देखा जा सकता है, दोस्तों की आँखों में और इसे सच साबित कर दिया पुणे के स्पेशल ऐजुकेशन कॉलेज के ये छात्र अपने दोस्तों के साथ, यही तो है दोस्ती की सौगात। हम समाज के हर तबके को साहित्य-संस्कृति से जोड़ रहे हैं, उनसे बात कर रहे हैं। विभिन्न माध्यमों को अपनाते हुए लाइव कार्यक्रमों से लेकर वीडियो शूट तक, दूरस्थ स्थानों (रिमोट एरिया) से निकटस्थ स्थानों तक संपर्क स्थापित कर रहे हैं। यू-ट्यूब चैनल पर हमारे पहले गीत का शीर्षक था ‘बातें’….तब से अब तक हम लगातार संवाद स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं।

(लेखिका पत्रकार हैं और सामाजिक व समसामयिक विषयों पर लेखन करती हैं)

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