Tuesday, June 18, 2024
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सार्वजनिक स्तर पर भाषा का गिरता स्तर

सार्वजनिक विमर्श की भाषा का स्तर लगातार गिर रहा है। हाल ही में लोकसभा में भाजपा व बसपा सांसद के बीच अमर्यादित घटना हुई। मानहानिकारक शब्द कार्यवाही से निकाल दिए गए। राष्ट्र चिंतित है। मर्यादा विहीनता का सिलसिला नया नहीं है। कांग्रेस देश की सबसे पुरानी पार्टी है। कांग्रेस की तत्कालीन अध्यक्ष सोनिया गाँधी ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को ‘मौत का सौदागर‘ कहा था। सोनिया जी के अपशब्दों पर
प्रतिक्रिया हुई। अध्यक्ष राहुल गाँधी को सीख लेनी चाहिए लेकिन उन्होंने इसी परम्परा में प्रधानमंत्री को चोर कहा। राहुल की अमर्यादित टिप्पणी पर उनकी निन्दा हुई। वर्तमान अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने भी कोई सीख नहीं ली। उन्होंने प्रधानमंत्री को रावण कहा था। कुछ समय पहले सांसद शफीकुर्रहमान बर्क ने भी आपत्तिजनक बयान दिया था।

ए.आई.एम.आई.एम. के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी भड़काऊ आपत्तिजनक बयान देने के अभ्यस्त हैं। ओवैसी ने 2021 में पुलिस को धमकाते हुए चुनावी सभा में कहा था, ‘‘योगी मोदी हमेशा नहीं रहेंगे तब तुमको कौन बचाएगा।‘‘ मणिशंकर अय्यर ने भी भड़काऊ बयान दिया था। ओवैसी के भाई और तत्कालीन विधायक अकबरुद्दीन ओवैसी ने कहा था कि, ‘‘15 मिनट के लिए पुलिस हटा ली जाए, तो वे दिखा देंगे कि 25 करोड़ मुसलमान 100 करोड़ हिन्दुओं पर भारी पड़ सकते हैं।‘‘ उन्होंने श्रीराम की माता कौशल्या के बारे में भी आपत्तिजनक बातें कही थीं। तमिलनाडु के मंत्री उदयनिधि स्टालिन ने सनातन धर्म को कोरोना, मलेरिया और डेंगू बताते हुए इसे खत्म करने की घोषणा की थी। अमर्यादित वक्तव्यों से सार्वजनिक जीवन में कटुता बढ़ रही है। उत्तर प्रदेश में सनातन धर्म और रामायण के बारे में विवादास्पद टिप्पणियां जारी हैं। अमर्यादित भाषा प्रयोग से मर्यादित सामाजिक परिवर्तन नहीं होते।

सार्वजनिक बहस के गिरते स्तर पर सर्वोच्च न्यायालय ने भी गंभीर चिन्ता व्यक्त की थी। दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया की याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायालय ने कहा था कि, ‘‘यदि आप सार्वजनिक बहस को इस स्तर तक गिरा देंगे तो आपको अंजाम भुगतने होंगे।‘‘ सिसोदिया ने असम के मुख्यमंत्री के विरुद्ध मानहानिकारक टिप्पणियां की थीं। उनपर मुकदमा हुआ। इसी से राहत पाने के लिए वे सर्वोच्च न्यायालय गए थे। मानहानिकारक शब्द प्रयोग के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। संसद, विधानमण्डल सहित सार्वजनिक विमर्श के सभी मंचों पर होने वाली बहसें महत्वपूर्ण होती हैं। अपने विचार के पक्ष में लोकमत बनाना प्रत्येक दल और सामाजिक राजनैतिक कार्यकर्ता का अधिकार है।

संविधान निर्माताओं ने इसीलिए विचार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को मौलिक अधिकार बनाया था। सजग संविधान निर्माताओं ने राष्ट्रीय सम्प्रभुता, अखण्डता और लोकव्यवस्था को प्रभावित करने वाली अभिव्यक्ति पर संयम के बंधन भी लगाए थे। विचार आधारित लोकमत निर्माण के लिए संयमपूर्ण अभिव्यक्ति की आवश्यकता होती है। सभा गोष्ठी व तमाम राजनैतिक कार्यक्रम अभिव्यक्ति के मंच हैं। सम्प्रति अभिव्यक्ति के तमाम अवसर बढे हैं। फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम आदि विचार अभिव्यक्ति के नए मंच सृजन के अवसर उपलब्ध कराते हैं। यहाँ विचार सम्प्रेषण के सुन्दर अवसर हैं। इनमें व्यक्त विचार बहुत दूर तक जाते हैं। लेकिन इनका भी दुरूपयोग दिखाई पड़ता है। इनमें भी प्रायः शब्द संयम की मर्यादा का अभाव दिखाई पड़ता है। वाणी का संयम और शब्द का अनुशासन सार्वजनिक बहसों का सौंदर्य होता है।

