Tuesday, March 5, 2024
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हिन्दी या अन्य भारतीय भाषाओं की बोलियों को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने में कोई औचित्य नहीं है ।

संविधान की आठवीं अनुसूची में मैथिली, डोगरी आदि बोलियों को शामिल कर जो भूल या गलती हुई है उससे अन्य बोलियों के बोलने वालों के लिए रास्ता खुल गया है। अभी तो भोजपुरी और राजस्थानी बोलियों की आवाज़ उठी है, बाद में हिन्दी की अन्य बोलियों की भी आवाज़ उठेगी। वास्तव में हमारे अधिकतर नेता और राजनीतिज्ञ भाषा और बोली के परस्पर संबंधों और उनके अंतर को समझ नहीं रहे और न ही समझने की कोशिश कर रहे हैं। संविधान-निर्माताओं ने संविधान में जो 14 भाषाएँ जोड़ी थीं वे कुछ समझ कर ही जोड़ी थीं और बाद में सिंधी, मणिपुरी और नेपाली भाषाएँ जोड़ने में कोई तर्क था, बोलियों को तो जोड़ने में मात्र राजनैतिक हित था।

जिस हिन्दी का विकास करने, उसे संजोने और स्थापित करने में सौ साल से हमारे महापुरुष, राजनेता, समाज सुधारक, संत, साहित्यकार संघर्ष करते आए हैं और उसे राष्ट्रभाषा की पदवी दिलाने के लिए अपना सारा जीवन लगा दिया , उसी भाषा को तोड़ने और खंडित करने में स्वार्थी लोग कुप्रयास कर रहे हैं। हिन्दी को तोड़ने में लगेअँग्रेज़ीदाँ लोगों का सामना हम काफी अरसे से कर रहे हैं, उसे आज अपने लोग ही तोड़ने के लिए साजिश कर रहे हैं। जो हैंडी की रोटी खा रहे हैं वही उसी थाली में छेद ही नहीं, उसे खंड-खंड करने में लगे हैं। हिन्दी पर यह दोहरी मार है। वह हिन्दी जो जनपदीय, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपना परचम फैला चुकी है, उसे गिराने का कुप्रयास किया जा रहा है। यह दुर्भाग्य है हमारी हिन्दी का।

यहाँ यह उल्लेख करना उचित होगा कि हिन्दी या अन्य भारतीय भाषाओं की बोलियों को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने में कोई औचित्य नहीं है। हाँ, इन भाषाओं की बोलियों को समुचित सम्मान मिलना चाहिए और इनके संवर्धन तथा विकास के लिए भाषाविदों, साहित्यकारों औरबोली-भाषियों को संघर्ष करना होगा। स्कूलों और विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों में उन बोलियों में रचित साहित्य को भी जोड़ा जाए जो नहीं है। जैसे हिन्दी में इस समय पाँच बोलियों का साहित्य पहले से है और भी जोड़े जा सकते हैं। इसके साथ ही इन बोलियों के साहित्यकारों, भाषाविदों, विद्वानों आदि को भी सम्मान, पुरस्कार आदि प्रदान करने की व्यवस्था की जाए। ये सम्मान या पुरस्कार भाषा (हिन्दी) के अंतर्गत ही माने जाएँ। इससे भाषा और बोली में काफी हद तक वैमनस्य खत्म हो जाए गा और स्वार्थी लोगों के कुचक्र से भी बचा जा सके गा।

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साभार- वैश्विक हिंदी सम्मेलन, मुंबई
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