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वेद विदुषी ममता, उशिज तथा घोषा परिवार जिसकी तीन पीढ़ियों ने वेद की सेवा की

भारत भूमि ऋषियों मुनियों, तपस्वियों और त्यागियों की धरती रही है| जिस काल खंड में विश्व के अन्य देशों के लोग वनमानुष की तरह रहते थे, उस काल में यहाँ के पुरुष ही नहीं अपितु यहाँ की नारियां भी उच्चकोटि की विद्वानˎ हुआ करतीं थीं| जिन परिवारों से यह नारियाँ सम्बन्ध रखतीं थीं, उन परिवारों में से अनेक परिवार इस प्रकार के हुए हैं कि जिनके परिवार से एक नहीं तीन तिन पीढ़ियों कि महिलाओं ने वेद के लिए काम किया और इतनी विद्वानˎ हो गई कि उनहोंने वेद के लिए इतना अधिक कार्य किया कि उनका नाम वेद की ऋषिका के रूप में वेद के किसी न किसी खंड के साथ जुड़ गया| इस प्रकार की वेद विदुषी नारियों में ब्रह्मवादिनी ममता, ब्रह्मवादिनी उशिज तथा ब्रह्मवादिनी घोषा, यह तीन इस प्रकार के नाम है जो पीढ़ी दर पीढ़ी एक ही परिवार से सम्बन्ध रखतीं थीं और जिन्होंने अपने जीवन का बड़ा भाग वेद के गूढ़ रहस्यों को खोलने के लिए कार्य किया और इस में सफल होकर इन्होंने वेद के मन्त्रों को इतने सरल तथा विस्तार पूर्वक खोल कर रख दिया कि इनका नाम वेद के किसी सूक्त अथवा मन्त्र की ऋषिका के रूप में जुड़ गया| आओ आज हम इन तीनों के समब्न्ध में अत्यन्त अल्प रूप में परिचय प्राप्त करने का प्रयास करें|:-

ब्रह्मवादिनी ममता
ब्रह्म्वादिनी ममता के संबंध में गहन अध्ययन के पश्चातˎ जो अल्प सी जानकारी मिलती है, उसके अनुसार ममता जी सुप्रसिद्ध ऋषि दीघतमा की माता थी| उस ने उच्च कोटि का वैदिक ज्ञान प्राप्त किया था और अपने जीवन का बड़ा भाग वेदों के गूढ़ रहस्यों को खोलने तथा सुलझाने में ही लगाया| बाल्यकाल से ही वेद ज्ञान से उन्हें अनुराग था जो विवाह होने के पश्चातˎ भी पति से मिलने वाले सहयोग के कारण बना रहा और वह नियमित रूप से वेद के रहस्यों को समझने और इन्हें खोलने में लगीं रहीं|

वेद के रहस्यों को जानने, समझने और खोजने के लिए उसने अत्यधिक पुरुषार्थ भी किया| उसके पुरुषार्थ का ही यह परिणाम था कि ऋग्वेद संहिता के प्रथम मंडल के दशम सूक्त के रहस्यों को जानकर इन्हें खोल पाने में यह सफल हुईं और इस कारण इन्हें ऋग्वेद के प्रथम मंडल के दशम सूक्त की ऋषिका होने का गौरवपूर्ण स्थान प्राप्त हुआ और आज भी ऋग्वेद के प्रथम मंडल के अंतर्गत आने वाले इस दशम सूक्त पर ब्रह्मवादिनी ममता जी का नाम बड़े गौरव के साथ प्रकाशित किया जाता है| उसने जो इस पर खोज की, उसके अनुसार इन सूक्त का संक्षिप्त भाव यह था कि:-

“हे दीप्तिमानˎ! असंख्य चोटियों वाले और देवताओं को बुलाने वाले अग्नि! दूसरे अग्नी की सहायता से प्रकाशित होकर आप इस मानव स्तोत्र को सुनिए| श्रोतागण ममता के सदृश्य हो अग्नि के उद्देश्य से इस मनोहर स्तोत्र को पवित्र घृत की भाँति अर्पण करते हैं|”

इस सूक्त के इस सुन्दर और मनोरम भाव से इस सूक्त का अर्थ अत्यंत सरल कर दिया है इस देवी ने! हम इस देवी के सदा आभारी रहेंगे|

ब्रह्मवादिनी उशिज
ऊपर वर्णित ब्रह्मवादिनी ममता जी की सन्तानों में एक संतान का नाम दीर्घतमा था| ममता का यह पुत्र दीर्घतमा भी एक उच्चकोटि के ऋषि हुए हैं| इन्हीं दीर्घतमा ऋषि की पत्नी का नाम ही उशिज था| यद्यपि यह विदुषी नारी भी बाल्यकाल से ही वेद के गूढ़ रहस्यों का निचोड़ खोजने में लगी थी किन्तु विवाह होने के पश्चातˎ पति का स्नेह और सास का आशीर्वाद भी उसे वेद के गूढ़ रहस्यों को सुलझाने के लिए अत्यधिक प्रेरित कर रहा था| परिवार से वसद मार्ग की और प्रेरणा मिलने से इसका उत्साह द्वीगुणित हो गया और यह नारी भी वेद के रहस्यों को खोलने के लिए एकाग्रचित हो कर कार्य करने लगी| जब यह नारी वेद के रहस्यों को सुलझाने का कार्य कर रही थी, उन्हीं दिनों इस विदुषी नारी ने एक पुत्र को जन्म दिया| माता तथा दादी के विचारों के प्रभाव से इस बालक का जीवन भी पुरुषार्थी बन गया| इस कारण ही यह बालक आगे जा कर सुप्रसिद्ध महर्षि काक्षीवानˎ बन पाने में सफल हुआ| अर्थातˎ यह बालक आगे चल कर महर्षि कक्षीवानˎ के नाम से जाना गया|

