Monday, July 22, 2024
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न्यूज़ क्लिक के पत्रकारों पर छापे का असली सच ये है

खबर यह है कि पुलिस ने न्यूज क्लिक (NewsClick) से जुड़े कई पत्रकारों के घरों पर छापा मारा, बहुतों को हिरासत में लिया। यह मामला चीन से करोड़ों रुपए की फंडिंग लेकर भारत के खिलाफ और चायनीज प्रोपेगेंडा के लिए लिखने-बोलने के संबंध में है। मामला चूँकि पत्रकारों और खासकर वामपंथी मीडिया गिरोह से जुड़ा है, इसलिए सोशल मीडिया पर इसे ‘प्रेस की स्वतंत्रता’ से जोड़ कर रायता फैलाया जा रहा है।

राजदीप सरदेसाई जैसे बड़े और उम्रदराज पत्रकार तो यहाँ तक सवाल करने लग गए कि पत्रकारों/लेखकों के घरों में जो छापेमारी की गई, उनके मोबाइल और लैपटॉप जब्त कर लिए गए, उसको लेकर पुलिस के पास कोई वॉरंट या एफआईआर तक नहीं था। पुलिस की छापेमारी जैसी रोजमर्रा की खबर को राजदीप ने लोकतंत्र से जोड़ते हुए पूछ डाला कि – “पत्रकार कब से राज्य के दुश्मन बन गए?”

पुलिस के पास न्यूज क्लिक (NewsClick) से जुड़े पत्रकारों के घरों की तलाशी, उनके इलेक्ट्रॉनिक गैजेट आदि जब्त करने संबंधी वॉरंट या एफआईआर है या नहीं, राजदीप जैसे कद वाले पत्रकार को यह पता लगाने में बस 1-2 फोन कॉल करना था, जो उन्होंने नहीं किया। सोशल मीडिया पर हवा बनानी थी, इसलिए आधी-अधूरी जानकारी लिख दी। “पत्रकार कब से राज्य के दुश्मन बन गए?” वाला दूसरा सवाल जो उन्होंने पूछा, उसको लेकर भी सिर्फ यही कहा जा सकता है कि बाल सफेद कर लेने या हो जाने या उम्र के ज्यादा हो जाने से जानकारी भी ज्यादा हो, यह एक भ्रम ही है, जिसे इन जैसे पत्रकार-लेखकों ने गढ़ा है।

1.) पैसे लेकर प्रोपेगेंडा कैसे किया जाता है? 2.) पैसे देकर प्रोपेगेंडा कैसे करवाया जा सकता है? 3.) कॉन्टेंट कंपनी के नाम पर चीन भारत के ही लोगों को सैलरी देकर कैसे उनके जरिए अपनी बात, अपनी राजनीति, अपनी कूटनीति फैला सकता है? 4.) भारत के लोग अगर चायनीज कंपनी में काम करते हैं, वहाँ से सैलरी लेते हैं तो क्या वो अपने ही देश के खिलाफ लिखना-बोलना शुरू कर देंगे? – राजदीप या राजदीप जैसे जो भी पत्रकार इस तरह के सवाल उठा रहे हैं, तो उनका जवाब है मेरे पास।

मैंने लगभग 4 साल (2016 से 2019 के आखिरी महीने तक) 2 अलग-अलग चीनी कंपनियों के लिए काम किया है। दोनों ही कंपनियाँ कॉन्टेंट से जुड़ी थी। न्यूज का ही काम होता था। दोनों जगह लिखने-बोलने वाले सारे कर्मचारी भारत के ही थे। संपादकीय टीम में एक भी चायनीज नहीं था। इतनी डिटेल इसलिए क्योंकि अगली लाइन चौंकाने वाली है। संपादकीय टीम में हम सभी भारतीय थे जरूर लेकिन संपादकीय नीतियाँ आती थीं बन कर बीजिंग से। मौखिक नहीं बल्कि सब लिखित होता था। हम सबको उस एक्सेल शीट के अनुसार ही काम करना होता था।

क्या होता था उस एक्सेल शीट में?

कॉन्टेंट, न्यूज, मीडिया से जुड़ा कोई भी विषय हो – सब पर डिटेल में लिखा रहता था। बात पॉर्न की हो, नग्नता की या अश्लीलता की – ज्ञान बीजिंग से ही आता था। अर्थव्यवस्था, विदेश नीति, कॉर्पोरेट जगत की बात हो – संपादकीय नीति बीजिंग की टीम ही तय करती थी। एक छोटे से उदाहरण से ऐसे समझिए कि शुरुआती हायरिंग के बाद तब के हमारे संपादक ने यह तय किया अर्थव्यवस्था के अंदर बैंकिंग/कॉर्पोरेट/इंश्योरेंस आदि विषय आएँगे। भारत की तमाम मीडिया लगभग इसी सोच से चलती है। चायनीज टीम इसे समझ नहीं पाई, ना ही अपनी बात हम सभी को समझा पाई। इसके बाद उन्होंने पूरी टीम (हिंदी-अंग्रेजी) को भारी-भरकम खर्चे पर बीजिंग बुला लिया और महीने भर की ट्रेनिंग देकर समझाया कि कॉर्पोरेट पैरंट कैटेगिरी होगी, इसके अंदर अर्थव्यवस्था/बैंकिंग/इंश्योरेंस आदि आएँगे।

