Saturday, February 24, 2024
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22 साल बाद जोगी बनकर भिक्षा मांगने आए बेटे को माँ ने पहचान लिया

डॉ देवेंन्द्र नाथ तिवारी

हमारे मित्र अनुज सिंह ने यह वीडियो क्लिप भेजी है। अनुज के पैतृक गाँव (अमेठी) का मामला है। उनकी रिश्तेदारी का एक बच्चा, 20-22 वर्ष पहले, अचानक कहीं चला गया था। परिजनों ने यथाशक्ति खोजबीन की। थाने में गुमशुदगी की रपट भी दर्ज कराई। वह बच्चा मिला नहीं। उसका पता नहीं चला। घरवालों को आशंका हुई, शायद वह अब जिंदा नहीं है। या फिर किसी दुर्घटना का शिकार हो गया होगा। अब वही बच्चा 22 साल बाद वापस अपने घर लौटा है। जोगी बनकर।

देखिए ये वीडियो

पर, उसकी यह यात्रा घर-परिवार से मिलने के लिए नहीं है। बल्कि संन्यासी जीवन के एक अहम विधान पूरा करने की है। दरअसल, जोगियों की एक परंपरा है। मान्यता है। संन्यास धारण करने के बाद, मां से भिक्षा पाना अनिवार्य है। कोई जोगी तभी बनता है, जब उसे अपने माँ के हाथ से भिक्षा मिलती है। आदेश भी कि वह जोगी बन जाए। लिहाजा युवा जोगी अपने घर लौटा है। अभी उसका संन्यास पूरा नहीं हुआ है। पर, मां की आंखें उसे पहचान लेती हैं।

वर्षों बाद अपने जिगर के टुकड़े को दरवाजे पर देख, मां का हृदय द्रवित हो उठा है। नैन सजल हो उठे हैं। झर रहे हैं। बुआ भी बेज़ार रो रही हैं। माँ और बुआ के करुण क्रंदन को देख जोगी का मन भी बिलख रहा है। सारंगी भी रो रही है। कंठ से करूण रसधार फूट रही है। वह गा रहा है। मां से भिक्षा की मांग कर रहा है- ‘सुनऽ माताजी, सुनऽ बुआजी मोरे करम लिखा वैराग्य माई रे कोई न मेटनवाला…’ माई, अपने हाथ से मुझे भिक्षा दे दो ताकि मेरा जोग सफल हो जाए। माँ बरज रही है। बुआ भी। तुम जोगी का भेष छोड़ दो। पूरा गांव उमड़ा है। आस-पड़ोस से लेकर घर-कुटुंब के लोग जोगी को मना रहे हैं। मनुहार कर रहे हैं। पर, जोगी अडिग है। कहता है, अगर मुझे भिक्षा नहीं मिलेगी, तो मैं दरवाजे की माटी लेकर चला जाऊंगा। पर, अपने जोग साधना को खंडित नहीं होने दूंगा। गेरुआ वस्त्र (गुदरी, कंथा) धारण किया है। सारंगी बजा रहा है।

गोपीचंद और राजा भरथरी की लोकगाथा सुना रहा है। गुरु गोरखनाथ की महिमा बता रहा है। भरथरी, एक ऐतिहासिक लोकगाथा है। समूचे उत्तर भारत में अलग-अलग तरीके से गाया जाता है। यह लोकगाथा दो भागों में विभाजित है। राजा भरथरी, वैरागी होते हैं। योग-भोग का अन्तर्द्वन्द व करुणा का परिपाक है, इस गाथा में। राजा भरथरी के मन में वैराग्य जागता है। वे गुरु गोरखनाथ से दीक्षा की प्रार्थना करते हैं।

गोरखनाथ उनकी राजसिक वृत्ति को देखकर दीक्षा देने से मना कर देते हैं। कहते हैं कि पहले अपनी रानी को माँ कहकर भिक्षा माँग कर आओ। राजा जोगी वेष धारण करके, हाथ में सारंगी लेकर महल के द्वार पर अलख जगाते हैं। लम्बी कथा है। रानी और भरथरी का संवाद होता है। आख़िर में भरथरी को भिक्षा मिलती है। वह गुरु गोरखनाथ के वापस जाते हैं। वहाँ उन्हें दीक्षा मिलती है। बहरहाल इन्हीं नाथ-जोगियों की परंपरा पर, हमने शोध किया है। गोरखपुर से लेकर पश्चिम बंगाल के नाथ पीठों-मंदिरों को जा कर देखा है।

जोगियों से मिला हूँ। महाराष्ट्र और उड़ीसा के भी जोगियों से इस संबंध में बातचीत की है। कुंभ मेले जोगियों के शिविर में रहा हूँ। शोध के सिलसिले में। एक सवाल था कि आख़िर वह कौन-सी वजह है, जो किसी को घर-परिवार छोड़ जोगी का तानाबाना धारण करने के लिए प्रेरित करती है? जवाब मिला, आत्म तत्व की तलाश या फिर विरक्ति का भाव। आखिर कोई राजा, संन्यासी क्यों बन जाता है। अष्टावक्र और जनक का संवाद है। जनक राजा से राजर्षि बन जाते हैं। आधुनिक समय में इसकी सैद्धांतिक परिणति मैस्लो के अभिप्रेरणा सिद्धांत में मिलती है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी, साइंस ग्रेजुएट हैं। पर, युवा दिनों में संन्यास की राह पर चल पड़े।

नाथपंथी योगियों की दीक्षा-प्रक्रिया अत्यंत कठिन होती है। एकांतिक साधना से लेकर हठ योग तक करना होता है। इस पूरी प्रक्रिया के बारे में ब्रिक्स ने अपनी किताब ‘द कनफटा योगी’ में बताया है। ब्रिग्स की यह किताब नाथ संप्रदाय के योगियों पर सबसे प्रामाणिक किताब मानी जाती है। 1938 में पहली बार छपी थी। गुरु गोरखनाथ के जीवन, परंपरा व योगियों से जुड़ी हर छोटी-बड़ी बात की पड़ताल करती है।

ब्रिक्स ने काफ़ी मेहनत से बारीक से बारीक तथ्यों को जुटाया है। कान छेदवाने की प्रक्रिया से लेकर योगियों के दफनाए जाने (वे जलाए नहीं जाते) तक की तमाम बातें/परंपराएँ इसमें दर्ज है। फ़िराक़ ने भी एक नाथपंथी जोगी का ज़िक्र किया है। ‘ज़िक्र-ए-फ़िराक़’ में। कैसे उन्हें एक नाथपंथी जोगी मिलता है। वह सारंगी पर गीत गाता है। मगन हो कर नाचता है। कहता है कि वह अब नहीं लौटेगा…

साभार- https://twitter.com/jpsin1

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