Friday, April 19, 2024
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इंटरनेट की पहुंच बढ़ाने के लिए क्षेत्रीय भाषा जरूरी

वर्ष 2023 तक देश में 66.5 करोड़ भारतीय अथवा ग्रामीण क्षेत्रों की लगभग 45 प्रतिशत आबादी इंटरनेट की पहुंच से दूर थी। आईएएमएआई और कैंटार की संयुक्त रिपोर्ट में गांवों की इंटरनेट से दूरी के कई कारण उभर कर सामने आए हैं। इनमें इंटरनेट की प्रक्रिया समझने में दिक्कत, इसके फायदों के बारे में जागरूकता की कमी और उपयोग के प्रति रूचि नहीं होना आदि ऐसे कारण हैं जो बहुत ही आम हैं।

मार्केटिंग डाटा और विश्लेषण क्षेत्र की कंपनी कैंटार में समूह निदेशक (बी2बी और प्रौद्योगिकी विशेषज्ञ बिजनेस, इंसाइट्स साउथ एशिया) अर्णब दत्ता ने कहा,’ग्रामीण क्षेत्रों में इंग्लिश की जानकारी बहुत कम लोगों को होती है। हमारे पास सामग्री हिंदी में होती है जबकि इंटरनेट पर अंग्रेजी हावी रहती है। इस समस्या से निपटने के लिए अधिक से अधिक भारतीय भाषाओं को इंटरनेट के साथ जोड़ना होगा। साथ आवाज आधारित कमांड को बढ़ावा देना होगा।’

रिपोर्ट यह भी कहती है कि हाल के दिनों में भारतीय भाषाओं में इंटरनेट का इस्तेमाल बढ़ा है। रिपोर्ट के अनुसार लगभग 57 प्रतिशत लोग इंटरनेट को भारतीय भाषाओं में ही चलाना पसंद करते हैं और इस चार्ट में भी हिंदी सबसे ऊपर है।

परंतु जब बारी यह समझने की आती है कि इंटरनेट पर भारतीय भाषा में क्या देखा जा रहा है तो उस समय क्षेत्रीय भाषाओं में सामग्री के मुद्दे को हल करने की जरूरत महसूस होती है। इंटरनेट पर क्षेत्रीय भाषाओं में सबसे अधिक वीडियो देखे जाते हैं। इसके बाद सबसे अधिक गतिविधियां संगीत, संचार, सोशल नेटवर्किंग, ऑनलाइन शॉपिंग और सबसे अंत में ऑनलाइन सामग्री खोजने से संबंधित होती हैं।

भारतीय भाषाओं में सबसे अधिक वाइस सर्च टूल का इस्तेमाल करते हैं यानी बोलकर चीजें खोजते हैं। इसमें खास बात यह है कि इस तरह खोजी गई सामग्री में सबसे अधिक सामने वीडियो आते हैं और वेबसाइट या लिखित सामग्री बहुत कम दिखती है।

विशेषज्ञ की राय में भारतीय भाषाओं में सामग्री खोजने में सबसे बड़ी बाधा यूनिफॉर्म रिसोर्स लोकेटर यानी किसी भी वेबसाइट के यूआरएल का अंग्रेजी में होना है। तथ्य यह है कि आईसीएएनएन द्वारा 10 से अधिक भारतीय भाषाओं में यूआरएल तैयार करने के बावजूद यह समस्या अभी बनी हुई है।

नवाना डॉट एआई के सह-संस्थापक राउल नानावटी कहते हैं कि भारतीय भाषाओं और बोलियों का परिदृश्य डिजिटल दुनिया के सामने चुनौती के रूप में खड़ा है। उनका मानना है कि आवाज आधारित टूल के जरिए 40 करोड़ लोग इंटरनेट से जुड़ेंगे। हाल ही में दूसरी पीढ़ी का बहुभाषीय वायस एआई मॉडल ‘बोधि’ जारी करने वाली नवाना डॉट एआई 11 भारतीय भाषाओं में इसकी सेवा दे रही है। उज्जीवन स्मॉल फाइनैंस बैंक के लिए ‘हैलो उज्जीवन ऐप’ बनाने वाली इस कंपनी ने पाया कि इसके मॉडल से 725,000 डाउनलोड किए गए।

