Friday, July 19, 2024
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देवताओँ के वैद्य – अश्विनी कुमार

देवों के वैद्य अश्विनी कुमारों ने च्यवन (वृद्ध) को युवा बना दिया। अश्विनी कुमारों का नाम नासत्यौ भी है। निरुक्तकार महर्षि यास्क लिखते हैं-
“नासिकाप्रभवौ बभूवतुरिति वा।” -निरु० ६/१३
अर्थात् जो नासिका से पैदा हुए हैं। प्राण और अपान की उत्पत्ति नासिका से है। ये प्राण और अपान देवों के चिकित्सक हैं। इन प्राण और अपान को वेदों में नासत्यौ और अश्विनी कहा है। देवों का अर्थ इन्द्रिय है।
प्रत्यौहतामश्विना मृत्युमस्मद्देवानामग्ने भिषजा शचीभि:।। -अथर्व० ७/५३/१
अर्थात्- हे (अग्ने) हे परमात्मन् (देवानां) इन्द्रियों के (भिषजा) चिकित्सक (अश्विना) प्राण और अपान (अस्मत्) हमसे (मृत्युम्) मौत को (शचीभि:) अपनी क्रियाओं से (प्रत्यौहताम्) दूर कर देवें।

अश्विनी कुमारों के बारे में सायण ने लिखा है-
च्यवानं च्यवनमृषिं जीर्णं पुनः युवानं यौवनोपेतं चक्रथु: कृतवन्तौ।। -ऋ० १/११८/६ (सायण भाष्य)
अर्थात्- अश्विनी कुमारों ने युवावस्था से ढलते हुए वृद्ध च्यवन को फिर से युवा बना दिया।
वे अश्विनी कुमार प्राण और अपान ही हैं क्योंकि वेद में स्पष्ट लिखा है कि-
सं क्रामतं मा जहीतं शरीरं प्राणापानौ मे सयुजाविह स्ताम्। -अथर्व० ७/५३/२
अर्थात्- हे (प्राणापानौ) प्राण और अपान (सं क्रामतम्) शरीर मे संचार करते रहो (शरीरम्) शरीर को (मा) मत (जहीतम्) छोड़ो (मे) मेरे (इह) इस शरीर में (सयुजौ) सदा साथ रहने वाले अश्विनी अर्थात् प्राण और अपान (स्ताम्) रहें।

इस प्रकार वेद में स्पष्ट रूप से प्राण और अपान को अश्विनी कहा है क्योंकि प्राण और अपान कभी पृथक नहीं होते अतः अश्विनी कुमारों की जोड़ी प्रसिद्ध हो गई है। प्राणायाम मनुष्य के शारीरिक और आध्यात्मिक विकास से जुड़ा हुआ है। वेदों ने स्पष्ट घोषणा की है कि-
सप्तर्षिभ्य एनं परि ददामि त एनं स्वस्ति जरसे वहन्तु।। -अथर्व- ७/५३/४
अर्थात्- मैं सप्तर्षिभ्य:- सात शीर्षण्य प्राणों के लिए (दो कान, दो नासिका-छिद्र, दो आंखें व मुख) एनं परिददामि- इसे देता हूं। ते- वे एनम्- इस पुरुष को स्वस्ति- कल्याणपूर्वक जरसे- पूर्ण जरावस्था वहन्तु- प्राप्त कराएं।

वेदों ने यहां तक कह दिया है कि प्राणायाम के द्वारा राजयक्ष्मा रोग तक नष्ट हो जाता है और जीवन लाभ होता है। यथा-
आ ते प्राणं सुवा मसि परा यक्ष्मं सुवामि ते। -अथर्व० ७/५३/६
अर्थात्- (ते प्राणम्) तेरे जीवन को (आसुवामसि) प्रेरित करते हैं। अर्थात् देते हैं और (ते यक्ष्मम्) तेरे क्षय रोग को (परा सुवामि) दूर करते हैं।
प्र विशतं प्राणापानावनङ्वाहाविव व्रजम्।
अयं जरिम्ण: शेवधिररिष्ट इह वर्धताम्।। -अथर्व० ७/५३/५
अर्थात्- (व्रजम्) गोशाला में (अवङ्वाहौ इव) जैसे बैल वेग से घुसते हैं वैसे (प्राणापानौ) प्राण और अपान (प्र विशतम्) शरीर में प्रवेश करें (अयम्) यह (जरिम्ण:) पूर्ण आयु का (शेवधि:) खजाना है (इह) हमारे शरीर में (अरिष्ट:) न घटता हुआ (वर्धताम्) बढ़े।

