Thursday, February 22, 2024
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रामजी के राज्याभिषेक की भाँति पूरे राष्ट्र को साँस्कृतिक सूत्र में बांधने का अद्भुत अभियान

Ramesh Sharma
पाँच लाख गाँवों को रामलला प्राणप्रतिष्ठा समारोह का आमंत्रण और पीले चावल
अयोध्या में भगवान राम का राज्याभिषेक साधारण नहीं था । उसमें पूरे भारत के सभी क्षेत्रों और समाजों की सहभागिता थी । अब वही स्वरूप रामजन्मभूमि पर रामलला प्राणप्रतिष्ठा में भी देखने को मिलेगा । इसके लिये भारत के सभी पाँच लाख गाँवों को पीले चावल के साथ आमंत्रण भेजा गया है जिसका वितरण भी आरंभ हो गया है ।
रामजन्मभूमि निर्मित हो रहे भव्य मंदिर में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा समारोह भी त्रेता में भगवान राम के राज्याभिषेक की भाँति भव्य और असाधारण होगा । पाँच सौ वर्षों के लंबे संघर्ष और लाखों प्राणों के बलिदान के बाद आये इस अवसर पर पूरे देश के सनातनियों की सहभागिता ठीक उसी प्रकार होगी जैसी रामजी के राज्याभिषेक के अवसर पर थी ।
वनवास काल के बाद अयोध्या लौटे भगवानराम का राज्याभिषेक एक शासक का पदारूढ़ होने अथवा लंका पर विजय का उत्सव आयोजन भर नहीं था । वह पूरे भारत राष्ट्र के सांस्कृतिक, सामाजिक क्षेत्रीय एकत्व का स्वरूप था । इसकी तैयारी दोनों प्रकार से की गई थी । अयोध्या में रामजी के स्वागत के लिये भरतजी ने सभी समाजों, संतों और शासन प्रतिनिधियों को एकत्र किया था तो श्रीलंका से लौटते समय राम जी भी विभिन्न समाज, शासक और ऋषियों संतों को आग्रह पूर्वक अपने साथ लाये थे ।
वस्तुतः रामजी का अवतार सामाजिक संगठन, साँस्कृतिक पुनर्जागरण और मानवीय मूल्यों की स्थापना के लिये हुआ । संपूर्ण धरती के प्राणियों को अपना परिवार मानना, जीने और जीने दो के सिद्धांत पर जीवन जीना मानवीय स्वभाव है जबकि दूसरे की धन संपत्ति और का स्त्रियों का हरण करना आसुरी प्रवृत्ति है । सबका उनके मौलिक स्वरूप का सम्मान मानवीय स्वभाव है और सबको अपने रंग जैसा बनाना आसुरी लक्ष्ण। लंका रावण की नहीं थी । कुबेर की थी । लेकिन रावण बलपूर्वक अधिकार करके स्वामी बन गया था । मानवों के अशक्त और असंगठित होने से ही आसुरी शक्तियाँ प्रबल होतीं हैं।
रामजी ने जीवन भर संपूर्ण भारत राष्ट्र के निवासियों को उनके मौलिक और क्षेत्रीय संस्कृति के साथ संगठित करने में बिताया । इसकी झलक उनके राज्याभिषेक आयोजन में दिखती है । रामजी का वह राज्याभिषेक समारोह पूरे भारत के राष्ट्रीय स्वरूप का स्वरूप प्रतिबिंब था। और भारत राष्ट्र के उसी सांस्कृतिक, सामाजिक क्षेत्रीय स्वरूप के दर्शन 22 जनवरी को अयोध्या में होने जा रहे जन्मभूमिस्थल पर बने मंदिर में रामलला के प्राण प्रतिष्ठा समारोह में होंगे। इसके लिये अयोध्या से भारत के सभी पाँच लाख गाँवों के लिये आमंत्रण और पीले चावल भेजे गये हैं। भारत के विभिन्न प्रांतों और उपप्राँतों का अपना समाजिक जीवन है । बोली और शैली में भी कुछ अंतर है । अयोध्या से विधिवत पूजन के बाद जो आमंत्रण पत्र और अन्य सामग्री विभिन्न प्रांतों में भेजी गई है वह उनकी स्थानीय भाषा और परंपरानुरूप है ।
 श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र न्यास ने आमंत्रण और अक्षत के साथ जो पत्रक तैयार किया है उसमें रामलला की प्राण प्रतिष्ठा के दिन अपने नगर, मुहल्ले और गांव के प्रमुख मंदिर में दीप जलाकर उत्सव मनाने का आग्रह किया गया है । चूकि सभी लोगों का उस दिन अयोध्या पहुंचना संभव नहीं है । यह यातायात के साधनों और अयोध्या में ठहरने आदि की व्यवस्था की व्यवहारिक कठिनाइयाँ हैं। इसलिये  श्रृद्धालुओं से अपने गाँव में ही उत्सव मनाने और आयोजन से जुड़ने की अपेक्षा की गई है ।
