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मेरा मौन जो कभी मुखर हो न हो सका

मेरा मौन जो कभी मुखर हो न हो सका,
मन की गहराइयों से जिव्हा पर आ न सका,
वो आज मुखर हो उठा है,

बीज के अंकुरण से पूर्व ही संहार से,
आहत मन नैनों के बांध तोड़ चला है,
कोमल कलियों के मसले जाने पर,
उद्वेलित हो चीत्कार कर रहा है,

नहीं हो अब यह कोमल कली का संहार,
जननी हूं मैं यह जान ले संसार,
ना रहेगी स्त्री तो,
क्या होगा नवजीवन संचार,

मेरा मौन जो कभी मुखर हो न हो सका,
मन की गहराइयों से जिव्हा पर आ न सका,
वो आज मुखर हो उठा है,

समाज के कायदों की जंजीरों से,
मुक्ति की पुकार कर रहा है,
स्त्री होने की कथित मर्यादा,
त्यागने को मन मचल रहा है,

बंधनों की बेड़ियां तोड़ने को मन बेकरार है,
प्यार की रेशमी डोर से बंधने को बेताब है,
बंधन तो हो प्यार का गठबंधन जैसे,
जिसमें बंधने मन मचल मचल जाए,

मेरा मौन जो कभी मुखर हो न हो सका,
मन की गहराइयों से जिव्हा पर आ न सका,
वो आज मुखर हो उठा है,

आओ आज कुछ रस्मों को तोड़ दें,
स्त्री भावना से जो खिलवाड़ करें,
उन्मुक्त होते पंखों को जो काट दे,
उन रिवाजों की आज हम होली जला दें,

कुछ रवायतें आज ऐसी बनाएं,
जो स्त्री के हौसलों को परवाज दें,
प्रेम और परवाह की रस्मों से सींचे,
जिससे उसे मिल सके नील गगन आकाश है,

आओ आज इस मौन को मुखर बना दें,
स्त्री पुरुष समानता को एक नई पहचान दें,
जीवन पथ पर साथ दोनो चलें,
न कोई आगे चले न कोई पीछे रहे,

आओ आज इस मौन को मुखर बना दें….

( श्रुतिका राजावत बैंक नोट प्रेस देवास में वरिष्ठ लेखा अधिकारी के पद पर कार्यरत हैं)

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