बैल जब बाहर से घूम कर आते हैं तब अपने निवास स्थान गौशाला में आते ही एक साथ वेग से घुसते हैं। इसी प्रकार जब प्राण को रोका जावेगा तब वेग से अन्दर घुसेगा जिससे सब फेफड़े के कण-कण में घुस जायेगा। यह प्राणायाम का प्रकार भी वेद ने एक उपमा के द्वारा बताया है। प्राणायाम का अभ्यास मनुष्य की दीर्घायु के लिए अतिआवश्यक है। इसकी पुष्टि अथर्ववेद का यह मन्त्र करता है-
“जो तत्त्व-(ब्रह्मज्ञान)-प्राप्ति के जाननेवाले का शिष्य होता है वह प्राण का निरोध (प्राणायाम) करता है। यदि प्राणनिरोधक प्राणायाम नहीं करता है, तो सारी आयु की हानि उठाता है। यदि आयु की हानि नहीं उठाता, तो प्राण इसे बुढ़ापे से पूर्व छोड़ जाता है।” (अथर्व० ११/३/५४,५५,५६)

इस सन्दर्भ से सिद्ध हुआ कि- प्राणायाम न करने से मनुष्य की हानि होती है। इतना ही नहीं बल्कि प्राणायाम के बिना शरीर में वीर्य-रक्षा भी सम्भव नहीं है क्योंकि प्राण के स्थायित्व से वीर्य में स्थायित्व आता है; अतः प्राणयाम और वीर्य का घनिष्ठ सम्बन्ध है। तैत्तिरीयसंहिता ने वीर्य को धारण करना योगयज्ञ का यजन माना है-
सोमं यजति रेत एव तद् दधाति। -तै० सं० २/६/१०/३

वीर्य जीवन का आधार है। इस जीवनाधार का आधार प्राणायाम है। देखो ऋग्वेद ने इसे कितने सुन्दर और मार्मिक शब्दों में प्रकट किया है-
“योग से विभिन्न प्रकार की सिद्धि चाहनेवाले योगाभ्यासी पुरुष निरन्तर गमनशील प्राणों को नाड़ियों में ‘कुम्भक’ आदि उपयुक्त क्रियाओं से मूलबन्ध जालन्धर आदि बन्धों के साथ अवरुद्ध करते हैं तो शरीर मे सम्यक् प्रकारेण रुधिर-संचार तथा सुदृढ़ बल का आधान होता है।” -ऋ० १/३८/११
“हे प्राणापानो! आप मेरी पुकार को सुनकर अवश्य प्राप्त होओ। आप ही मेरे जीवन में सब असत्यों को दूर करनेवाले हो (न+असत्या)। आप ही हमारे जीवनों को मधुर बनानेवाले सोम के रक्षक के लिए होते हो।” -ऋ० ८/८५/१

वेदों ने जहां प्राणायाम द्वारा वीर्यरक्षा की बात कही है वहीं दूसरी ओर वेद ने यह भी स्पष्ट किया है कि केवल शुद्ध वीर्य की ही रक्षा करनी श्रेयस्कर है (ऋ० ८/९६/१३)। वीर्य दो प्रकार का होता है- एक कृष्ण अर्थात् गर्वित करनेवाला और द्वितीय हर्षोल्लास देनेवाला। गर्वित करनेवाले दूषित वीर्य की रक्षा करनी योग्य नहीं, साधक को तो शुद्ध वीर्य की ही रक्षा करनी चाहिए। प्राणायाम ओषधिरूप है, कल्याण और सुख को देनेवाला है। “प्राणों वै भूतानामायु:” के सिद्धान्तानुसार प्रत्येक प्राणी की आयु श्वासों पर है वर्षों पर नहीं। आधुनिक जीवविज्ञान ने भी इस सिद्धान्त को स्वीकार किया है एवं प्राणियों की श्वास-व्यवस्था की एक अद्भुत श्रृंखला पेश की है-
खरगोश- ३८ प्रतिमिनट श्वास, आयु- ८ वर्ष
वानर- ३२ प्रतिमिनट श्वास, २१ वर्ष
हाथी- १२ प्रतिमिनट श्वास, १०० वर्ष
मनुष्य- १५ प्रतिमिनट श्वास, १०० वर्ष
सर्प- ८ प्रतिमिनट श्वास, १२० वर्ष
कछुआ- ५ प्रतिमिनट श्वास, १५० वर्ष
तात्पर्य यह है कि ब्रह्मचर्य, योगादि के द्वारा जितना श्वास को देर तक लेने वाला मनुष्य कर देगा उतनी ही उसकी आयु अधिक बढ़ेगी। ऋग्वेद ने कहा है- संयमितवायु प्राणायाम ओषधिरूप और आयुवर्धक है (१०/१८६/१,२,३)। हमारे ऋषि-मुनि वेदों से अनुप्राणित होकर मनुष्य के जीवन को स्वस्थ एवं प्रसन्नता से परिपूर्ण करने की चेष्टा की थी। परस्त्रीगामी की श्वास अधिक चलती है उसके प्राणतन्तु नष्ट हो जाते हैं। मनु ने कहा है-
नहीदृशमनायुष्यं लोके किंचन विद्यते।

