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  • नमामि गंगे या नाकामी गंगे

    नमामि गंगे या नाकामी गंगे

    अब यह एक स्थापित तथ्य है कि यदि गंगाजल में वर्षों रखने के बाद भी खराब न होने का विशेष रासायनिक गुण है, तो इसकी वजह है इसमें पाये जाने वाली एक अनन्य रचना। इस रचना को हम सभी 'बैक्टीरियोफाॅज' के नाम से जानते हैं। बैक्टीरियोफाॅज, हिमालय में जन्मा एक ऐसा विचित्र ढांचा है कि जो न सांस लेता है, न भोजन करता है और न ही अपनी किसी प्रतिकृति का निर्माण करता है। बैक्टीरियोफाॅज, अपने मेजबान में घुसकर क्रिया करता है और उसकी यह नायाब मेजबान है, गंगा की सिल्ट। गंगा मूल की उत्कृष्ट किस्म की सिल्ट में बैक्टीरिया को नाश करने का खास गुण है। गंगा की सिल्ट का यह गुण भी खास है कि इसके कारण, गंगाजल में से काॅपर और क्रोमियम स्त्रावित होकर अलग हो जाते हैं।।

  • गणतंत्र दिवस, भारतीय संविधान और गणतंत्र के प्रति अपनी वचनबद्धता दोहराने का दिन

    गणतंत्र दिवस, भारतीय संविधान और गणतंत्र के प्रति अपनी वचनबद्धता दोहराने का दिन

    गणतंत्र दिवस हर वर्ष जनवरी महीने की 26 तारीख को पूरे देश में देश प्रेम की भावना से ओत-प्रोत होकर मनाया जाता है। भारत के लोग हर साल 26 जनवरी का बेसब्री से इंतजार करते हैं, क्योंकि 26 जनवरी को ही 1950 में भारतीय संविधान को एक लोकतांत्रिक प्रणाली के साथ भारत देश में लागू किया गया था। कहा जाए तो 26 जनवरी को ही हमारे गणतंत्र का जन्म हुआ। और भारत देश एक गणतांत्रिक

  • गांधी विचार पर आधारित हो नई शिक्षा नीति

    गांधी विचार पर आधारित हो नई शिक्षा नीति

    भारत अलौकिक आध्यात्मिक महापुरुषों की पुण्य भूमि है। कभी यह सोने की चिड़िया भी था। लॉर्ड मैकाले ने इसे सांस्कृतिक सम्पदा और नैतिक मूल्यों से युक्त आध्यात्मिक दैदीप्यमान स्वरूप में देखा था। अंग्रेज़ सत्ता ने उसके इस अभिमत को स्वीकार कर लिया था कि भारत की प्राचीन शिक्षण-पद्धति को इस प्रकार से परिवर्तित कर दिया जाय कि भारतीय यह सोचने लगे कि जो कुछ भी विदेशी एवं आंग्ल है वही श्रेष्ठ एवं महान है, इस तरह वे अपना आत्म सम्मान, आत्म गौरव तथा मूल संस्कृति को खो देंगे और वही बन जाएँगे जो हम अंग्रेज़ चाहते हैं- पूर्ण रूप से हमारे नेतृत्व के अधीन एक देश। यह सच्चाई है कि १८२ साल बाद भी स्वाधीन भारत की शिक्षा-प्रणाली में, मैकाले की शिक्षा-प्रणाली के मूल सार आज भी विद्यमान हैं। मैकाले की भारत में को ग़ुलाम बनाए रखने की

  • राज्यसभा की प्रासंगिकता पर सवाल क्यों?

    राज्यसभा की प्रासंगिकता पर सवाल क्यों?

