Saturday, July 13, 2024
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हिंदी का ज्ञान बनाएगा कला पारखी!

रोमा पटेल अमेरिकी सरकार के भाषा प्रोग्राम के माध्यम से हिंदी सीख कर अपने कला शोध कौशल को बेहतर बना रही हैं।

रोमा पटेल जब न्यू यॉर्क सिटी में एक आर्ट ऑक्शन हाउस में काम कर रही थीं, तो उनकी दिलचस्पी भरतीय कला के अध्ययन और उसमें विशेषज्ञता हासिल करने में हो गई। उन्होंने पिछली सर्दियों में न्यू यॉर्क सिटी की कोलंबिया यूनिवर्सिटी में आधुनिक और समकालीन कला के साथ दक्षिण एशियाई कला में विशेषज्ञता में मास्टर्स डिग्री के लिए पंजीकरण कराया। वह कहती हैं, ‘‘मैंने कोलंबिया को कई कारणों से चुना- विशेषज्ञता प्रोग्राम और साउथ एशिया इंस्टीट्यूट के साथ मजबूत भाषा प्रोग्राम।’’

पटेल भारतीय अमेरिकी हैं, लेकिन जल्द ही उन्हें यह वास्तविकता पता लग गई कि ‘‘भारत के संदर्भ में विद्वता हासिल करने और कला इतिहास अध्ययन में भाषा के कारण सीमाएं बन जाती हैं।’’ हिंदी के ज्ञान के बिना उन्हें अपने शोध के लिए जानकारियों को जिस क्षमता के साथ समझना होता था, उसमें काफी कम रह जाती थी।

वह कहती हैं, ‘‘मुझे याद है कि अपनी युवा अवस्था के दौरान मैं भारत आती रही, लेकिन मेरे आसपास जो चर्चाएं होती थीं, उन्हें मैं समझ नहीं पाती थी, सड़कों पर लगाए गए जानकारी बोर्ड, या फ़िल्में। बड़े होने के दौरान गुजराती का अध्ययन करने के बावजूद मुझे स्वाभाविक तौर पर हिंदी समझ नहीं आती थी, न ही मुझे इसे सीखने ओर इसका अभ्यास करने के स्थान थे।’’

पटेल ने कोलंबिया यूनिवर्सिटी में मध्य-पूर्व, दक्षिण एशियाई और अफ्रीकी अध्ययन विभाग में हिंदी-उर्दू प्रोग्राम के कोऑर्डिनेटर और हिंदी भाषा के वरिष्ठ व्याख्याता राकेश रंजन से संपर्क साधा। उनकी सलाह पर पटेल ने अमेरिकी विदेश मंत्रालय के क्रिटिकल लैंग्वेज स्कॉलरशिप (सीएलएस) प्रोग्राम के एडवांस्ड बिगिनर पाठ्यक्रम में शुरुआती विद्यार्थी के तौर पर आवेदन किया। रंजन ने उन्हें अमेरिकी शिक्षा मंत्रालय के फ़ॉरेन लैंग्वेज एंड एरिया स्टडीज (एफएलएएस) प्रोग्राम के बारे में भी बताया। वह कहती हैं, ‘‘मुझे दोनों में ही चयनित होने का सम्मान हासिल हुआ और मैंने अमेरिकन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडियन स्टडीज (ए.आई.आई.एस.) जयपुर में दो महीने के पूर्णकालिक सीएलएस प्रोग्राम पाठ्यक्रम से शुरुआत की।’’ सीएलएस प्रोग्राम अगस्त 2023 में समाप्त हो गया। अब वह कोलंबिया में अपने शिक्षक रंजन के साथ फॉरेन लैंग्वेज एंड एरिया स्टडीज प्रोग्राम की शुरुआत करेंगीं और पूरे शैक्षिक सत्र के दौरान हिंदी पढ़ेंगीं।

पटेल याद करती हैं, ‘‘हिंदी बेहद ही जटिल भाषा है और कई बार ऐसा लगता है कि बोलने के बजाय खामोश रहना बेहतर है। हालांकि पाठ्यक्रम के शुरुआत में व्याकरण की गलतियों का पता लगने के बाद मैं हतोत्साहित हो गई, लेकिन मैंने मेहनत करना जरी रखा।’’ ए.आई.आई.एस. में उनके अध्यापक मददगार और धैर्यवान थे। ‘‘जब भी ज़रूरत होती थी, वे मदद कर यह सुनिश्चित करते कि मैं ऐसा महसूस करूं कि मैंने सही बोला है और मेरी बात समझ ली गई है। गर्मियों के आगे बढ़ने के साथ मुझे अपने संवाद कौशल को लेकर आशंका नहीं रही- मैंने अक्सर पाया कि मैं अपनी हिंदी का अभ्यास करने के लिए लोगों के बीच बातचीत शुरू कर देती।’’