यादृशं पुरुषस्येह परदारोपसेवनम्।। -मनु० ४/१३४
अर्थात्- आयु को नष्ट करने वाले जितने पदार्थ हैं उनमें से परस्त्रीगामी सर्व प्रधान है। अतः इन दोषों को दूर करने के लिए मनु ने भी प्राणायाम का मार्मिक और कल्याणकारी उपदेश किया-
दह्यन्ते ध्मायमानानां धातूनां हि यथा मलाः।
तथेन्द्रियाणां दह्यन्ते दोषाः प्राणस्य निग्रहात्।। -मनु० ६/७१
अर्थात्- जैसे अग्नि में तपाने से सोना आदि धातुओं का मल नष्ट हो जाता है और धातु शुद्ध हो जाते हैं, वैसे ही प्राणायाम करके मन आदि इन्द्रियों के दोष क्षीण होकर निर्मल हो जाते हैं।
इस प्रकार यह ‘प्राणायाम’ दुर्बलता आदि दोषों को दूर कर बलपुष्टि व आयु आदि को देता है। यह संक्षेप से वेदादि ग्रन्थों का प्रकरण दिखाया। इससे अतिविस्तृत वर्णन वेदों में प्राण-शक्ति का है। प्राणायाम के सम्बन्ध में पाश्चात्य विद्वानों की सम्मतियां भी अवलोकन हेतु प्रस्तुत है-

1. Deep breathing is the necessary means to the attainment of bodily and mental equilibrium. -A message to the Neuratic World by Dr. Volgysi
अर्थात्- प्राणायाम शारीरिक और मानसिक क्षमता को प्राप्त करने के लिए एक आवश्यक साधन है।

2. Take deep breathing exercises daily Several times a day. A hundred deep breaths a day is a recipe for avoiding Tuberculosis. -How to live by Dr. Fisher
अर्थात्- प्रत्येक दिनों में कई बार प्राणायाम करो। एक सौ गहरे सांस प्रत्येक दिन लेना तपेदिक को दूर करने के लिए अमोघ औषध है।

3. In deep breathing the whole lung is foreed into action…… the blood in the abdomen is more efficiently maintained, thus equalizing the circulation throughout the body the blood pressure is also favourably influenced. -Dr. Kallagsay
अर्थात्- प्राणायाम करने पर पूरा फेफड़ा अच्छी प्रकार काम करता है उदर में रक्त अधिक उत्तमता से धारण रहता है और इस प्रकार सारे शरीर में रक्त का प्रवाह ठीक तरह सर्वत्र होता है। प्राणायाम के करने से ब्लड प्रैशर की बीमारी को लाभ पहुंचता है।

4. It is not without reason that in the East breathing exercises are used as a means of cultivating mental poise and as an aid to religious life. -Personal Hygiene by William Jesse Ferring
अर्थात्- यह बिना कारण नहीं जो पूर्वीय देशों में प्राणायाम किये जाते हैं वे प्राणायाम मानसिक क्षमता उत्पन्न करने के साधन हैं और धार्मिक जीवन के लिए सहायक हैं।

5. “The increase in the number of red blood cells in the body is brought about by mechanical means.
The condition of the blood adjusts itself to a variety of bodily and environmental factors. The release from a certain amount of atmospheric pressure on the body’s surface lets loose blood corpuscles which were confined and pressed in small spaces or tiny arteries and they get into the general circulation.

