Thursday, July 25, 2024
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कवयित्रियों के स्वरों से महकती रही कविता, गीतों और गज़लों की ये यादगार शाम

मुंबई। चित्रनगरी संवाद मंच मुम्बई की ओर से हिंदी पखवाड़े के दौरान रविवार 18 सितंबर 2022 को #निर्झर_कवयित्री_सम्मेलन का आयोजन केशव गोरे स्मारक ट्रस्ट, गोरेगांव पश्चिम में किया गया था। इसमें सुमीता केशव, डॉ दमयंती शर्मा ‘दीपा’, मोना अल्वी, स्मिता पारीक, डॉ मेघा भारती, डॉ रश्मि चौकसे, पूनम विश्वकर्मा, वर्षा महेश, पूनम खत्री, सविता दत्त और ऋतिका मौर्य ने कविता पाठ किया। अंत में मशहूर हास्य व्यंग कवि सुभाष काबरा ने पूरे आयोजन पर अपनी दिलचस्प समीक्षात्मक टिप्पणी पेश करके ठहाके लगवाए। उन्होंने अपने अंदाज़ में एक-एक कवयित्री की रचना की टिप्पणी की।

विविधरंगी कविताओं से महकती यह एक इंद्रधनुषी शाम थी। माहौल में बारिश की रिमझिम का संगीत गूंज रहा था और मंच पर हृदयस्पर्शी अनुभूतियों का गुलदस्ता सजा हुआ था। भावनाओं की शाख़ पर खिले हुए शब्दों की आत्मीय प्रस्तुति हो रही थी। यह तय करना मुश्किल था कि कौन अच्छा है और कौन बहुत अच्छा है।

कुल मिलाकर सभी कवत्रियों ने कमाल किया। तीन घंटे तक श्रोतागण काव्य की बारिश में भीगते रहे। तालियां बजती रहीं। वाह-वाह होती रही और ठहाके भी लगते रहे। कुछ कवत्रियों ने तहत में बहुत अच्छा कविता पाठ किया। कुछ के पास इतना दिलकश तरन्नुम था कि सुनकर श्रोता झूम उठे। कुल मिलाकर यह एक ऐसा कार्यक्रम था जिसने श्रोताओं के दिलों पर अमित छाप छोड़ी।

कवयित्री सम्मेलन की शुरुआत नवोदित शायरा ऋतिका मौर्य ने की।
मुआफ़ी से फ़क़त दिल से गिले शिकवे नहीं जाते।
सहर आ जाती है पर रात के धब्बे नहीं जाते।
बरसती हैं कभी आँखें कभी जलने ये लगती हैं,
ये सूखे फूल हमसे इस तरह देखे नहीं जाते।

ऋतिका को हर शेर पर ज़बरदस्त दाद मिली। उनकी दूसरी ग़ज़ल को भी खूब वाहवाही मिला।
साथ उसका जावेदाना चाहिए।
यानी मुझको क़ैद-ख़ाना चाहिए।
कब तलक बन कर मुसाफ़िर ही रहे,
अब हवा को भी ठिकाना चाहिए।

पूनम खत्री ने जब अपनी नई रचना पेश की।
एक तरफ़ा फ़ैसला हो गया,
मैं बुरा और वो भला हो गया।
कुछ बरस तो इम्हां ही चला,
और फिर ये सिलसिला हो गया।
उनकी ग़ज़ल को सुनकर दर्शक दीर्घा में बैठे लोग से वाह-वाह कहने से अपने आपको नहीं रोक पाए।

डॉ दमयंती शर्मा ‘दीपा’ ने माहिया कविता सुनाई और एक अद्भुत आनंद वर्षा कर श्रोताओं का दिल जीत लिया।
भारत की बिंदी है।
माँ सम है सबकी,
यह प्यारी हिंदी है।
सब इसका मान करो ।
हिंदी प्रेम सुधा,
इसका रस पान करो।

उन्होंने एक दोहा सदा बोझ है ढो रहे, फिर भी है चुपचाप। आँसू पीकर तृप्त हैं, वे तो हैं माँ-बाप।
इसे लोगों ने खूब पसंद किया।

