Tuesday, June 25, 2024
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भारत – नेपाल संबंध:एक पुनरावलोकन

भारत और नेपाल के बीच विवेकपूर्ण और व्यवहारिक पड़ोसी नीति और अंतरराष्ट्रीय संबंधों के साथ भारत ने एक राष्ट्र के रूप में अपनी सफलतम साख को साबित की है जिसकी क्षमताओं को क्षेत्र की सुरक्षा और समृद्धि सुनिश्चित करने के साथ-साथ तकनीकी विकास, पारिस्थितिकी तंत्र और व्यापारिक संबंधों को विकसित करने में बहुमूल्य योगदान के लिए दोनों देशों के अंतर्संबंध भागीदार के रूप में महत्वपूर्ण है। पिछले कुछ दशकों से भारत – नेपाल संबंधों ने क्षेत्रीय विवाद की चुनौतियों का सामना किया है, क्योंकि यह आर्थिक सुरक्षा और वैदेशिक हितों पर केंद्रित है। इतिहास, भूगोल,रोटी – बेटी संबंध और सनातन संस्कृति सदियों से दोनों पड़ोसियों के बीच संबंधों का मार्गदर्शन करने वाले प्रमुख कारक हैं ।भारत और नेपाल के बीच साझा हितो के मुद्दों से निपटने के लिए व्यवहारिकता ने विभाजनकारी शक्तियों द्वारा कभी-कभी पैदा किए गए तनाव के बावजूद दोनों पड़ोसी देशों के बीच सद्भाव का आपसी संबंध बना रहा है।

सन 1950 में भारत और नेपाल के बीच हस्ताक्षरित शांति और परस्पर मैत्री संधि ने दोनों देशों के बीच संबंधों का मार्गदर्शन करने और शांति,स्थायित्व और परस्पर एकता स्थापित करती रहती है ।सामाजिक और आर्थिक मुद्दों को संशोधन करके और इन संबंधों को संबोधित करने के अलावा इसका रणनीतिक महत्व है, क्योंकि तिब्बत (बफर स्टेट) पर चीन के कब्जे के बाद विदेशी आक्रमण से बचाव के लिए इस पर हस्ताक्षर किए गए थे। भारत और नेपाल के बीच मुक्त सीमा अंतर्संबंध का भारत के साथ-साथ नेपाल पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ा है। भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र के अलगाववादियों को हथियारों की आपूर्ति करने, क्षेत्रीय अखंडता को सीमा पार के माध्यम आघात करने और प्रतिबंधित अप्रवासन ने नेपाल की जनसंख्या की संरचना और अर्थव्यवस्था को प्रभावित किया है, जिसके कारण इसने विदेशियों द्वारा अचल संपत्ति की खरीद पर प्रतिबंध लगा दिया है। 1990 में भू – राजनीतिक परिवर्तनों ने विकसित पश्चिम के साथ आर्थिक एकीकरण पर ध्यान केंद्रित करने वाली भारत की विदेश नीति को निर्देशित किया है। चीन ने सॉफ्ट पावर दृष्टिकोण और लोगों से लोगों( ट्रैक – 3डिप्लोमेसी) के संपर्क के माध्यम से नेपाल में प्रभाव बढ़ाया है।लिपुलेख – कालपानी मुद्दे और नेपाली संसद द्वारा कैटोग्राफिक परिवर्तनों के समर्थन में क्षेत्र में भारत के ऐतिहासिक प्रभुसत्ता को चुनौती देने के लिए वामपंथी नेपाली सरकार के दावे का संकेत दिया है।

पूर्व प्रधानमंत्री और प्रख्यात साहित्यकार स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेई जी कहते थे की अंतराष्ट्रीय संबंधों में मित्र बदले जा सकते है,लेकिन पड़ोसी नहीं।वैश्विक स्तर पर क्षेत्र नीति अध्ययन और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर व्यवहारिक अध्ययन के तथ्यों के आंकड़ों से स्पष्ट होता है कि अंतराष्ट्रीय/वैदेशिक संबंध स्थिर नहीं होते है,क्योंकि राष्ट्र – राज्यों के संबंध परस्पर हितों और बहुपक्षीय संबंधों पर आधारित होता है।इसके अतिरिक्त भारत और नेपाल के संबंध परिवर्तनों के साथ भी प्रगतिशील और सदभाव पर आधारित रहे है।2016से नेपाल के सांसदों की भारत यात्रा की बारंबारता से दोनों देशों के बीच आपसी सहयोग में तीव्रता आई है। जून, 2023 में नेपाली प्रधानमंत्री की भारत यात्रा के दौरान आर्थिक और विकास सहयोग पर सात समझौतों पर हस्ताक्षर किए गए थे ।