In the middle aged persons and those beyond, there is an unequal distribution of red blood cells, due to pressure of fat, in elastic arteries and weak diaphragms. This latter breathing muscle may be and generally is, hindered in its freedom by an overdistended stomach or intestinal tract. This state of affairs means that red blood Corpuscles are jammed in or pushed aside to certain extremities or into blind alleys. In these places they are concentrated and unable to obtain oxygen, the cells die, leaving the cast off materials to be absorbed and make wrinkles and cause stiff joints. These prisoners- red blood cells, in their concentration camps cannot get out except through tiresome efforts and often they have exhausted much of their stored up oxygen when they do find freedom. Under these conditions they are as useless to the human organization as a lot of skilful mechanics would be crowded into a room and unable to get at their respective machines.

Any mechanical movement or driving force which stirs up these red blood corpuscles puts them into circulation, starts them doing their allotted work in rejuvenating the body and its organs. Certain forms of exercise will aid in accomplishing this change from age to youth, but not unless right breathing methods are rigidly adopted and kept up. -Breath and be well by Dr. Howard

अर्थात्- शरीर के रक्तकोशों की संख्या में वृद्धि यान्त्रिक साधनों के द्वारा होती है। रक्तावस्था अपने आप को शारीरिक व वातावरण सम्बन्धी विभिन्न स्थितियों के प्रति अभियोजित कर लेती है। छोटे स्थलों तथा लघु धमनियों में समिति व अवरुद्ध रक्तकण (Corpuscles) शरीर के हर भाग पर स्थित वायु मण्डलीय दबाव के कुछ न्यून होने पर बन्धन से मुक्त होकर सामान्य रक्त प्रवाह में सम्मिलित हो जाते हैं।
अधेड़ आयु वाले तथा वृद्ध पुरुषों में चर्बी के आधिक्य से वगाव धमनियों तथा दुर्बल वक्षोदर मध्यस्थ प्राचीरों (diaphragms) में लाल रक्तकोशों का असमान वितरण पाया जाता है। इस श्वास लेने वाली मांसपेशी की स्वतन्त्रता में फूले हुए पेट अथवा आन्त्र मार्ग के कारण सामान्यतः बाधा उत्पन्न हो जाती है।

इससे लाल रक्तकण किन्हीं सीमाओं या अन्ध तंग गलियों में ढकेल दिए जाते हैं। इन स्थानों पर वे एकत्रित हो जाते हैं और उन्हें प्राण वायु (Oxygen) न मिलने के कारण वे नष्ट हो जाते हैं। परिणामतः इनके अवशिष्ट अंश शरीर में घुल-मिलकर झुर्रियां तथा जोड़ों में जकड़न पैदा कर देते हैं। ये घिरे हुए रक्तकण अपने अवरुद्ध स्थानों से केवल थकान पैदा करने वाले प्रयत्नों से ही मुक्त हो सकते हैं। और स्वतन्त्र होने के समय तक वे संगृहीत प्राणवायु का बहुत बड़ा भाग प्रायः समाप्त कर देते हैं। इन स्थितियों में मानव शरीर के लिए वे ऐसे ही व्यर्थ हैं जैसे कि वे चतुर कारीगर जो कि कमरे में बन्द किये जाने के कारण अपनी अपनी मशीन पर कार्य करने में असमर्थ है।

इन रक्तकणों को उत्तेजित करने वाली कोई भी यान्त्रिक गति या प्रेरक शक्ति उन रक्तकणों को प्रवाह में ले आती है और शरीर तथा इसके अंगों में नूतन यौवन प्राप्त कराने के लिए अपेक्षित कार्य के करने के लिए उन्हें वाध्य कर देती है। वृद्धावस्था से यौवन प्राप्त कराने में कई प्रकार के व्यायाम सहायक हो सकते हैं। परन्तु केवल उसी अवस्था में जबकि सही श्वास पद्धतियों को दृढ़ता से धारण कर उनका अभ्यास किया जाय।
6. That the remarkable improvement in the heart’s nutrition and actions is, I think, to a great degree caused by the deep inspirations, In addition to the influence on the circulation the respiratory movements keep up the nutrition and efficiency of the lungs themselves, which undergo in old age a kind of atrophy. Another important influence consists in maintaining the elasticity of the chest-wall which are apt to become stiff in old age, and thus to interfere with free movements of the lungs and the pleura. -Dr. Hermaun Webber, British Medical journal

