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सत्यवादी महाराजा हरिश्चंद्र

इस सृष्टि को चार युगी सृष्टि के नाम से भी जाना जाता है क्योंकि इसके कालखण्डों को चार खण्डों में बांटा गया है| इस के प्रथम काल खंड को हम सतयुग के नाम से जानते हैं| इस कालखंड में सत्याचरण से ही सब कार्य होते थे| इसलिए इसे सतयुग का नाम दिया गया है| इस युग के लगभग अंतिम वर्षों में सूर्यवंश के इक्षवाकु राजा की सन्तानों में आगे चल कर एक हरिश्चंद्र नाम का रजा हुआ है, जिसे सत्यवादी महाराज के नाम से भी जाना जाता है| इन के राज्य का केंद्र अयोध्या था अर्थातˎ यह राजा श्री रामचन्द्र जी के पूर्वजों में से ही एक थे| राजा हरिश्चंद्र सदा सत्य का ही आचरण करते थे| उनके जीवन का अधिकाँश समय दान पुण्य तथा प्रभु आराधना में ही व्यतीत होता था|

यदि उनके गुणों का बखान करना होतो यह अवर्णनीय है किन्तु हम इतना कह सकते हैं कि वह अपने समय के अद्भुत विद्वानों की श्रृंखला के विद्वानˎ पुरुष थे| वह इस के साथ ही साथ सदा सत्य बोलने वाले, अत्यंत पराक्रमी वीर, सब को यथावश्यकता कुछ न कुछ देने वाले दाता, धर्म पर आचरण करने वाले,तथा अत्यंत ही दयावानˎ थे| उनका राज्य सत्य पर चलने के कारण, सत्य के शासन के रूप में पहचाना जाता था| सत्य को ही न्याय कहा जता है| सत्याचरण के कारण कहीं भी मित्थ्या ववहार से कोई परीचित ही नहीं था|

जब राजा और प्रजा में स्त्य का व्यवहार हो तो निश्चय ही राजा और प्रजा में वात्सल्य भाव आ जाता है| इस कारण इस राजा और प्रजा के बीच अत्यधिक प्रेम का व्यवहार होता था| सब मनुषयों में समानता थी, कहीं ऊंच नीच कोई भेद नहीं था| धर्म का राज्य होने के कारण यह समानता इतनी सुद्दढ हो चुकी थी कि कोई एक मनुष्य दूसरे से अधिक सुखों की कामना ही नहीं करता था| इतना ही नहीं इस दयालु तथा सत्यवादी राजा के सामने न्याय के समय सब लोग एक तराजू पर ही तोले जाते थे| उनकी महारानी का नाम शैव्या था, जो एक सती साध्वी महिला थी|वह भी अपने पति के ही समान न्याय से अत्यधिक अनुराग रखती थी|

राजा रानी अत्यधिक सुखी रहते हुए भी कभी कभी संताप का अनुभव करते थे क्योंकि उनकी कोई संतान नहीं थी| उनके कुलगुरु महर्षि वसिष्ठ जी ने संतान प्राप्ति के लिए उन्हें वरुण देव की उपासना अर्थातˎ पुत्रेष्ठी यज्ञ करने के लिए प्रेरित किया| कुलगुरु की सलाह के अनुसार राजा ने यह उपासना की, इसके परिणाम स्वरूप उनकी पत्नी गर्भवती हुई और कुछ समय में ही उसने एक बालक को जन्म दिया, जिसका नाम रोहित रखा गया| संतान तो हो गई किन्तु पौराणिक कथाओं के अनुसार इस संतान को देने के लिए वरुण देव ने एक शर्त लगा दी थी कि राजा अपने उपास्य वरुण देव की इस पुत्र से बलि चढ़ा देवें| एकमात्र संतान होने के कारण राजा एसा न कर पाए और इस का परिणाम यह हुआ कि राजा को जलोदर का रोग हो गया| पिता की इस अवस्था को देख कर राजकुमार रोहित अत्यंत दु:खी था और इस रोग के उपचार स्वरूप वह अपनी बलि देने के लिए आगे आया|

रोहित की बलि की इस तैयारी को देख वसिष्ठ जी ने एक मार्ग निकाला और इस मार्ग के अंतर्गत उन्होंने एक ब्राहमण को सौ गाय का दान देकर इस बालक की रक्षा करते हुए इस ब्राहमण का लड़का खरीद लिया| इस प्रकार गायों के मोल में बालक को खरीद लिया और इस खरीदे हुए बालक का नाम शुन:शेफ रख दिया गया| इस प्रकार राजकुमार रोहित के स्थान पर ख़रीदे गए इस बालक की बलि देने का निश्चय किया गया| इस अवस्था में विश्वामित्र जी को इस बालक पर दया आई और उन्होंने भी इस बालक को वरुणदेव की ही आराधना के लिए कहा, उसकी इस आराधना से प्रसन्न होकर वरुणदेव ने बालक की बलि लिए बिना ही राजा का रोग ठीक कर दिया|

