Tuesday, April 23, 2024
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राम मंदिर के लिए मोदी की कृष्ण नीति

अयोध्या एयरपोर्ट का नाम महर्षि वाल्मीकि के नाम पर कर देने से कुछ व्याकुल भारत घायल हो गए हैं। बहुत ज़्यादा घायल। इन सब का कहना है कि एयरपोर्ट का नाम अगर राम के नाम से बदल कर कुछ करना ही था तो तुलसीदास करना था। महर्षि वाल्मीकि के नाम क्यों किया ? महर्षि वाल्मीकि क्या तुलसीदास से बड़े हैं? महर्षि वाल्मीकि का अयोध्या से क्या संबंध है? इन घायलों का बड़ा दुःख यह है कि यह निर्णय राजनीतिक है। वोट के लिए किया गया है। दलित वोट के लिए किया गया है।

यह बात भी निर्विवाद रुप से सही है। इस से बिलकुल ऐतराज नहीं है। लेकिन इन व्याकुल भारत टाइप घायलों को कोई बताने वाला नहीं है कि अगर महर्षि वाल्मीकि न होते तो तुलसीदास कहां होते? कहां होते रामायण के अन्य रचनाकार भी। महर्षि वाल्मीकि रामायण के बीज हैं। बाक़ी सब वृक्ष। बीज है तो वृक्ष है। निर्मम सच यह भी है कि राम मंदिर सिर्फ़ पूजा-पाठ के लिए नहीं बन रहा। राजनीति और इस से जुड़ा वोट भी एक बड़ा फैक्टर है। तो क्या इस बिना पर राम मंदिर बनना ही नहीं चाहिए ?

तो क्या राम मंदिर बनना ही नहीं चाहिए, यह भी राजनीति नहीं है? सब से ज़्यादा खलबली तो कुछ कुंठित लेखकों, कवियों में मची हुई है। उन्हें लगता है कि उन के प्रतिरोध की रोजी-रोटी, मोदी ने उन से छीन ली है। अब वह कैसे जिएंगे, प्रतिरोध के बिना। अयोध्या में रहने वाले एक कवि तो अपनी एक टिप्पणी में अपनी व्यथा कहते हुए अपना दुःख लिख गए हैं: हमारा हौसला देखिए कि हम अयोध्या में हैं। गोया अयोध्या में नहीं, नरक में रह रहे हों। सोचिए कि विकसित अयोध्या में रहने में अगर तकलीफ है तो भारत में भी रहने की तकलीफ कल होगी ही। यह तो कुछ वैसे ही है जैसे एक लेखक 2014 में चुनाव के पहले कह गए कि मोदी अगर प्रधान मंत्री बन गया तो मैं देश छोड़ दूंगा। अलग बात है, मोदी प्रधान मंत्री बने और वह देश में रहे। पूरी बेशर्मी से।

सच तो यह है कि राम को जब वनवास हुआ था, त्रेता में तो वह भी राजनीति थी। बाबर ने मंदिर ढहा कर मस्जिद बनवाई, वह भी आक्रमणकारी राजनीति थी। बाबरी ढांचा गिराया गया, वह भी राजनीति थी। राम मंदिर बन रहा है, यह भी राजनीति है। राम मंदिर का विरोध भी राजनीति है। दूषित राजनीति। दिक़्क़त यह है कि मोदी विरोध अब राम मंदिर का विरोध के रुप में उपस्थित है। मोदी की यही बड़ी ताकत है। मोदी विरोध, कभी भारत विरोध, कभी राम मंदिर विरोध में उपस्थित कर मोदी को ताक़तवर बनाने का सबब बना गया है। इन घायल मूर्खों को यह अभी तक समझ ही नहीं आ रहा।

तब जब कि मोदी ने राम मंदिर के लिए राम की नीति का नहीं, कृष्ण की नीति का उपयोग किया है। क्यों कि मोदी को मालूम था कि राम राज के लिए कृष्ण नीति के बिना कुछ होने वाला नहीं। इतना कि कुछ साल बाद जब मोदी भारत की सत्ता से हटेगा तब तक भारत की जनता की आदत कृष्ण नीति में तब्दील हो चुकी होगी। आंखें, पूरी तरह खुल चुकी होगी। फिर इन घायल व्याकुल भारत लोगों का क्या होगा? एयरपोर्ट का नाम महर्षि वाल्मीकि और उज्ज्वला गैस की दस करोड़वीं लाभार्थी अयोध्या की मीरा माझी के घर पहुंचना भी राजनीति का ही हिस्सा है। वोटबैंक की बाजीगरी का ही हिस्सा है। मोटर साइकिल बनाने, बढ़ई का काम करने, धान रोपने जैसी प्रायोजित फ़ोटोग्राफ़ी से यह राजनीति नहीं होती। मोहब्बत की दुकान का साइन बोर्ड लगा कर, नफ़रत का सामान बेचने की क़वायद से राजनीति नहीं होती।

राजनीति तो अब राम या कृष्ण नीति से ही होगी भारत में। ज़्यादा से ज़्यादा चाणक्य नीति से। बाबर या औरंगज़ेब की नीति से हरगिज़ नहीं। मुंह में राम, बगल में छुरी से नहीं। महर्षि वाल्मीकि और मीरा माझी राजनीति की पुरानी सीढ़ी है। प्राथमिकता देखिए और प्रयाग के कुंभ मेले में कभी स्वच्छकारों के चरण धोने का दृश्य याद कीजिए। ग़रीब सुदामा के चरण धो कर ही, कृष्ण, कृष्ण होते हैं। कृष्ण ऐसे ही जीतते हैं। और राम वाया केवट और शबरी। केवट नदी पार करवाता है, शबरी जूठे लेकिन मीठे बेर खिलाती है। इस बेर को उज्ज्वला की लाभार्थी मीरा की मीठी चाय में अगर नहीं देख पाए तो आप बहुत अभागे हैं।

साभार sarokarnama.blogspot.com

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