डॉ. मेघा भारती मेघल ने दो रचनाएं पेश किया।
महज़ बातों से इश्क़ हुआ नहीं करता,
कभी आंखों में झाँकना भी ज़रूरी हैं।

उन्होंने ग़ज़ल के साथ साथ कुमाऊंनी भाषा में लिखा, कंपोज किया और गाया लोकगीत तरन्नुम में पेश किया। यह गीत उके एल्बम मैं तेरी मैना में है। गीत के बोल इस तरह हैं…
त्यर खुटा सलामा, मकै अपण बनै ले
ओ मेरी मीनुली मकै दिल में बसे ले।

गायिका-शायरा पूनम विश्वकर्मा ने एक गज़ल पेश की जिसे लोगों से खूब वाहवाही मिली।
मेरी मुश्किलें कुछ सरल कीजिए न।
न मिलने में यूं आजकल कीजिए न॥
बने आप मुझ बिन, तो फिर ना मिले क्यों।
बस एक प्रश्न मेरा ये हल कीजिए न॥

पूनम ने कन्या भ्रूण हत्या पर एक स्वरचित मार्मिक अवधी लोकगीत पेश किया, जिससे कन्या अपने माता पिता से अपनी हत्या न करने का निवेदन करती है।
कोखिया में हमके मुआवा जिन माई
हमहू के देखे दीं जहान।
ऐतने कसूर बा की बेटी हो गइनी
बेटा नियम रखबई धियान ऐ बाबूजी।।

डॉ. रश्मि चौकसे ने भी बेहतरीन रचना पेश की। एक नजर देखिए..
यारा तेरी याद
यारा तेरी याद, बड़ी दुखदाईवे।
तेरी याद में कितनी रैना गंवाईवे।।

उनकी दूसरी कविता का शीर्षक ‘आगोश’ था।
तेरी आगोश में आके
मैं कितना चैन पाती हूँ।
जब तेरे पास होती हूं
सब कुछ भूल जाती हूँ
तेरी आगोश में…

पेशे से चिकित्सक कवयित्री डॉ. वर्षा महेश ने भी सुंदर रचना पेश किया।
खिलते गुलाब चम्पा चमेली
जीवन को महकाते हैं
मन आंगन में सुगंध न कोई
खिला यहाँ कोई प्रसुन नहीं है
ये प्रीत का सावन मेरा नहीं है।

सविता दत्त सावी ने श्रृंगार रस की कविता सुनाई जो श्रोताओं को बहुत पसंद आई। उनकी कविता पर नज़र डालें…

दिल मेरा प्यार से सरोबार हो जाए

बादल आए घुमड़ कर
क़तरा-क़तरा सुखी का
मुस्कुराके जल में जलधार हो जाए।

ठंडी हवा चले इठलाकर
सरसों के फूलों से आकर
दामन मेरा गुल से गुलज़ार हो जाए।

यों पड़े मुझ पर बूँदें सावन की
अंतर मन में मेरे वीणा सी
खनकार हो जाए।

कोयल सा कूके मन मेरा
मैं नाचू बन के मोर-पपीहा
बूँदें मेरी पायल की झनकार हो जाए।

वरिष्ठ शायरा मोना अल्वी ने अपनी रचना से बड़ी ख़ूबसूरती से ग़ज़ल को परिभाषित किया। उनकी ग़ज़ल के दो शेर पर नज़र डालें…
नज़र से नज़र की बात हो तो ग़ज़ल होती है,
दिल से दिल की मुलाक़ात हो तो ग़ज़ल होती है।
नज़र झुकी तो सलाम लिया, नज़र उठी तो पैग़ाम ले लिया।
नज़र जो चुराई कभी मोना तो ग़ज़ल होती है।

कवयित्री सम्मेलन का आयोजन देश के नामचीन शायर देवमणि पांडेय और नवीन जोशी नवा के मार्गदर्शन में युवा कवि राजेश ऋतुपर्ण ने किया। इस बेहतरीन आयोजन में गायक आकाश ठाकुर और शायर अश्विनी मित्तल ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

प्रतिष्ठित कवि उदयभानु सिंह समेत मुंबई साहित्य जगत के चुनिंदा लोगों की उपस्थिति ने इस कवयित्री सम्मेलन के प्रबंधन में चार चांद लगा दिया।

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