अब राजा ने राजसूय यज्ञ करने का निश्चय किया| यज्ञ किया गया और यह निर्विघ्न समाप्त भी हो गया किन्तु समाप्ति के समय विश्वामित्र जी वहां आ गए| गुरु वसिष्ठ जी ने विश्वामित्र जी से राजा का परिचय करवाते हुए बताया कि वह सत्यप्रिय, दानशील और अत्यंत उदार राजा हैं| विश्वामित्र ने राजा में यह सब गुण होने के लिए स्वीकार नहीं किया| जब वशिष्ठ जी ने उनको यह सब स्वीकारने का आग्रह किया तो उन्होंने राजा की परीक्षा लेने का निश्चय किया|

एक दिन की बात है कि राजा हरिश्चंद्र जंगल में शिकार के लिए गए थे किन्तु जंगल में वह अपने रास्ते से भटक गए| राजा अपना मार्ग ढूँढ़ने का प्रयास कर रहे थे कि ब्राहमण के रूप में उन्हें विश्वामित्र जी मिल गए| इस ब्राहमण ने राजा के सामने याचना के लिए हाथ फैला दिए| इसके लिए राजा हरिश्चंद्र ने उन्हें उनके दरबार में आने के लिए कहा| अत: एक दिन ब्राहमण वेशधारी विश्वमित्र जी दरबार में आ पधारे और उन्होंने आते ही राजा से कहा कि हे राजन यदि आप मुझे वास्तव में ही कुछ देना चाहते हैं तो मुझे अपना यह राज्य ही नहीं इसके साथ अपना सब कुछ दे दीजिये|

यह लोक कथा तो प्रचलित ही है कि राजा हरिश्चंद्र के समकक्ष कोई अन्य राजा इतना दानी नहीं हुआ जितना कि राजा हरिश्चंद्र थे| इसके साथ ही साथ वह अत्यधिक उदार ह्रदय भी रखते थे| जब जब किसी ज्ञानी, विद्वानˎ और ऋषि की सेवा का अवसर आता तो वह उसके लिए अपना सब कुछ देने के लिए भी सदा तैयार रहते थे| अत; उनको विश्वमित्र जी की इस मांग के उत्तर में कुछ भी सोचने विचारने की आवश्यकता नहीं पड़ी और जो माँगा गया था, उसके अनुरूप उन्होंने अपने राज्य के साथ ही साथ अपना सब कुछ भी उन्हें भेंट कर दिया| जब सब कुछ दे दिया तो विश्वामित्र जी फिर भी चुप नहीं हुए क्योंकि किसी भी यज्ञ की पूर्ति उचित दक्षिणा दिए बिना पूर्ण नहीं होती, इसलिए उन्होंने अपने लिए उचित दक्षिणा भी मांग ली| राजा हरिश्चंद्र अपना राज्य, खजाना तथा उनके पास जो कुछ भी था, वह सब तो पहले से ही दान कर चुके थे, इसलिए अब दक्षिणा देने के लिए अपना कहे जा सकने वाला कुछ भी उनके पास नहीं था, जिसे वह दक्षिणा के रूप में दे सकें| उनके पास तो अब एक पत्नी थी और एक पुत्र था, जिसे वह अपना कह सकते थे| राजा के इस प्रकार भिखारी बन जाने पर उसकी प्रजा की आँखों से इस दु:ख के कारण अविरल अश्रुधारा बह रही थी किन्तु कोई कुछ भी नहीं कर सकता था| सब और शौक और दु:ख के अतिरिक्त कुछ भी दिखाई नहीं देता था|

जब राजा हरिश्चंद्र सब राजपाट दान कर अपनी पत्नी और अपने बालक को लेकर जंगल की ओर रवाणा होने लगे तो विश्वामित्र जी उनके सामने आकर खड़े हो गए और बोले कि महाराज आप कहाँ जा रहे हैं , जाने से पहले मेरी दक्षिणा देना तो आप भूल ही गए हैं, वह भी देते जावें| विश्च्वामित्र जी के यह शब्द सुनकर दु:खी होने के स्थान पर राजा ने बड़े स्वाभिमान से छाती ठोक कर उत्तर देते हुए कहा कि “ हाँ! भगवनˎ दक्षिणा तो मैं दूंगा और अवश्य ही दूंगा किन्तु इसके लिए मुझे थोड़ा सा समय चाहिए|” इस दक्षिणा को पाने के नाम पर विश्वामित्र जी ने राजा के जाने के मार्ग पर स्थान स्थान पर बाधाएं खड़ीं कीं और उनका मार्ग रोकते रहे किन्तु धुन के धनी यह राजा अपना राजपाट त्याग कर काशी वर्त्तमान वाराणसी जा पहुंचे|