इन महत्वपूर्ण समझौतों में सीमा पर पैट्रोलियम पाइपलाइन ,नेपाल द्वारा भारत के माध्यम से बांग्लादेश को पन बिजली की आपूर्ति ,एकीकृत चेक पोस्ट और भुगतान तंत्र का विकास था। इन सभी ने बदलते परिवेश में भारत और नेपाल के संबंधों में आपसी विश्वास को बढ़ाया है। नेपाल के रक्षा आधुनिकीकरण , संयुक्त सैन्य अभ्यास प्रशिक्षण और आपदा प्रबंधन के लिए भारत के समर्थन के साथ-साथ दोनों देशों के बीच रक्षा क्षेत्र में सहयोग काफी मजबूत है । भारतीय सेना की गोरखा रेजीमेंट के सैनिकों का एक वर्ग वर्तमान में नेपाल से चयनित किया जाता है, यह भारत और नेपाल के बीच आपसी सद्भाव का सर्वोत्तम उदाहरण है। सेवानिवृत सैन्य कर्मियों को स्थानीय पेंशन भुगतान कार्यालयों के माध्यम से भारत द्वारा पेंशन प्रदान की जाती है।

भारत और नेपाल के बीच संबंधों का एक महत्वपूर्ण निर्धारक तत्व दोनों देशों की सेनाओं के बीच काफी अच्छे संबंध और संबंधों की विश्वसनीयता का कारक है। भारत में नेपाली सेना को उसके आधुनिकीकरण और पुनर्गठन के लिए मदद प्रदान किया है।2011 से दोनों देशों ने मुख्य रूप से जंगल- युद्ध ,गोरिल्ला युद्ध और उग्रवाद विरोधी अभियानों पर संयुक्त सैन्य अभ्यास किया है। इसके पश्चात उत्तराखंड के आपदा प्रवण क्षेत्र और हिमालय के भू- वैज्ञानिक आपदा प्रवण क्षेत्र में अंतर क्रियाशीलता तक बढ़ाया गया है ।नेपाल और भारत में बारी-बारी से दिवार्षिक रूप से आयोजित” सूर्य किरण” संयुक्त सैन्य अभ्यास ने दोनों सेनाओं के बीच आतंकवादी विरोधी अभियानों और जंगल युद्ध के अनुभव को साझा करने का अवसर प्रदान किया है। सूचना साझा करने के साथ-साथ ऐतिहासिक सैन्य और रणनीति के संबंध, आंतरिक और बाहरी तनाव के बावजूद मजबूत हुए हैं।

बड़ी संख्या में छोटी और बड़ी नदियां जिनमें सिंचाई और बिजली की भारी क्षमता है, नेपाल से भारत में बहती हैं। गंगा नदी बेसिन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा भी दोनों देशों के बीच में है। दोनों देशों के बीच जल संसाधनों, बाढ़ प्रबंधन ,जल प्लावन और जल विद्युत में सहयोग से संबंधित मुद्दों पर चर्चा करने के लिए 2008 में त्रि स्तरीय द्विपक्षीय संबंध तंत्र स्थापित किया गया था, फिर भी बाढ़ प्रबंधन अस्थिर बना हुआ है। नेपाल और भारत के बीच 1971 के बिजली विनियम समझौते के अनुसार, ट्रांसमिशन इंटर कनेक्शन के माध्यम से भारत के सीमावर्ती क्षेत्रों में बिजली का संयत्र विकसित किया जाता है, जिसका उपयोग बिजली व्यापार के लिए भी किया जाता है। 2014 में हस्ताक्षरित बिजली व्यापार समझौते ने दोनों देशों के बीच बिजली ग्रिड कनेक्टिविटी और बिजली व्यापार के सीमा पर संरक्षण को मजबूत किया है। द्विपक्षी सहयोग इस क्षेत्र पर ध्यान केंद्रित करने के साथ-साथ आगे बढ़ा है, क्योंकि भारत ने नेपाल को त्रिपक्षीय व्यवस्था के तहत भारतीय बुनियादी ढांचे का उपयोग करके बांग्लादेश को बिजली बेचने की अनुमति प्रदान की है।

