Tuesday, April 23, 2024
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राम मंदिर बन रहा है मंथराएँ विलाप कर रही हैं

अंजन कुमार ठाकुर

आप सब ने यह अनुभव किया होगा कि हर मां अपने बच्चों को अक्सर काला टीका लगा देती है। निर्माणाधीन भवनों में सामने से डरावना मुखौटा, काली हांडी , पुराने जूते काला कपड़ा आदि लटका दिए जाते हैं और दुकानों पर भी ऐसा ही कुछ नजर उतारने का यंत्र नाम से कुछ लटका हुआ होता है और यह सब दरअसल इसलिए होता है कि उसे बढ़ते हुए बच्चों को, बनने वाले मकानों को या चलती हुई दुकानों को किसी की बुरी नजर ना लगे। अब देखिए कि राम मंदिर बन रहा है, अल्पसंख्यक आराधना एक्शन कमीटी का सियापा बन्द हो चुका है, दो भाइयों की पार्टी का कौशल्या मायका शोध कार्य समाप्त हो गया है और दशरथ के राजप्रासाद के किस कमरे में माता कौशल्या का लेबर रूम स्थापित था ये विवाद भी अनुच्छेद 370 बन चुका है, सर्वोच्च न्यायालय के जज भी आधी रात में जग कर भी अल्पसंख्यक आराधना स्थल की एक टूटी हुई ईंट के पक्षमें अपने दिए गये फैसले का तीया पाँचा नहीं कर पा रहे हैं…

मतलब राम के मंदिर पर न माता कौशल्या काला टीका लगा रही हैं न म्लेच्छों की बयानबाजी का नजर बट्टू या चश्मेबद्दूर लटक पा रहाहै तो नियति ने अनगिनत मंथराओं को उत्पन्न कर दिया है जिसे पता तो है कि “कोई नृप होय हमे का हानी” पर कैकेयी रूपी मीडिया के सामने दो संवैधानिक वरदानों की मांग मंदिर प्रबंधन कमीटी रूपी राजा दशरथ के सामने रखवाने का जी तोड़ प्रयास कर रही है उसमें पहला है धर्मनिरपेक्षता की रक्षा और दूसरा कर्मकांड की शुचिता पर इस बार महामंत्री सुमन्त लाचार नहीं है। उसने राममंदिर पर इन्हीं कुचेष्टाओ का नजरबट्टू लटका दिया है।

मंथराएं भी रो गा कर थक जाएंगी और कैकेयी को भी समझ आ जाएगा कि पुत्र तो राम जैसा हीं होना चाहिए… भरत तो भाई के रूप में हीं आदर्श है।

दूसरी बात जब त्यौहारों में लड्डू बनता है तो हलवाई उसमें थोड़ी काली मिर्च भी मिलाता है ताकि मीठी बूंदियों के बीच अचानक पिसने वाला ये तीखा दाना लड्डू की मिठास से आप का मन फिरने नहीं दे और लड्डू खाने वाला और अधिक स्वाद लेकर लड्डू खाने लगता है।

धर्मगुरुओं का यह छिद्रान्वेषण बस लड्डू में मिली हुई काली मिर्च हीं हैं ताकि राममंदिर लीला की मिठास मन ना फेर दे। यह तो सीता स्वयंवर के बीच परशुराम लक्ष्मण संवाद जैसा है। ध्यान दें इस ब्रह्माण्ड में अनोखी घटना थी जब विष्णु के दो अवतार आमने सामने थे। अनुज लक्ष्मण के व्यंग्य बाण भी थे पर हम न तो परशुराम की निंदा करते हैं और न लक्ष्मण की तुलनात्मक प्रशंसा। दोनों की अपनी अपनी भूमिका है। एक पुरातन विराट व्यक्तित्व परंपराओं की रक्षा के कारण पिनाक की रक्षा के लिए सन्नद्ध था तो एक आधुनिक व्यक्तित्व पुरातनता का रोना रोने के बदले नया कीर्तिमान बनाने का समर्थक था।

भारत दोनों का समर्थन में है और दोनों अनिंद्य हैं साथ हीं आवश्यक भी। नालंदा का अवशेषों को भी सहेजिए और नये संसद भवन को भी सराहिए।

इस विवाद के तर्कों का अनुपान करें पर इन आमंत्रित विद्वानों की निंदा न करें। राम यंत्र के नैऋत्य कोण में रावण की भी पूजा होती है।
यह तो रामसेतु है। गिलहरी का योगदान भी प्रभु की अंगुलियों की छाप के रूप में हमारे सामने है।
और बाबा तुलसी कह गए हैं-
सचिव, वैद्य, गुरु तीन जौ प्रिय बोलहिं भय आस। राज, धरम, तन तीनि कर होइ बेगिहीं नास।।

अर्थात सचिव, वैद्य और गुरु अगर लोकप्रिय होने के लोभ या लोगों के क्रोध का शिकार होने के डर से मात्र मीठा मीठा या कर्ण प्रिय बातें हीं बोलते है और सच नहीं बताते वे क्रमशः राज्य, स्वास्थ्य और धर्म की त्वरित हानि का कारण हीं बनते हैं।

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