काशी पहुँचने पर भी विश्वामित्र जी ने उनका पीछा नहीं छोड़ा और ब्राहमण का वेश धारण कर हरिश्चंद्र जी की अनेक प्रकार से परीक्षाएं लीं किन्तु हरिश्चंद्र थे कि अपने सत्यवादी तथा उदार व्यवहार के कारण इन सब परीक्षाओं में पास होते चले गए| विश्वमित्र जी को दक्षिणा तो देनी ही थी किन्तु कोई साधन धन प्राप्ति का उनके पास नहीं था| अत: यह दक्षिणा देने के लिए उन्होंने अपनी पत्नी शैव्या और अपने पुत्र रोहित को एक ब्राहमण के हाथों बेच दिया|

जब विश्वमित्र जी अपनी दक्षिणा के लिए उनके पास पुन: आये तो पत्नी और बच्चे को बेचने पर जो धन उन्हें मिला था वह दक्षिणा के रूप में उन्होंने विश्वामित्र जी को समर्पित कर दिया| धन देते समय उन्होंने विश्वामित्र जी से कहा कि “ भगवनˎ! अपनी स्त्री और पुत्र को बेचकर यह धन पाया है: इसे लीजिये और मुझे ऋण से मुक्त कीजिये|” विश्वमित्र जी ने दक्षिणा स्वरूप यह धन तो ले लिया किन्तु अब तक भी उनकी परीक्षा का कार्य पूर्ण नहीं हुआ था, इस कारण वह अब भी पूरी तरह से सन्तुष्ट नहीं हुए| अत: उन्होंने हरिश्चंद्र जी से प्रत्युत्तर में कहा कि “ मुझे एक महानˎ यज्ञ करना है, जिसके लिए आपके द्वारा दक्षिणा रूप में दिया गया यह धन तो बहुत ही कम है|” जब विश्वमित्र जी ने राजा से और अधिक दक्षिणा के लिए बार बार आग्रह किया तो उन्होंने स्वयं को भी एक डॉम के हाथ में बेच दिया| इस प्रकार स्वयं को बेचने के पश्चातˎ मिले इस धन को भी विश्वामित्र जी को बड़ी खुशी से समर्पित कर दिया| राजा के इस त्याग को देखते हुए देवलोक के सब देवता भी प्रसन्न हो उठे|

धन तो सब दक्षिणा रूप में ही जा चुका था, अन्य कोई साधन नहीं था और स्वयं भी बिक चुके थे| इस प्रकार वह राज्य के साथ ही साथ अपनी पत्नी, अपने एकमात्र पुत्र और यहाँ तक कि स्वयं तक का भी एक प्रकार से बलिदान करते हुए उस चांडाल के सेवक बन गए, जिसके हाथ वह बिके थे| इस चांडाल ने उनके जिम्मे यह कार्य लगाया कि वह शमशान में निवास करते हुए जो भी पार्थिव शरीर को लेकर अंतिम संस्कार के लिए इस शमशान में लावे, उससे कुछ कर ले, बिना कर के किसी का भी अंतिम संस्कार न होने दे|

इधर राजा हरिश्चन्द्र अपनी सत्यवादिता और व्रतनिष्ठा के कारण शमशान में नियुक्त हो कर अंतिम संस्कार करने आने वालों से कर ले रहे थे तो दूसरी और उनकी पत्नी शैव्या और पुत्र रोहित उस ब्राह्मण के यहाँ डास बनकर कार्यकर रहे थे, जिसके हाथ उन्हें बेचा गया था| इस अवस्था में भी विश्वमित्र जी इस राजा और उसके परिवार की परीक्षा के कार्यमे लगे हुए थे, उनकी परीक्षा समाप्त होने का नाम, ही नहीं ले रही थी| इस के अन्तर्गत ही एक दिन राजकुमार रोहित अपने मालिक ब्राहमण के आदेश पर पूजा के लिए फूल लेने गए हुए थे और वह फूल लेकर लौट रहे थे कि मार्ग में विश्वमित्र जी से प्रेरित अथवा फैंके गए एक सर्प ने रोहित को डस लिया| इस सर्प के डसने से रोहित की मृत्यु हो गई|