अर्थात्- हृदय को गतिशील और शक्तिशाली बनाने में अत्यधिक उन्नति मेरे विश्वास के अनुसार गहरे श्वास के द्वारा सम्भव हो सकती है। रक्त संचालन में सहायक होने के साथ ही प्राणायाम पद्धति के द्वारा फेफड़े भी जो कि वृद्धावस्था में निर्बल हो जाते हैं अधिक तत्परता से कार्य करने लगते हैं और उनमें शक्ति भी पैदा हो जाती है। वक्ष प्रकोष्ठ की पसलियां वृद्धावस्था में उतनी नमी और elastic नहीं रहती कि श्वास के आने जाने के साथ उनका संकोचन-विकोचन होता रहे, इसके विपरीत वे अधिक सख्त हो जाती हैं और फेफड़े के तथा फुस्फुस आवरण (pleura) के स्वाभाविक कार्य में बाधा उपस्थित करती है। प्राणायाम पद्धति का दूसरा महत्त्वपूर्ण प्रभाव यह होता है कि उससे वक्ष प्रकोष्ठ की पसलियों की नमी यथावत् कायम रहती है।

7. Thought commences and corresponds with respiration. First study ‘To feel your thoughts’. Thus, when one entertains a long thought, he draws a long breath; when he thinks quickly, his breath vibrates with rapid alteration; when the tempest of anger shakes his mind, his breath is tumultuous; when his soul is deep and tranquil, so is his respiration. But let him make trial of the contrary; let him endeavour to think in long stretches, at the same time that he breathes in fits, and he will find that it is impossible.” -Swedenburg

अर्थात्- विचार श्वासोच्छवास के साथ प्रारम्भ होते हैं और श्वासोच्छवास के साथ विचारों का घनिष्ट सम्बन्ध है। सबसे प्रथम अपने विचारों को अनुभव करने का अध्ययन करो वह इस प्रकार कि जब एक व्यक्ति लम्बा विचार करता है तब उसका श्वास तीव्र गति से चलता है, जब क्रोध का तूफान उसके मस्तिष्क को हिला देता है तब उसका श्वास भी क्षुब्ध हो जाता है और जब उसका आत्मा गम्भीर और शान्त होता है तब उसके श्वास भी वैसे ही हो जाते हैं। इसके विपरीत कोई व्यक्ति यह यत्न करे कि वह विचार तो गम्भीर करे और उसी समय श्वास तीव्रता से आवेश में लेवे तो उसे पता चल जायेगा कि ऐसा करना असम्भव है।
वैज्ञानिकों का कहना है-

“None should neglect the daily deep breathing exercises. The oxygen contained in the air helps to burn up waste matter, it also plays an important part in assimilating the iron obtained from food and there by giving a stronger and cleaner blood supply. Deep breathing clears and steadies the mind, and gives an erect carriage.”

अर्थात्- किसी व्यक्ति को भी किसी भी दिन प्राणायाम की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। यह ओषजन Oxygen जो प्राणवायु में मिला रहता है गन्दगी को दूर करता है। और यह उस लौह तत्व को हजम करने में भी मुख्य सहायक होता है जो लोह तत्व भोजन द्वारा प्राप्त होता है तथा इसके द्वारा रक्त की शुद्धि भी होती है। यह प्राणायाम मस्तिष्क को साफ और स्थिर करता है तथा शरीर को उन्नत बनाता है।

लेख को समाप्त करने से पूर्व इतना कहना आवश्यक और समीचीन है कि यह सिद्ध है कि प्राणायाम के बिना मनुष्य का जीवनोद्धार सम्भव नहीं है। वैदिक योगविद्या का पुनरुद्धार करने वाले महर्षि दयानन्द का हम जितना धन्यवाद करें, अल्प ही है। हमारे आर्ष ग्रन्थों में योग-प्राणायामादि जैसे पवित्र कर्मों के विपुल उल्लेख मिलते हैं, इसका दिग्दर्शन करानेवाले वह महान् व्यक्ति महर्षि दयानन्दजी ही थें। कुरान, बाइबिल आदि मिथ्या ग्रन्थ इन परम पुनीत कर्मों से अपरिचित हैं। यह मिथ्या ग्रन्थ मनुष्यजाति के लिए अभिशाप व त्याज्य हैं। अतः यदि मनुष्य अपनी शारीरिक व आत्मिक उन्नति चाहता है तो उसका यह सपना केवल वैदिक पद्धति ही साकार कर सकता है।

(Editorial Remark- Facts and claims presented in above article reflect opinions and research of the distinguished author. They may have not been scientifically proven or unproven.)
[Source- Navrang Times : Voice of Arya Pratinidhi Sabha America, March-April 2019 issue]

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