सार्वजनिक विमर्श की भाषा संयमित ही होनी चाहिए। दल, समूह या अन्य संगठन परस्पर शत्रु नहीं होते। लेकिन शब्द अराजकता के कारण राजनैतिक दलतंत्र में शत्रुता का भाव दिखाई पड़ रहा है। शब्द अनुशासन और संयम के टूटने से पतन की श्रंखला बन गई है। अपशब्द उत्तेजित करते हैं। गाली जैसे जवाबी हमले होते हैं। अपशब्दों के प्रयोग से परस्पर घृणा बढ़ती है। इसे उचित ही ‘हेट स्पीच‘ कहा जा रहा है। इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों में होने वाली बहसों में अक्सर अपशब्द बोलने के दृश्य दिखाई पड़ रहे हैं। प्रतिभागियों में हाथापाई की नौबत भी दिखाई पड़ रही है। यह चिंताजनक है और लोकतंत्री वातावरण के विरुद्ध है। लोकतंत्र में स्वस्थ वाद विवाद संवाद जरूरी है। आलोचना और अपशब्द में भारी अंतर है। लोकतंत्र में आलोचना का महत्व है। अपशब्दों का नहीं। मूलभूत प्रश्न है कि गाली जैसे अपशब्द प्रयोग की अपरिहार्यता क्या है? क्या अपना पक्ष अपशब्दों के प्रयोग से ही व्यक्त किया जा सकता है? क्या अंग्रेजी व भारतीय भाषाओं में सम्मानजनक विरोध व्यक्त करने के लिए शब्द सामथ्र्य का अभाव है? क्या मानहानिकारक शब्द प्रयोग का कोई विकल्प नहीं है? क्या अपशब्द बोलने से ही राजनैतिक सम्भावनाएँ बढ़ती हैं?

भारतीय दर्शन चिन्तन में शब्द को ब्रह्म कहा गया है। महाभारत युद्ध से आहत व्यास ने कहा था कि, ‘‘शब्द अब ब्रह्म नहीं रहे।‘‘ शब्द केवल ध्वनि नहीं हैं। प्रत्येक शब्द के गर्भ में अर्थ होता है। अर्थ का ध्यान रखते हुए ही शब्द का प्रयोग किया जाता है। पतंजलि ने महाभाष्य में शब्द के सम्यक प्रयोग पर जोर दिया है, ‘‘शब्द का सम्यक ज्ञान और सम्यक प्रयोग ही अपेक्षित परिणाम देता है।‘‘ लेकिन भारत के सामाजिक जीवन में शब्द अराजकता का वातावरण है। विपरीत विचार के प्रति आक्रामक होना स्वाभाविक है। डॉ० राममनोहर लोहिया, अटल बिहारी वाजपेयी, मधुलिमये आदि अनेक सांसद तत्कालीन सरकार पर आक्रामक रहते थे। लेकिन उनके शब्द प्रयोग वाक् सौंदर्य प्रकट करते थे। विपक्षी राजनैतिक कार्यकर्ता भी उनसे प्रेरित होते थे। सम्प्रति अपशब्दों ने सुन्दर शब्दों को विस्थापित कर दिया है।

समाज का गठन भाषा से हुआ। परस्पर संवाद हुआ। सहमति और असहमति भी चली। भाषा संस्कृति की संवाहक है। समाज को सांस्कृतिक बनाने का काम भी संयमपूर्ण भाषा से ही संभव है। भाषा विज्ञानी मोलनिवसी ने 1923 में कहा था कि, ‘‘भाषा सामाजिक संगठन का काम करती है।‘‘ जर्मन भाषाविद् ने यही बात 1932 में बात दोहराई थी। ज्ञान, विज्ञान और दर्शन व राजनैतिक विचार भाषा के माध्यम से ही दूर दूर तक प्रवाहित होते हैं। शब्द मधुरता भारत के राष्ट्रजीवन की अभिलाषा रही है। अथर्ववेद (9.1) में प्रार्थना है, ‘‘हमारी वाणी मधुर हो। हम तेजस्वी वाणी भी मधुरता के साथ बोलें। वैदिक, पौराणिक साहित्य में मंत्रों, श्लोकों के छोटे विभाजनों को सूक्त कहा गया है। सूक्त वस्तुतः सु-उक्त हैं। सूक्त का अर्थ है सुन्दर कथन। सूक्तियां भी सुन्दर कथन हैं।

ऋग्वेद में प्रार्थना है कि, ‘‘हमारा पुत्र सभा में सुन्दर बोले और यशस्वी हो।‘‘

भारत का संविधान 2 वर्ष 11 माह 18 दिन की लम्बी बहस के बाद बना था। संविधान सभा में भिन्न भिन्न विचारधाराओं के महानुभाव थे। तमाम तर्क प्रतितर्क हुए लेकिन वाक् संयम अनुकरणीय था। मधुर शब्दों में ही अपनी बात कहने की प्रतिस्पर्धा थी। राजनैतिक नेता, सांसद और विधायक समाज को प्रभावित करते हैं। उनकी भाषा कार्यकर्ताओं को प्रभावित करती है। ऐसे प्रतिष्ठित पदधारकों को सोच समझ कर बोलना चाहिए। यूरोपीय विद्वान वालटर लिपिमैन ने यही बात दोहराई थी कि, ‘‘उच्च पदस्थ लोग संस्थाओं के संचालक प्रशासक मात्र नहीं होते। वे अपने देश के राष्ट्रीय आदर्शों और अभिलाषाओं के संरक्षक होते हैं। इनके आदर्श आचरण द्वारा देश लोगों का जोड़ नहीं बल्कि राष्ट्र बनता है।‘‘ सम्प्रति अपशब्द प्रदूषण का वातावरण है। सार्वजनिक विमर्श की छंदबद्धता नष्ट हो रही है। यह सब राष्ट्रीय चिन्ता का विषय है। सार्वजनिक जीवन से जुड़े सभी महानुभाव सक्रिय हों और वाणी संयम की राष्ट्रीय आवश्यकता व राष्ट्रीय चिन्ता पर ध्यान दें।

(लेखक भाजपा के वरिष्ठ नेता, चिंतक एवँ उत्तर प्रदेश विधान सभा के पूर्व अध्यक्ष हैं)

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