    आम आदमी पार्टी के राज्यसभा उम्मीदवारों को लेकर विवाद होना और सवाल उठना स्वाभाविक है। इस मसले ने एक बार फिर राज्यसभा की उपयोगिता एवं प्रासंगिकता पर भी सवाल खड़े कर दिये हैं। भारत में लोकतांत्रिक प्रणाली के तहत जिस तरह की शर्मनाक घटनाएं घट रही हैं, इसमें आम आदमी पार्टी के द्वारा राज्यसभा सदस्य बनाने की स्थितियों ने एक दाग और जड़ दिया है। इस तरह की शर्मनाक स्थितियों की वजह से लोगों की आस्था संसदीय लोकतंत्र के प्रति कमजोर होना स्वाभाविक है। लोकतंत्र के मूल्यों के साथ हो रहे खिलवाड़ की वजह से भविष्य का चित्र संशय से भरपूर नजर आता है। मूल्यहीनता की चरम सीमा पर पहुंचकर राजनीतिक पार्टियां अलग-अलग विचारधारा एवं नाम का वर्गीकरण रखते हुए भी राष्ट्रीय हित की उपेक्षा करने के मामले में एक जैसी हैं। व्यक्तिगत एवं दलगत हितों को सर्वोपरि मानते हुए ये पार्टियां सर्वसाधारण जनता एवं राष्ट्र के हितों के साथ उपेक्षापूर्ण बर्ताव कर रही हैं। आम आदमी पार्टी ने सिद्धांतों एवं आदर्शों की दुहाई देने वाली पार्टियां के रूप में अपने आपको प्रस्तुत किया लेकिन वह न केवल राज्यसभा के सदस्य बनाये जाने के मामले में बल्कि अन्य व्यावहारिकता के धरातल पर स्वार्थपूर्ति की राजनीति में उलझी हुई नजर आई हैं। किसी भी कीमत पर वैध-अवैध तरीके अपनाकर सत्ता की प्राप्ति ही उसका एवं उसके राजनेताओं का लक्ष्य बन चुका है।

  • घर-आंगन में भी उगाएं सहजन

    घर-आंगन में भी उगाएं सहजन

    आज जब सब्ज़ियों के दाम आसमान छू रहे हैं और थाली में सब्ज़ियां कम होने लगी हैं। ऐसे में अगर घर में ही ऐसी सब्ज़ी का इंतज़ाम हो जाए, जो खाने में स्वादिष्ट हो और सेहत के लिए भी अच्छी हों, तो फिर क्या कहने। जी हां, हम बात कर रहे हैं सहजन की। गांव-देहात और छोटे-छोटे क़स्बों और शहरों में घरों के आंगन में सहजन के वृक्ष लगे मिल जाते हैं। बिहार की वैजयंती देवी कहती हैं कि सहजन में ख़ूब फलियां लगती हैं। वह इसकी सब्ज़ी बनाती हैं, जिसे सभी ख़ूब चाव से खाते हैं। इसके फूलों की सब्ज़ी की भी घर में बार-बार मांग होती है। वह सहजन का अचार भी बनाती हैं। अपनी मां से उन्होंने यह सब सीखा है। उनके घर में एक गाय है। अपनी गाय को वह सहजन के पत्ते खिलाती हैं। गाय पहले से ज़्यादा दूध देने लगी हैं। इतना ही नहीं, वह सब्ज़ी वालों को फलियां बेच देती हैं। वह बताती हैं कि एक सब्ज़ी वाला उनसे अकसर वृक्ष से सहजन की फलियां तोड़ कर ले जाता है। इससे चार पैसे उनके पास आ जाते हैं। उन्होंने अपने आंगन में चार और पौधे लगाए हैं, जो कुछ वक़्त बाद उनकी आमदनी का ज़रिया बन जाएंगे।

  • ये किसका और कैसा नववर्ष है?

    ये किसका और कैसा नववर्ष है?

    भारत व्रत पर्व त्यौहारों का देश है जिसका हर दिन कोई न कोई विशिष्टता लिए हुए होता है. कोई किसी महापुरुष का जन्मदिवस है तो कोई पुण्य तिथि. कोई फसल से सम्बंधित होता है तो कोई किसी खगोलीय घटना से सम्बन्धित. कोई समाज जीवन को प्रेरणा स्वरूप मनाया जाता है तो कोई किसी घटना विशेष को याद रख कर उससे सदैव ऊर्जावान बने रहने के लिए. एक बात तय है कि हमारे यहाँ कुछ भी यूं ही नहीं मनाया जाता बल्कि, प्रत्येक उत्सव/त्यौहार का कोई न कोई एक सामाजिक, वैज्ञानिक, आध्यात्मिक या राष्ट्रीय कारण अवश्य होता है. किन्तु हां! कालान्तर में हमारे देश में कुछ पर्व त्यौहार या परम्पराएं ऎसी भी घुस आईं जो हमारे इन सिद्धांतों से कभी मेल नहीं खातीं फिर भी हमने उन्हें अपना लिया. अंग्रेजी कैलेंडर के प्रथम दिवस यानी एक