पटेल का कहना है कि भारत के संबंध में ए.आई.आई.एस. द्वारा इतिहास के अध्ययन में मदद देना बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि बहुत-सा शोध अभी भी लंबित है। ‘‘हिंदी पढ़ने वाले अमेरिकी विद्यार्थियों की मदद कर वे अमेरिकी विद्यार्थियों के लिए अत्यावश्यक शोध के लिए अवसर तैयार करते हैं।’’ हालांकि पटेल ने अमेरिका में गुजराती और स्पेनिश पढ़ी है, लेकिन वह कभी ऐसे प्रोग्राम में शामिल नहीं रहीं, जहां पर भाषा कौशल के आधर पर भाषा अध्ययन को कई भागों में बांटा गया हो। वह कहती हैं, ‘‘एडवांस्ड बिगिनर क्लास में कुछ विद्यार्थी भाषा को पढ़ने के लिहाज से बेहतर थे, तो कुछ अन्य की संवाद क्षमता बेहतर थी। छोटे समूहों में कौशल आधारित कक्षाओं के माध्यम से हमें वैयक्तिक ध्यान मिल जाता था, जिससे यह सुनिश्चित हो सका कि हम भाषा के हर पहलू के लिहाज से प्रगति कर सकें।’’

पटेल का मानना है कि हिंदी का अध्ययन सिर्फ भारतीयों से संवाद करने के लिए ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि यह अमेरिका में बड़ी संख्या में रहने वाले भारतीयों से संवाद के लिए भी महत्वपूर्ण है। वह कहती हैं, ‘‘अगर आप न्यू यॉर्क में रह रहे हों, तो हिंदी हर जगह दिखती है- ट्रेन में, सड़क पर और कोलंबिया में लोग हर दिन हिंदी बोलते हैं।’’ पटेल जब अमेरिका में अपने घर पर होती हैं, तो फ़िल्में देखती हैं, लघु कहानियां पढ़ती हैं और परिवार के साथ हिंदी के अभ्यास का प्रयास करती हैं। उनकी कोशिश रहती है कि भारत में अपने परिवार के सदस्यों से फोन पर बात करने और अमेरिका में हिंदी भाषियों से मुलाकात के दौरान वह हिंदी बोलें।

भारत में हिंदी सीखने और दैनिक जीवन में इसके इस्तेमाल को लेकर पटेल के पास कई संस्मरण हैं। एक बार ट्रेन से जोधपुर से जयुपर जाते वक्त उन्हें और उनके मित्रों को पता चला कि वे राजस्थान के एक सांसद के सामने बैठे हैं। वह कहती हैं, ‘‘कई घंटे तक हम अपने-अपने परिवारों के बारे में बातें करते रहें, अपने पालन-पोषण, राजनीति और राजस्थान के ताज़ा मुद्दों पर बातचीत हुई। हम हिंदी में न सिर्फ बातचीत कर पाए, बल्कि हमें अपने वार्तालाप से राजस्थान के जीवन के बारे में अर्थपूर्ण अंतर्दृष्टि मिली।’’ पटेल ने बहुत-सी आर्ट गैलरियों के शुभारंभ और संगीत कार्यक्रमों में भाग लिया है और ऐतिहासिक स्थलों का दौरा किया है। वह कहती हैं, ‘‘मैंने स्थानीय कलाकारों, इतिहासकारों और कला संग्राहकों से मुलाकात की, जिन्होंने अपने नज़रिये और अंतर्दृष्टि को मेरे साथ साझा किया, जिससे भारतीय कला, संस्कृति और इतिहास को लेकर मेरी अवधारणा इस तरह से समृद्ध हुई कि वह काम न्यू यॉर्क में क्लासरूम में बैठकर कला इतिहास की पढ़ाई से नहीं हो सकता था।’’ पटेल कहती हैं, ‘‘मैंने जाना कि हिंदी अध्ययन का मेरा अनुभव उस देश को ज्यादा जानने की मेरी योग्यता से सीधा जुड़ा है, जहां मैं अपनी पूरी ज़िंदगी जाती रही।’’

( चित्र मेंः रोमा पटेल (मध्य में) जयपुर में अपने मेज़बान परिवार (कर्नल साहिब राज और श्रीमती सुनीता ) के साथ। (फोटोग्राफः रोमा पटेल)

साभार- https://spanmag.com/hi/ से

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