Wednesday, July 24, 2024
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हिन्दू राष्ट्र: तथ्य और भ्रांतियाँ: 1

ऐसे सभी लोग जो हिन्दू राष्ट्र के पक्ष में हैं, परन्तु उस विषय में किसी स्पष्टता से कतराते हैं, उनका प्रायः यह तर्क रहता है कि भारत तो हिन्दू राष्ट्र है ही, इसमें स्पष्टता क्या लाना?
यह इतना हास्यास्पद तर्क है कि पहली ही दृष्टि में यह तर्क देने वालों की अक्षमता और बहानेबाजी दिख जाती है। हिन्दू धर्म का पालन करने वाले लोग हिन्दू हैं, यह सर्वविदित है। तो इसके कारण क्या हिन्दू समाज में धर्म क्या है और अधर्म क्या है तथा धर्म का पालन किस प्रकार करना है और अधर्म से किस प्रकार बचना है, इसकी विवेचना नहीं होगी? स्पष्ट है कि यह विमर्श तो निरन्तर होता ही है। इसी प्रकार अपने संस्कार और इतिहास के कारण भारत हिन्दू राष्ट्र है, यह सत्य है परन्तु यह नितांत अपर्याप्त कथन है। भारत तो हिन्दू राष्ट्र उस समय भी था जब इसके एक हिस्से में कतिपय मुसलमान पिशाच मंदिरों को तोड़ रहे थे और जजिया लगा रहे थे तथा हिन्दू धर्म का पालन अपनी शक्ति भर रोक रहे थे। भारत तो हिन्दू राष्ट्र उस समय भी था जब आधे भारत में अंग्रेजों का कानून लागू था। इस दृष्टि से तो भारत विगत 76 वर्षों से भी हिन्दू राष्ट्र ही है। अर्थात कांग्रेस का शासन होना भी हिन्दू राष्ट्र है और कम्युनिस्टों तथा अन्य गुटों का शासन होना भी हिन्दू राष्ट्र है। उक्त तर्क देने वालों की बात के निष्कर्ष तो यही हैं।
ये निष्कर्ष कितने हास्यास्पद हैं, यह तो स्पष्ट है ही, पर ये कर्तव्यविमुखता और विचारशून्यता के भी द्योतक हैं, यह भी स्पष्ट है। क्योंकि जब हिन्दू समाज में पाप की अधिकता हो जाये या प्रमाद की अधिकता हो जाये या अधर्म की अधिकता हो जाये या धर्म से विमुखता हो जाये या आततायियों का शासन हो जाये, तब भी हिन्दू राष्ट्र है और जब रामराज्य हो या धर्मराज्य हो, तब भी हिन्दू राष्ट्र है, यह कथन स्वयं में शून्यवाद की ओर ले जाता है। इसीलिये इस पुस्तक में हमें यह चर्चा आवश्यक लगी कि हिन्दू राष्ट्र क्या है, वह कैसे साकार होगा और उसकी आवश्यकता क्यों है। उसकी राह में रोड़े क्या हैं और उसकी सिद्धि में सहायक शक्तियाँ कौन सी हैं तथा हिन्दू राष्ट्र के वाहक और माध्यम कौन लोग बनेंगे।
यह इसलिये भी आवश्यक है कि ऐतिहासिक घटनाक्रमों के कारण और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ सहित अनेक धर्मनिष्ठ संगठनों के प्रयासों के कारण नई पीढ़ी में ऐसा मानस बन गया है कि उसे हिन्दू राष्ट्र साकार करने की उत्सुकता हो गई है और वह इसके लिये सबकुछ करने को तैयार है। अतः यदि इस विषय में न्यूनतम स्पष्टता भी नहीं हुई तो हिन्दू राष्ट्र के नाम पर चित्रविचित्र प्रकार की राजनैतिक क्रियायें इस दावे के साथ होंगी कि हम हिन्दू राष्ट्र लाने के लिये काम कर रहे हैं। परिणामतः हिन्दू राष्ट्र के मार्ग में अवरोध ही पैदा होंगे।
राष्ट्र का अर्थ