  • अन्यथा सारी प्रगति को भ्रष्टाचार खा जाएगा

    अन्यथा सारी प्रगति को भ्रष्टाचार खा जाएगा

    देश में भ्रष्टाचार पर जब भी चर्चा होती है तो राजनीति को निशाना बनाया जाता है। आजादी के सत्तर साल बीत जाने के बाद भी हम यह तय नहीं कर पाये कि भ्रष्टाचार को शक्तिशाली बनाने में राजनेताओं का बड़ा हाथ है या प्रशासनिक अधिकारियों का? प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भ्रष्टाचार को समाप्त करने की योजनाओं को लेकर सक्रिय है, लेकिन वे इसके लिये अब तक राजनेताओं को ही निशाना बनाते रहे हैं, यह पहली बार हो रहा है कि प्रशासनिक अधिकारियों पर भी शिकंजा कसा जा रहा है। रिश्वत और सुविधा शुल्क लेने वाले अफसरों का पर्दाफाश करने के लिए केंद्र सरकार ने एक और सख्त कदम उठाया है। मेरी दृष्टि में यह एक सही दिशा में सही शुरुआत है।

  • यरूशलम विवाद : शिया-सुन्नी संघर्ष की अमेरिकी साजि़श

    यरूशलम विवाद : शिया-सुन्नी संघर्ष की अमेरिकी साजि़श

    ‘बांटो और राज करो’ की जिस नीति पर चलते हुए ब्रिटिश राज ने लगभग पूरे विश्व में अपने साम्राज्य का विस्तार कर लिया था ठीक उसी नीति का अनुसरण आज अमेरिका द्वारा किया जा रहा है। परंतु बड़े आश्चर्य की बात है कि दुनिया का हर देश तथा वहां के बुद्धिमान समझे जाने वाले शासक भी अमेरिका की इस चाल से वािकफ होने के बावजूद किसी न किसी तरह उसके चंगुल में फंस ही जाते हैं। यह और बात है

  • आइए, वंशवादी नेतृत्व के चंगुल से लोकतंत्र को बचाएं

    आइए, वंशवादी नेतृत्व के चंगुल से लोकतंत्र को बचाएं

    राजतंत्रीय शासन व्यवस्था का सबसे बड़ा दोष यही माना जाता है कि उसमें वंशानुगत नेतृत्व की परंपरा होती है। राजा का पुत्र या राजा द्वारा नामित व्यक्ति ही युवराज होता है तथा बाद में राजा। विवेक यह नहीं कहता कि किसी वंश में जो भी पैदा होगा उसमें शासन चलाने के लिए आवश्यक सारे गुण होंगे ही। उसमें आवश्यक क्षमताएं होंगी हीं। हालांकि राजतंत्र में भी अनेक राजा अपने पुत्रों या वारिसों में सबसे गुणी, सबसे क्षमतावान को प्रश्रय देते थे।

  • निजी अस्पतालों की लूट कब तक?

    निजी अस्पतालों की लूट कब तक?

    देश के निजी अस्पतालों में स्वास्थ्य की दृष्टि से तो हालात बदतर एवं चिन्तनीय है ही, लेकिन ये लूटपाट एवं धन उगाने के ऐसे अड्डे बन गये हैं जो अधिक परेशानी का सबब है। हमारे देश में जगह-जगह छोटे शहरों से लेकर प्रान्त की राजधानियों एवं एनसीआर तक में निजी अस्पतालों में मरीजों की लूट-खसोट, इलाज में कोताही और मनमानापन कोई नई बात नहीं है। विशेषतः देश के नामी निजी अस्पतालों की श्रृंखला में इलाज एवं जांच परीक्षण के नाम पर जिस तरह से लाखों रूपये वसूले जा रहे हैं, वह तो इलाज के नाम पर जीवन की बजाय जान लेने के माध्यम बने हुए हैं।

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