Sunday, March 3, 2024
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सेंगोल (राजदंड) की प्रासंगिकता

1947 में पंडित जवाहरलाल नेहरू को अंतिम गवर्नर-  जनरल( महा राज्यपाल) लॉर्ड लुई माउंटबेटन द्वारा भेंट किया गया सैंगोल( राजदंड) की प्रासंगिकता हैं। वर्तमान में इसकी उपादेयता है कि 1947 में ब्रिटिश क्रॉउन का प्रतिनिधि भारत के प्रधानमंत्री को सत्ता हस्तांतरण का प्रतीक सैंगोल को प्रदान करता हैं। भारत में जीवंत लोकतंत्र व वृहद लोकतंत्र हैं। भारत में नवोदित देशों, खासकर1960 के बाद स्वतंत्र हुए देशों को लोकतंत्र की पाठशाला व  लोकतांत्रिक प्रक्रिया का मूलभूत प्रशिक्षण दिया हैं। भारत बृहद एवं सर्वाधिक आबादी वाला लोकतंत्र/ जनतंत्र है ,लेकिन लोकतंत्र की जननी नहीं हैं। वैश्विक स्तर पर लोकतंत्र की जननी ग्रेट ब्रिटेन ही है ब्रिटेन (अब इंग्लैंड)  में सरकार व विपक्ष पूर्णतः  जिम्मेदार होते है, दुर्भाग्य से भारत बृहद  लोकतंत्र का आदर्श  व्यवस्था होते हुए विपक्ष की मौलिक उपादेयता दिन प्रतिदिन गिरती जा रही है, क्योंकि विपक्ष संसद के बजाय सड़क पर सक्रिय हैं। मुद्दों के बजाय तर्कहीन व अवैज्ञानिक  भूमिका निभा रही हैं। विपक्ष वैकल्पिक सरकार की भूमिका में असफल हैं। भारत 1948 तक अधिराज्य (डोमिनियन स्टेटस) रहा है, क्योंकि भारत को विदेश नीति,रक्षा नीति और संचार नीति पर स्वतंत्र निर्णय लेने का अधिकार नहीं था।( संप्रभुता का अभाव), इसलिए राजदंड(सेंगोल)  की  उपादेयता व  प्रासंगिकता हैं।

राजदंड( सैंगोल), अधिकार का एक प्राचीन प्रतीक है ,सदियों से विभिन्न सभ्यताओं में प्रयोग किया जाता है। प्राचीन काल में राजा सर्वोच्च  होते हुए कुछ राजदंड कानूनों से सीमित था। यह एक समझौते/ अनुबंध/ संविदा का प्रतिनिधित्व करता है कि जून, 1948 के बाद भारत स्वतंत्र और संप्रभु भारत हैं। भारत बैदेशिक नीति, संचार नीतिऔर सामरिक  विषयों पर स्वतंत्र निर्णय ले सकता हैं।

भारत में संसद सर्वोच्च पंचायत है, अर्थात संसद में सुशासन( गुड गवर्नेंस) के विषय पर विचार – विमर्श होती हैं। संसदीय कामकाज की सरलता, सुगमता और इसके परिणाम की गुणवत्ता को संसद विधिक पहचान प्रदान करती हैं। भारत में संसद के तीनों सत्र ही नहीं, बल्कि कई अंतरिम समितियों के कार्य, समितियां मूलतः तकनीकी कौशल सांसदों का प्रतिनिधित्व करते हैं, और मौलिक कमियों को रेखांकित करते हैं, क्योंकि इन समितियों से निकले सारतत्व (Zeist)  निति-  निर्माण और विधान के लिए उपयोगी वमार्गदर्शक होती हैं।दुर्भाग्य से विपक्ष की विध्वंसक उपादेयता के कारण संसदीय प्रदर्शन में गिरावट आ रही हैं।

भारत के सांसदों को इंग्लैंड के संसदीय चरित्र से सतर्क होना चाहिए, क्योंकि इंग्लैंड की खोखली राजशाही अब  प्रतीक मात्र रह चुकी है।  दिन प्रतिदिन संसदीय चरित्र का पतन राजशाही का खोखला व्यक्तित्व सिद्ध हो रहा हैं। इंग्लैंड की राजशाही  और संसद धूमधाम और शान शौकत का प्रतीक , संसद घोटाले, चारित्रिक निकृष्ठा और दोहरे मापदंडों के लिए वैश्विक स्तर पर ध्यान का केंद्र बनी हुई हैं। भारत के संसद को ऐसे सामयिक  पतन से बचना चाहिए।

(लेखक राजनीतिक विश्ले़षक हैं)

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