न्यास द्वारा पत्रक और आमंत्रण भेजने के इस कार्य में विश्व हिन्दु परिषद सहित अनेक सामाजिक, सांस्कृतिक और स्वयंसेवी संगठन सक्रिय हो गये हैं। विशेषकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता आमंत्रण पत्र वितरण का समन्वय कर रहे हैं । यदि यह कहा जाय कि रामजन्म भूमि केलिये चले निर्णायक आँदोलन में  राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भूमिका केन्द्रीभूत चेतना के रूप रही हो अनुचित न होगा । उसी प्रकार संघ के कार्यकर्ता रामलला की प्राण प्रतिष्ठा आयोजन की तैयारी में सक्रिय हैं। प्रयास है कि 22 जनवरी को अयोध्या में जन्मभूमि मंदिर में रामलला प्राण प्रतिष्ठा आयोजन के साथ देशभर के सभी पाँच लाख गांवों में उत्सव आयोजन हो और प्रमुख मंदिरों में टी वी आदि के माध्यम से सभी श्रृद्धालु समारोह का सीधा प्रसारण देख सकें। ताकि देशवासी आयोजन से सीधे जुड़ सकें। त्रेता युग में लंका विजय के बाद हुये भगवान राम के राज्याभिषेक की भाँति इस प्राण प्रतिष्ठा आयोजन से भी पूरे देशवासियों को साँस्कृतिक रूप से जोड़ने की व्यवस्था की दृष्टि से पूरे भारत को 45 प्रांतों में बांटा गया है । और व्यवस्था केलिये प्रभारी अथवा समन्वयक भी निश्चित किये गये हैं। आमंत्रण पत्र जिस प्रांत में भेजे गये हैं वह उसी प्रांत की भाषा में हैं । विभिन्न प्रान्तीय भाषाओं में दो करोड़ आमंत्रण पत्र तैयार कराये गये हैं।विश्व हिन्दु परिषद और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सहयोग से ये अक्षत कलश और आमंत्रण पत्र विभिन्न प्रांतों में पहुँच गये हैं तथा वितरण कार्य आरंभ हो गया है ।
जन्मस्थान मंदिर से पूरे देश को साँस्कृतिक और सामाजिक रूप से जोड़ने का यह पहला प्रयास नहीं है । आँदोलन और कारसेवा केलिये भी देशभर से कार्यकर्त्ता गये थे । शिला पूजन और निर्माण केलिये देशभर की सभी पवित्र नदियों का जल भी अयोध्या भेजा गया था ।
अब इसी शैली में रामलला प्राण प्रतिष्ठा समारोह के आमंत्रण पत्र समस्त देशवासियों को भेजे गये हैं। जो भगवान राम के अवतार हेतु के अनुरूप हैं । लगातार आक्रमणों और आक्राताओं के विध्वंस के बीच यदि भारत राष्ट्र की संस्कृति जीवन्त है तो वह साँस्कृतिक जाग्रति से संभव हुई । और इसकी रक्षा और सामाजिक संगठन के एकत्व से ही संभव है । किसी भी राष्ट्र और उसकी स्वाधीनता के अमरत्व के लिये जितना आवश्यक स्वत्व और स्वाभिमान जागरण होता है । उतना ही आवश्यक सामाजिक संगठन भी है । आसुरी शक्तियों से मानवता की मुक्ति केलिये रामजी का यही संदेश उनके अभियान से झलकता है । वे नारायण के अवतार हैं। वे जहाँ हैं वहीं से दुष्टों का अंत कर सकते हैं, उनकी भृगुटि झपकते ही प्रलय हो सकती है । फिर वे अवतार लेते हैं, वन वन भटकते हैं, निषात, किरात, वानर भालू सबसे सहयोग लेते हैं। स्वाभाविक है वृ मनुज अवतार लेकर संदेश देना चाहते हैं समाज के संगठन और सशक्तीकरण का । यही संदेश उनके राज्याभिषेक समारोह में झलकता है और संदेश रामलला प्राण प्रतिष्ठा समारोह की तैयारी में झलकती है ।
(लेखक राष्ट्रवादी व ऐतिहासिक विषयों पर लिखते हैं) 
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