 भारत हिन्दू राष्ट्र है, इस कथन पर हमने अधिक विमर्श आवश्यक नहीं समझा। परंतु सार रूप में यह वैदिक वचन स्पष्ट कर दिया है कि ‘विश’ अर्थात जन ही राष्ट्र है। ऐसी स्थिति में भारत हिन्दू राष्ट्र है, इस कथन का एक ही अर्थ है कि भारत के लोग सनातन धर्म का यानी उसके किसी न किसी पंथ का अथवा समस्त धर्मशास्त्रों के सामान्य सार का पालन कर रहे हैं। अतः स्पष्ट है कि भारत का उतना ही क्षेत्र हिन्दू राष्ट्र है और वह क्षेत्र तभी तक हिन्दू राष्ट्र है, जिस क्षेत्र में जब तक सनातन धर्म की साधना होती है और जीवन में उसका व्यवहार होता है। अन्यथा तो पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफगानिस्तान, अजरबेजान, तुर्कमेनिस्तान, ताजकिस्तान, कजाकिस्तान और उजबेकिस्तान – सभी को हिन्दू राष्ट्र कहा जायेगा और हास्यास्पद स्थिति उत्पन्न हो जायेगी।
हुआ यह है कि बचे हुये हिस्से में हिन्दू बहुल समाज होने के कारण और शिक्षा विदेशी प्रभाव वाली होने के कारण आधुनिक शिक्षित हिन्दुओं का अधिकांश हिस्सा इस विषय मंे कुछ सोचना नहीं चाहता और चाहता है कि कोई अन्य भी इस विषय में अधिक गहन विचार-विमर्श  नहीं करे। उसे डर लगता है कि ज्यादा विचार विमर्श होने पर हमारी वर्तमान स्थिति में कोई अंतर न आ जाये। यथास्थिति बनाये रखने के लिये लोग इस विषय में चर्चा से कतराते हैं और इस प्रमाद तथा आलस्य को ढंकने के लिये इतना कहकर छुट्टी पा लेते हैं कि भारत तो हिन्दू राष्ट्र है ही।
यह प्रमाद की भयानक दशा है। क्योंकि इसमें राम और रावण, कृष्ण और कंस, सनातन धर्म के पालक हिन्दू और ईसाई बन चुके हिन्दू या मुसलमान बन चुके हिन्दू, सबको बस इस तर्क की आड़ लेकर हिन्दू ही कह दिया जायेगा कि वे कह दें कि हम भी हिन्दू हैं। कुछ लोगों ने बीच में यह प्रयास भी किया था कि भारत के मुसलमान यह कह दें कि हम ‘‘हिन्दू-मुसलमान’’ हैं जिसका अर्थ केवल इतना है कि वे हिन्द क्षेत्र के मुसलमान हैं। इसी प्रकार यह भी प्रयास हुआ है कि भारत के ईसाई यह कह दें कि हम हिन्द के ईसाई हैं। बस इतना होने से प्रसन्नता के साथ भारत का हिन्दू राष्ट्र होना सार्थक मान लिया जायेगा। स्पष्ट है कि यह घोर तमस की दशा है।
एंग्लों सेक्सन लॉ और विदेशी किस्म के राजकीय ढांचे के साथ चल रहे शासन को हिन्दू राष्ट्र नहीं कहा जा सकता। ऐसे शासन से शासित समाज संस्कार से आंशिक रूप से हिन्दू निश्चय ही माने जायेंगे। परन्तु उनकी राजनीति में सनातन धर्म की अभिव्यक्ति नहीं है, यह स्पष्ट होने से राजनीति में हिन्दुत्व का अभाव ही माना जायेगा। ऐसी किसी स्थिति को हिन्दुत्व कहना अतिचार होगा, जिसमें शासक और प्रशासक तथा विधिक्षेत्र के लोग सनातन धर्म और उसके धर्मशास्त्रों से पूरी तरह अनजान या उदासीन या विमुख रहें तथा ईसाई या प्रबुद्ध यूरोप के विनम्र अनुसरणकर्ता रहें। यह तो किसी भी शब्द को अर्थहीन बना डालने का प्रयास है। (क्रमशः)
(लेखक ऐतिहासिक व राष्ट्रवादी विचारों पर नियमित लेखन करते हैं)
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