इस पूरे प्रकरण के बाद चायनीज मैनेजमेंट यह समझ चुकी थी कि भारत में कॉन्टेंट संबंधी ऑफिस चलाना है तो बीजिंग से मैनेज करना मुश्किल होगा। इसके बाद 2-4 चायनीज हमारे गुड़गाँव वाले ऑफिस में परमानेंट रहने लगे। वीजा पर आते थे। एक समय ऐसा आया कि भारतीय शक्ल से ज्यादा चायनीच मुंडी हमारे दफ्तर में दिखती थी। इनमें 1-2 हमेशा वो होते थे, जो या तो चीन के ही किसी विश्वविद्यालय से या भारत के किसी संस्थान से हिंदी का कोर्स किए रहते थे। वो हिंदी कॉन्टेंट तैयार नहीं करते थे क्योंकि वैसी योग्यता उनकी थी भी नहीं लेकिन वो ऑफिस में होते थे। स्पष्ट तो नहीं कह सकते लेकिन कयास लगा सकते हैं कि शायद बातचीत सुनने के लिए वो हों!

ऑफिस में जो चायनीज रहते थे, की-बोर्ड पर उनकी स्पीड गजब की होती थी। वो बीजिंग टीम से हमेशा चैट करते रहते थे। वहाँ से चायनीज में दिया गया निर्देश गुड़गाँव में अंग्रेजी और हिंदी में ट्रांसलेट किया जाता था, एक्सेल शीट में जोड़ा जाता था। भले वो टूटी-फूटी अंग्रेजी और हिंदी ही क्यों न हो, यह काम वही करते थे। उसको एडिट करने का भी राइट्स भारतीय टीम को नहीं थी।

क्या नहीं करना है – एक एक्सेल शीट इसकी भी
ऊपर जिस एक्सेल शीट की बात मैंने की, वो शीट यह बताती थी कि अगर कुछ करना है तो कैसे करना है। लेकिन यह काफी नहीं था। चीन जैसे वामपंथी देश और भारत में ‘प्रेस की स्वतंत्रता’ का रोना रोने वाले वामपंथी पत्रकार/लेखकों को यह जानना भी जरूरी है कि एक एक्सेल शीट ऐसी भी थी, जिसके अंदर लिखे विषयों पर लिखने-बोलने की मनाही थी। इतना ही नहीं, न्यूज एग्रीगेटर के तौर पर इन विषयों से संबंधित किसी भी चैनल/वेबसाइट से आई ऐसी खबरों को हाइड करना भी हमारा ही काम था।

आखिर कौन-कौन ऐसे विषय थे, जिन्हें चायनीज मैनेजमेंट नहीं चाहता था जनता को दिखाना-पढ़ाना:
चीन-विरोधी कोई भी खबर
अरुणाचल प्रदेश से जुड़ी खबरें
दलाई लामा की कैसी भी खबर हो
तिब्बत से जुड़ी खबर
ताइवान की कोई भी खबर
हॉन्गकॉन्ग संबंधी खबरें
तियानमेन स्क्वायर और वहाँ के विद्रोह वाली खबर और फोटो
चायनीज हिरोइन की सेक्सी फोटो/वीडियो नहीं
फलाना-ढिकाना (सब याद नहीं)

आखिर किन लोगों को चायनीज कंपनियाँ एक खास तरह का कॉन्टेंट पढ़ाना चाहती थी, जबकि अपने प्रोपेगेंडा के तहत कुछ खबरों को दिखाने तक पर रोक लगा देती थी? भारत के ही लोगों को। भारत के ही मीडिया घरानों से खबरें लेकर अपने ऐप पर भारत के ही खिलाफ काम किया जाता था। और इसके लिए काम करने वाले सभी भारतीय ही थे, मैं भी था। बाकियों का नहीं पता, पर मेरे लिए इसके पीछे सैलरी ही एकमात्र वजह थी।

अब फिर से आते हैं न्यूज क्लिक (NewsClick) वाली खबर पर। उस सोच पर जो यह मानती है कि – “पत्रकार कब से राज्य के दुश्मन बन गए?” जिस संपादकीय नीति की चर्चा मैंने की, जिस पर काम करके 4 साल तक सैलरी उठाई, क्या कुछ उसी तरह का काम न्यूज क्लिक (NewsClick) के संपादक लोग कर रहे थे/हैं या वो सही मायने में ‘प्रेस की स्वतंत्रता’ का झंडा बुलंद कर रहे?

साभार- https://hindi.opindia.com/से

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