ब्रह्मवादिनी उशिज ने संतान होने पर भी वेद के रहस्यों को खोजने तथा इन्हें समझाने का कार्य अनवरत बनाए रखा| उसकी सूझ और उसका यह पुरुषार्थही था कि एक दिन वह ऋग्वेद के प्रथम मंडल के मन्त्र संख्या ११६ से लेकर मन्त्र संख्या १२१ तक के मन्त्रों के बहुत ही सरल और सुबोध विधि से रहसयों को खोल पाने में सफल हुई और इन मन्त्रों में क्या है, यह सब स्पष्ट रूप से इस महिला ने जन जन के सामने खोलकर रख दिया| इस कारण उसे इन मन्त्रों की ऋषिका होने का सम्मान मिला और उसका नाम आज भी वेद के इन मन्त्रों के साथ जुडा हुआ मिलता है|

ब्रह्मवादिनी घोषा
वेद की व्याख्याकर्त्री के रूप में जिस ममता ने अपने परिवार में एक माला बनानी आरम्भ की थी आगे चलकर वेद विदुषी उशिज के नाम से उस ममता की पुत्रवधू ने उस माला के एक मोती के रूप में स्वयं को पिरो दिया| इस उशिज के परिवार में यह जो परम्परा चल चुकी थी, उस परम्परा को आगे आने वाली पीढ़ियों ने भी बनाए रखा और आगे चलकर इस परिवार में उशिज की पौत्री तथा ममता की पडपौत्री, जिस का नाम घोषा था, ने भी अपने परिवार की परम्परा को आगे बढाते हुए कार्य किया|

जिस कांक्षीवानˎ ऋषि को वेद विदुषी उशिज ने जन्म दिया था, इसी ऋषि कांक्षीवानˎ की कन्या का नाम ही घोषा था| घोषा बहुत सुन्दर तथा परिवार की परम्परओं के अनुसार वेद विदुषी स्त्री थी और निरंतर वेद के रहस्यों को खोलने के कार्य में लगी रहती थी| दुर्भाग्य से किसी कारण इसे कोढ़ का भयंकर रोग हो गया| इस रोग के कारण जब यह विवाह के योग्य आयु में आई तो इसका विवाह संभव नहीं हो पाया| भयंकर रोग से ग्रस्त होने पर भी घोषा ने अपने साहस को खोने नहीं दिया और अपने पुरुषार्थ से जहाँ वह वेद के रहस्यों को जानने का प्रयास करती रहती थी, वहां वह रोग सेनिदान पाने का उपाय भी करती रहती थी| उसके इस पुरुषार्थ से अश्विनी कुमारों की उस पर कृपा बनी और वह इस भयंकर रोग से मुक्त हो गई| अब रोग मुक्त होने से उसमे और भी अधिक पुरुषार्थ करने की शक्ति आ गई|

अपने पुरुषार्थ तथा एकाग्रचितता के कारण कुछ ही समय मे यह अत्यधिक वेद विदुषी तथा ब्रह्मवादिनी के रूपों में सुप्रसिद्ध हो गई| वेद के जिस खंड पर यह घोषा कार्य कर रही थी, उस खंड में उसने स्वयं ही ब्रह्मचारिणी के रूप में ही ब्रह्मचारिणी कन्या के कर्तव्यों के दर्शन भली प्रकार कर लिए| ब्रह्मचारिणी कन्याओं के सम्बन्ध में उसे यह ज्ञान वेद के दो सूक्तों से मिला|

घोषा ने रोग से मुक्त होकर अश्विन कुमारों के प्रति आदर प्रकट करते हुए इस प्रकार कहा, “ हे अश्विनकुमारा! आपके अनुग्रह से आज घोषा परम सौभाग्यवती हुई है| आपका आशीर्वाद से घोषा के स्वामी के भले के लिए आकाश से प्रचुर वर्षा हो जिससे खेत लहलहा उठें| आपकी कृपा दृष्टि के भावी पति की शत्रु की हिंसा से रक्षा करे| यौवन-सुन्दर पति को पाकर घोषा का यौवन चिरकाल तक अक्षुण बना रहे|”

“ हे अशिवनकुमारो! पिता जैसे संतान को सतˎ-शिक्षा देते हैं, वैसे आप भी मुझ को सतˎ-शिक्षा दें| मैं ज्ञान और बुद्धिहीन नारी हूँ| आपका आशीर्वाद मुझ को दुर्गति से बचावें| आपके आशीर्वाद से मेरे पुत्र पौत्रादि सुप्रतिष्ठित होकर जीवन यापन करें| पतिगृह में पति की प्रिय प्यारी बनूँ|”

इस प्रकार रोगरहित होने के पश्चातˎ जिन अश्विनकुमारों के कारण उसका रोग नष्ट हुआ था, उनके प्रति कृतज्ञता करते हुए इस घोषा ने भविष्य में वेद विद्वानˎ पति तथा पुरुषार्थी और वेद की ही शिक्षाओं के अनुरूप कार्य करने वाले पुत्र की भी कामना की है|

इस प्रकार अस्वस्थ तथा भयंकर रोग से ग्रसित इस घोषा ने वेद के रहस्यों को खोलने के लिए भरसक कार्य किया और रोग से निदान पाने के लिए भी कार्य किया और अपनी होने वाली संतानों के भी विद्वानˎ होने की कामाना की| अत: अपने पुरुषार्थ के कारण वह इन दोनों कार्यों में ही सफल रही| इस कारण वेद विदुषी नारी के रूप में आज वह अमर है|

डॉ. अशोक आर्य
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२०१०१२ गाजियाबाद उ. प्र. भारत
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