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राज्यपाल पद की गरिमा कैसे 

हाल के महीनों में राज्यपाल( संवैधानिक प्रमुख /राज्य प्रमुख) और सरकार के प्रमुख (शासक अध्यक्ष /कार्यपालिका प्रमुख )के संवैधानिक अधिकारों को लेकर तकरार (रार) बड़ गया है, चुनाव आयोग में निर्वाचन आयुक्त, महालेखा परीक्षक और राज्यपाल के पदों ,न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया ‘ कॉलेजियम ‘ को लेकर मीडिया ट्रायल ,समाचार पत्रों एवं आम व्यक्तियों के बीच बहस का विषय बना हुआ है।

प्रस्तावना व शपथ ( तीसरी अनुसूची ) तक संविधान के मूल्यों व जनता के विश्वास को लेकर इन संवैधानिक प्राधिकारियों के आस्था और विश्वास जनता के प्रति होती है।राजननिक व्यवस्था में संवैधानिक प्रार्धिकरियों केराजनीतिक आभार जनता के कल्याण की है ।मुख्यमंत्री और राज्यपाल के पद का राजनीतिक और संवैधानिक टकराहट मजाक का विषय बनता जा रहा है ।

 भारत के संविधान के अनुच्छेद 153 में राज्य के लिए राज्यपाल का प्रावधान किया गया है; एवं इसी के अनुच्छेद 154 में राज्यपाल की कार्यकारी शक्तियों का उल्लेख करता है इसके अनुसार “राज्य की कार्यपालिका शक्ति राज्यपाल में निहित होगी और वह इस शक्ति का प्रयोग सीधे या अपने अधीनस्थ अधिकारियों के माध्यम से प्रयोग करेगा ”

इसी तरह अनुच्छेद 163 में कहा गया है कि राज्यपाल की सहायता और सलाह के लिए मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में एक मंत्री परिषद होगी ,जो राज्यपाल के कार्यों में सहयोग करेगी ।कार्यपालिका का संबंध लोकतांत्रिक राजनीति के लिए प्राणवायु है।लोकतांत्रिक राजनीतिक व्यवस्था जनहित एवं जनकल्याण के लिए होती है ,जब उनमें वैचारिक एकता व मानसिक मनोमालिन्य हो जाए तो इसका प्रभाव लोकतांत्रिक मूल्यों पर पड़ता है ,जिससे राज्य का विकास पीछे छूट जाता है। भारत को वैश्विक नेतृत्व प्रदान करके संवैधानिक नेतृत्व को एकता का भाव देना होगा ,जिससे भारत की जनता को सामाजिक ,आर्थिक, राजनीतिक (समानता स्वतंत्रता एवं न्याय )प्राप्त हो सके ।शमशेर सिंह बनाम पंजाब सरकार के मामले में 1974 में न्यायपालिका ने राज्यपाल की संवैधानिक स्थिति पर निर्देश दिया था कि “राज्यपाल को दिए गए विवेक का अर्थ है कि संवैधानिक या औपचारिक प्रमुख के रूप में राज्य की शक्ति उसके पास निहित है;परंतु अनुच्छेद 356 के प्रयोग होने पर ही केवल राज्यपाल अपनी शक्तियों का उपयोग मंत्रिपरिषद की सलाह के विरुद्ध कर सकता है ;अन्यथा अन्य मामलों में जहां अपनी शक्तियों( विवेकाधीन शक्तियों )का इस्तेमाल करें उसे मंत्री परिषद के सामंजस्य में रहना अनिवार्य है।”

इस संबंध में संविधान की संविधान सभा में राज्यपाल की शक्तियों को लेकर बहस हुआ था ।इस संबंध में बी.आर अंबेडकर ने कहा था कि” यह सदन जानता है कि राज्यपाल के पास ऐसा कोई कार्य नहीं है,जिसे उसे अपने विवेक या व्यक्तिगत राय से करने की आवश्यकता है ” ।

 वर्तमान लोकतांत्रिक व्यवस्था में क्षेत्रीय दलों के उभार के कारण, केंद्र और राज्य सरकारों के स्तर पर विपरीत विचारधारा की सरकार होने पर राज्यपाल की स्थिति विवादास्पद होती जा रही है। राज्यपाल केंद्र और राज्य के बीच के संबंध का संवैधानिक सेतु है, जो राज्य के कानून एवं व्यवस्था, संविधान के प्रावधानों के अनुसार शासन की स्थिति को केंद्र सरकार को प्रतिवेदन करता है । लोकतांत्रिक शासन प्रणाली व संसदीय शासन प्रणाली में राज्यपाल का पद गरिमामई है ,जिसके कारण यह अपेक्षा की जाती है कि राज्यपाल संविधान के दायरे में रहकर देश (राज्य) के कल्याण एवं जनता के भलाई की दिशा में काम करें।

(लेखक राजनीतिक विश्लेषक हैं) 

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