पुत्र की मृत्यु का समाचार जानकर रानी शैव्या बेहद दु:खी हुई किन्तु वह कुछ भी कर नहीं सकती थी| वह रोती चिल्लाती हुई अपने पुत्र रोहित का पार्थिव शरीर लेकर काशी के गंगाघाट की उस शमशान में गई, जहां हरिश्चंद्र जी सेवक का कार्य कर रहे थे| रानी को पहचानने की राजा ने कुछ भी आवश्यकता नहीं समझी और अपने नियम के अनुसार उन्होंने अपनी ही रानी से संस्कार करने से पूर्व निर्धारित कर की मांग रखा दी| इस पर रोते हुए रानी शैव्या ने कहा कि “ मैं एक अनाथिनी अबला हूँ, मेरे पास देने के लिए कुछ भी नहीं| “ इतना कह कर रानी अपने राजसुख को स्मरण कर विलाप करते हुये जोर जोर से रोने लगी तब कहीं जा कर राजा हरिश्चंद्र जी को पता चला कि यह तो उसकी अपनी ही रानी शैव्या थी जो उनके अपने ही पुत्र रोहित की मृत्यु होने पर उसका अंतिम संस्कार करने यहाँ आई थी| यह सब जान कर उन्हें भी बेटे के देहावसान पर अत्याधिक दु:ख हुआ किन्तु नियमानुसार कर के बिना किसी का दाह संस्कार नहीं करना, इस नियम का पालन करते हुए उन्होंने अपने ही बालक का दाह संस्कार करने से मना कर दिया| कुछ देर विलाप करने के बाद वह अपने मालिक चांडाल की स्वीकृति लेने के लिए उस के पास गए|

विश्वमित्र तो आज भी इस पूर्व राजा की परीक्षा लेने में लगे हुए थे| अत: जब राजा चांडाल की स्वीकृति लेने गए तो पीछे से विश्वामित्र जी ने रोहित के रक्त से शैव्या को भी रंग दिया और उसे अपने ही बालक की घातिनी प्रसिद्ध कर दिया| इससे शैव्या का दु:ख और भी बढ़ गया| वह अब भी निरंतर विलाप कर रही थी कि चांडाल को अपने साथ लेकर राजा हरिश्चंद्र जी भी वहाँ आ पहुंचे| अपने सामने एक स्त्री को बालघातिनी के रूप में पाकर चांडाल ने हरिश्चंद्र को आज्ञा दी कि वह इस स्त्री का वध कर दे| नि:सहाय हरिश्चंद्र ने खड्ग उठाई और ज्यों ही अपनी पत्नी शैव्या को मारने के लिए आगे बढे कि तत्काल विश्वमित्र जी अनेक देवताओं के साथ आये और उन्होंने हरिश्व्चंद्र जी का हाथ पकड़ लिया| सब ने मिलकर राजा हरिश्चंद्र जी के सत्यव्रत की भरपूर प्रशंसा की| इतना ही नहीं राजकुमार रोहित का विष निकाल कर उसे भी जीवित कर दिया|

राजा हरिश्चंद्र के व्रती तथा सत्यनिष्ठ होने का ही यह परिनाम था कि विश्वमित्र जी ने अपने अनेक वर्षों के तप का फ़ल हरिश्चंद्र जी को दे दिया| उन्होंने राजा का सब राजपाट और सब अधिकार राजा को लौटाने चाहे किन्तु हरिश्चंद्र जी दान दिया हुआ कुछ भी वापिस लेने को तैयार नहीं हो रहे थे किन्तु उन्होंने विश्वामित्र जी के प्रतिनिधि स्वरूप राज्य कार्य को संभालना स्वीकार किया| इस प्रकार वह अपने सत्यवादिता, उदारता, तप और त्यागमयी जीवन के कारण एक बार फिर से अयोधया के शासक बने और पत्नी शैव्या तथा बालक रोहित सहित अयोध्या लौट आये| अयोध्या आने पर सत्य धर्म का पालन करते हुए लम्बे समय तक उन्होंने अयोधया पर राज्य किया और अंत में रोहित को राज्य का सब कार्य भार सौंप कर सुरपुर को सिधार गए|

इस प्रकार का धैर्य रखने वाले न तो कभी पराजित होते हैं और न ही कभी अपमानित ही होते हैं| हा! समय समय पर उनके लिए परीक्षा की घड़ी आती है, किन्तु धैर्यवानˎ व्यक्ति अपने धैर्य को कभी नहीं खोता और एक दिन वह अपने धैर्य के बल पर सब प्रकार की परीक्षाओं को पार कर सफल हो कर अत्यधिक प्रशंसा प्राप्त करता है|

डॉ. अशोक आर्य
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२०१०१२ गाजियाबाद उ. प्र. भारत
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