भारत में मोतिहारी और नेपाल में अमलेखगंज को जोड़ने वाली भारतीय तेल निगम द्वारा निर्मित और वित्त पोषित एक सीमा पर्व पेट्रोलियम उत्पाद पाइपलाइन 2019 में चालू की गई थी। कृषि के लिए जल संसाधनों का उपयोग करने के अलावा 2018 से भारत और नेपाल ने कृषि अनुसंधान विकास तकनीकी और शिक्षा के लिए भागीदारी की है ,जिससे दोनों देशों की कृषि अर्थव्यवस्थाएं लाभान्वित और पुष्पित पल्लवित हुई है। भारत स्वास्थ्य ,जल संसाधन और शिक्षा सहित दूर दराज के क्षेत्र में बुनियादी ढांचे के विकास के लिए नेपाल की सहायता कर रहा है। वित्त वर्ष 2019-20 में नेपाल को सहायता बजट के तहत कुल आर्थिक सहायता 1200 करोड़ रुपए की थी। भारत की विकास सहायता में नेपाल में भूकंप के बाद की परियोजनाओं के लिए लाइन आप क्रेडिट भी शामिल है।

दोनों देशों के बीच ठोस द्विपक्षीय व्यापार के अलावा भारतीय कंपनियां नेपाल में सबसे बड़ी निवेशक हैं, इसके अलावा नेपाल में कई भारतीय उपक्रम है। भारतीय सहायता मिशन 1954 में नेपाल भर में विकास परियोजनाओं का समर्थन करने के लिए स्थापित किया गया था। तत्कालीन स्थिति में भारत के समर्थन से नेपाल में कनेक्टिविटी, शिक्षा, सिंचाई ,जल विद्युत, सौर ऊर्जा और स्वास्थ्य देखभाल आदि के लिए बुनियादी ढांचे का विकास हुआ है ।वर्ष 2003 से त्वरित निर्माण वाली छोटी परियोजनाएं शुरू की गई हैं।

कालापानी – लिपियादुरा – लिपुलेख ट्राई जंक्शन क्षेत्र पर विवाद को लेकर दोनों देशों के बीच सफल कूटनीतिक और राजनयिक प्रयास फिलहाल के लिए सीमित है ,लेकिन यथा स्थिति(स्टेटस क्यो) को बनाएं रखने के लिए दोनों देशों के बीच निरंतर जुड़ाव और सहयोग आवश्यक है। दोनों देशों के मध्य विश्वास की कमी, नेपाल के घरेलू मामलों में भारत का घोषित हस्तक्षेप, चीन के साथ इसके बढ़ते मुख्य संबंध मुख्य विषय वस्तु हैं ,जिनसे सीमा जल संसाधन, छिद्रपूर्ण सीमा अवैध व्यापार और जातीय मुद्दों पर विवाद सामने आए हैं। विवाद प्रबंधन तंत्र को मजबूत करने के साथ-साथ विश्वास की कमी को आर्थिक विकास के लिए नियमित वार्ता और सक्रिय भागीदारी के साथ पूरा किया जाना चाहिए। संस्थागत वार्ता तंत्र के माध्यम से विचार- विमर्श अब तक तनाव को नियंत्रित करने में सफल रहा है, लेकिन राजनीतिक नेताओं को विकास पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए जिसका नेपाल के नागरिक समाज और अर्थव्यवस्था पर दूरगामी व्यापक प्रभाव पड़े ।

प्राचीन भारत के नीति विशेषज्ञ कौटिल्य ने ठीक ही कहा है कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों में राष्ट्रीय हित के बिना कोई मित्रता नहीं होती है, जो मुख्य रूप से आर्थिक ,राजनीतिक और क्षेत्रीय सुरक्षा है। उन्होंने पड़ोसी देशों से निपटने के लिए छह नीति का उल्लेख किया था, जिसमें से पहले तीन शांतिपूर्ण हैं और अंतिम विकल्प युद्ध है। भारत नेपाल के साथ अपने संबंधों में शांतिपूर्ण दृष्टिकोण को प्राथमिकता देता है और पड़ोसियों के साथ भी इसी नीति का पालन करता है। विकास के लिए मजबूत आर्थिक संबंधों और सहयोग को प्राथमिकता देना भारत और नेपाल के लिए मुख्य प्राथमिकता है, जो भविष्य में नेपाल के साथ-साथ भारत के राष्ट्रीय हित का भी केंद्र बिंदु होगा।

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