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हर परेशानी को अपनी मंजिल बनाकर खुद की रोशनी बनी शमा

बी.ए. पास होती तो नोकरी कर लेती। दसवीं का फार्म भरा, पास नहीं भी हुई तो दसवीं फेल तो कहलाएगी ही। उपहास में कहे, सुसराल वालों के ये तानें शमा को 45 साल पहले सुनने को मिले जब 15 वर्ष की उम्र में वह ब्याह कर 1977 में फिरोज अहमद की अर्धांगिनी बनी। उस समय वह आठवीं पास थी। इनके पति एम. ए. पास थे और कोटा नगर निगम में एलडीसी के पद पर नियुक्त थे। तन्ख़्वाह बहुत कम होने से श्रीमती शमा फिरोज को अक्सर ये सुनना और सहन करना पड़ता था। ऐसा नहीं कि शमा को पढ़ने का शौक नहीं था परन्तु इनके पिता की हैसियत इतनी नहीं थी कि वो आठ बहन भाइयों को ज़्यादा तालीम दिलवा सकें। उन्होंने शादी भी कम उम्र में कर के अपना फ़र्ज़ पूरा कर दिया।

शिक्षा को लेकर किए गए उपहास ने शमा के शौक की दबी हुई चिंगारी को हवा दी और आठवीं कक्षा के पांच साल बाद फिर से आगे पढ़ने की ठानी। पति ने पूरा सहयोग किया तो 1981 में सैकेंड्री का फार्म भर दिया और परीक्षा में अच्छे अंकों से सफलता भी प्राप्त की। अब क्या था होंसले को पंख लगे, लगातार अध्ययन कर 1982 में हायर सेकेंडरी,1985 में बी. ए. और इसी वर्ष जामिया अलीगढ़ उत्तरप्रदेश से मोअल्लिम उर्दू बी. एड. परीक्षा उत्तीर्ण कर सफलता की सीढ़ियां पार की। पढ़ाई का सिलसिला जारी रखा और 1996 में खुला विश्वविद्यालय कोटा से बी.एड.किया और 1905 में वर्धमान महावीर खुला विश्वविद्यालय कोटा से हिंदी विषय में एम.ए. की डिग्री प्राप्त की।

शिक्षा प्राप्त करने की चाह इतनी बलवती थी कि घर – गृहस्थी के सारे दायित्व निभाते हुए अपनी एक बच्ची जो जन्म से ही शारीरिक दृष्टि से निशक्त थी, जो न बोल सकती थी न चल सकती थी, 18 वर्ष तक उसके जीवन की देखभाल की जिम्मेदारी भी बखूबी निभाई। एक अच्छे – खासे संघर्ष की मुक्कमल दास्तान है शमा का जीवन। उच्च शिक्षा प्राप्त कर इन्होंने इंग्लिश मीडियम प्राइवेट मॉडर्न स्कूल में एवं पदमपत सिंघानिया स्कूल में हिंदी अध्यापिका के रूप में बीस साल तक कार्य किया और ट्यूशन कर अपने परिवार के लिए मजबूत आर्थिक इकाई के रूप में भागीदारी निभाई।

तीन साल पूर्व इन्हें ग़ज़ल और कविता लिखने का शौक उत्पन्न हुआ और अभ्यास करते – करते निरन्तर लिख रही हैं। कोटा क्षेत्र की एक उभरती शायरा के रूप में आपका नाम शुमार हो गया है।अभी तक आप करीब एक सौ गजल लिख चुकी हैं, जिनका देश के कई समाचार पत्रों और पत्रिका में प्रकाशन होता है।इलाहबाद की ‘गुफ़्तगू’ की त्रैमासिक पत्रिका में निरन्तर इनकी ग़ज़लें एवं समीक्षाएं प्रकाशित होती हैं। कोटा से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका “काव्य सृजन” में, मोबाइल पर प्रसारित प्रसिद्ध साहित्यिक मंच “काव्योदय” तथा “गोपालदास नीरज साहित्य संस्थान” अखिल भारतीय स्तर पर ग़ज़लों का निरंतर प्रकाशन होता है। कोटा आकाशवाणी से भी आपकी रचनाओं का प्रसारण किया जाता हैं। कोटा की स्थानीय संस्थाओं सृजन और तख़लीक तथा “मधुकर काव्य सर्जन” आदि की कवि गोष्ठियों और मुशायरों में भी आप शिरकत करती हैं।

इलाहाबाद प्रयाग की प्रसिद्ध साहित्यिक संस्था “गुफ़्तगू” द्वारा वर्ष 2021 में “सदी के मशहूर ग़ज़लकार” नामक पुस्तक में ग़ज़लें प्रकाशित की जा कर आपको अकबर इलाहाबादी स्मृति सम्मान से सम्मानित किया गया। आपको अप्रैल 2022 में श्री कर्मयोगी सेवा संस्थान कोटा द्वारा “श्री कर्मयोगी साहित्य गौरव सम्मान” से सम्मानित किया गया।
आपको आपको “सर्वश्रेष्ठ ग़ज़ल” एवं सर्वश्रेष्ठ शे’र (काव्योदय) प्रथम पुरस्कार से सम्मानित भी किया गया है।
गजल गहराई की लेखिका की एक बानगी देखिए…..

“”बहुत से राज़ हैं गहरे उन्होंने जो छुपाए हैं,
यक़ीनन राज़ उल्फ़त के ज़ुबाँ पर भी न लाए हैं,
बहुत दुश्वारियां झेलीं उन्होंने प्यार के ख़ातिर,
मगर रिश्ते उन्होंने सब बख़ूबी ही निभाए हैं।
वो छपवाते हैं अपने कामों को अख़बार में जाकर,
विरासत की हिफ़ाज़त जो कभी भी कर न पाए हैं।
नहीं छोड़ा कफ़न तक भी जिन्होंने मरने वालों का,
बड़े ही पारसा बनकर करके वो महफ़िल में आए हैं।
ज़रा सी भी नहीं कटवाई अंगुली जिनके पुरखों ने,
शहीदों में लिखाने नाम वो अपना यूं आए हैं।
वतन के वास्ते जो हो गए क़ुर्बान जाँ देकर,
मज़ारों पर उन्हीं के फूल हमने भी चढ़ाए हैं।””

कोटा में 13 जुलाई 1962 को जन्मी शमा के जीवन को इस मुकाम तक ले जाने में उन रिश्तेदार के उपहास ने राह दिखाई जिन्होंने मैट्रिक का फ़ॉर्म भरने पर कहा था, “अच्छा है पास नहीं भी हुई तो 10 वीं फेल का तो नाम होगा। कम से कम आठवीं पास तो नहीं कहलाएगी।” उन्हे अपने पति पर भी नाज़ है जिन्होंने आगे बढ़ने में मजबूत स्तम्भ का काम कर उन्हें आगे बढ़ाया और स्वयं भी आगे चल कर वह निगम में पर्यटन प्रभारी बने और शहर में इतिहासविद के रूप में उनकी पहचान है। आज शमा ने कठिन परिस्थितियों में रह कर अपने को आकाश कर लिया। शमा की भावनाए उन्हीं के शब्दों में ” हमारी ख्वाहिशें है इक नया सपना सजाने की, तमन्ना है हमारी इक नया सूरज उगाने की। किसी दिन देखना पहुंचेंगे हम भी उस बुलंदी पर,करेंगे कोशिशें हम आसमां से तारे लाने की।”

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