हर महीने हैलो उज्जीवन ऐप का इस्तेमाल कर लगभग 50,000 ऋण का भुगतान किया जा रहा है और 40,000 नए ग्राहक नए ऋण के लिए आवेदन कर रहे हैं। यही नहीं, इस ऐप के जरिए प्रतिमाह 30,000 फंड ट्रांसफर या लेनदेन किए जा रहे हैं। उपभोक्ता हर महीने लगभग 100,000 से अधिक बार स्थानीय भाषा में आवाज पहचानने वाले टूल का इस्तेमाल कर रहे हैं।

कंपनी के एक और अधिकारी ने बताया कि इंटरनेट पर भाषायी अंतर को पाटने के लिए आर्टिफिशल इंटेलीजेंस (एआई) का इस्तेमाल किया जा सकता है, जो आसानी से अंग्रेजी सामग्री का भारतीय भाषाओं में अनुवाद कर सकता है।

उन्होंने कहा, ‘हमें स्वदेशी स्तर पर विकसित भाषिनी प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल कर इंटरनेट सेवाओं का प्रचार करना चाहिए। इससे भारतीय भाषाओं में इंटरनेट का उपयोग बढ़ेगा, जिससे डिजिटलीकरण एजेंडे को आगे बढ़ाने में मदद मिलेगी। भविष्य में अपने फायदे के लिए इस प्लेटफॉर्म और एआई का इस्तेमाल बहुत ही आवश्यक हो जाएगा।’

‘भाषिनी’ एआई द्वारा भाषा अनुवाद प्रणाली पर काम करता है, जो विभिन्न भारतीय भाषाओं में बोलकर सर्च करने वालों के लिए भाषायी बंधन तोड़कर चीजें आसान बनाता है। यह प्लेटफॉर्म एंड्रायड और आईओएस ऐप के जरिए काम करता है।

इसी प्रकार ग्रामीण क्षेत्रों में डिजिटलीकरण एजेंडे के गति पकड़ने के साथ लोगों में इंटरनेट इस्तेमाल के फायदों के बारे में जागरूकता बढ़ाना भी बहुत महत्त्वपूर्ण होगा।

दत्ता कहते हैं कि ग्रामीण क्षेत्रों में बहुत सारे उपभोक्ता इंटरनेट चलाने के लिए एक ही स्मार्टफोन का इस्तेमाल करते हैं। उन्होंने यह भी कहा, ‘पिछले दो-तीन वर्षों में भारतीय स्मार्टफोन बाजार में बिक्री धीमी पड़ गई है। लोग दूसरों का फोन लेकर इंटरनेट चला लेते हैं। ऐसे में यदि फोन उपभोक्ता का नहीं है तो फिर इंटरनेट चलाना मुश्किल हो जाता है।’

वर्ष 2023 में रिपोर्ट में सामने आया कि ग्रामीण क्षेत्रों में 21 प्रतिशत लोगों ने दूसरे व्यक्ति का फोन लेकर इंटरनेट का इस्तेमाल किया। इसे पहले 2022 में यह संख्या 13 प्रतिशत और 2021 में 11 प्रतिशत ही थी। शहरी क्षेत्रों में 14 प्रतिशत लोगों ने दूसरे के फोन पर इंटरनेट उपयोग किया।

वर्ष 2022 में यह संख्या 10 प्रतिशत और 2021 में 5 प्रतिशत थी। नए उपभोक्ताओं के लिए इंटरनेट इस्तेमाल का मुद्दा हल करना बहुत महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि आईएएमएआई-कैंटार रिपोर्ट में कहा गया है कि ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट की पहुंच कम होने का बड़ा कारण इसके इस्तेमाल और इसकी प्रक्रिया समझने में परेशानी होना है।

(साथ में अजिंक्या कवाले)

साभार- hindi.business-standard.com से

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