Saturday, July 20, 2024
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Homeदुनिया मेरे आगेआधुनिक जीवन का श्रापः नदियों में बढ़ता प्रदूषण

आधुनिक जीवन का श्रापः नदियों में बढ़ता प्रदूषण

मानवीय संस्कृति के लिए नदियों को ईश्वरीय वरदान माना जाता है। पृथ्वी पर जीवन का आधार नदियां है।भारत में प्राचीन काल से नदियां सर्वदा पूजनीय और श्रद्धा की धारक रही हैं ।नदी को साक्षात शक्ति तथा भक्ति का प्राकट्य माना गया है। ईश्वर के पश्चात नदी का विशेष स्थान है। अर्थव्वेद में नदी को माता कहा गया है । नदी मेरी माता है जो हमें जल रूपी दूध प्रदान करती है, धरा पर नदियां सुरक्षित हैं तो जीवन भी सुरक्षित है। जीवनदायिनी नदियां व्यक्ति को जल मार्ग ही नहीं बल्कि वर्षा के जल को सहेज कर धरती के नमी को भी बनाए रखते हैं। महर्षि मनु ने नदी के स्थान को अत्यंत गौरवपूर्ण बताया है। उपनिषदों में नदी को प्रथम स्थान प्रदान किया गया है। नदी सभी गुरुजनों में सर्वोच्च है ।

महाभारत में गंगा जी की उपादेयता को बताते हुए कहा गया है कि परशुरामजी क्षत्रिय विनाशक होते हुए भी गंगा माता के निर्देश पर देवव्रत को शिक्षा प्रदान किए थे। नदियां परम गुरु हैं। ” मैं स्वयं अपने संस्कारों ,चारित्रिक सद्गुणों ,कर्तब्यनिष्ठा और दायित्वाभार के लिए अपने गंगास्वरूपा माता का प्रत्येक दिवस को स्मरण करता हूं ।मैं स्वप्रमारित और आत्म प्रमाणित करता हूं कि प्रत्येक कठिनाई में अंतिम समाधान गंगास्वरूप मेरी माता जी करती हैं” ।नदिया प्रत्येक प्रकार के बंधनों से मुक्त हो बल्कि प्रदूषण रहित हो और कॉर्पोरेट नियंत्रण से स्वतंत्र हो ।नदियों को प्रदूषित करने में कारपोरेट जगत का विषाक्त योगदान है, क्योंकि उनके सह पर अवैध खनन ने भी नदियों को प्रदूषित किया है। नियम- कानून को ताक पर रखने और नदियों के उद्धार के लिए शासकीय दस्तावेज तक सीमित रहने के कारण नदियां बहुत हद तक प्रदूषित हो चुकी हैं।

क्षेत्रीय स्तर, राष्ट्रीय स्तर और वैश्विक स्तर पर नदियों के महत्व को रुपायित करना और लोगों में जागरूकता पैदा करना की नदियां सभ्य नागरिक समाज की जीवन रेखा है। हम सभी को नदियों के स्वास्थ्य उन्नयन, नदी प्रदूषण को रोकने ,नदी संरक्षण एवं नदी स्वच्छता को बढ़ावा देने के लिए जागरूक होना चाहिए ।अमेरिका की शोध संस्था ‘ प्रोसीडिंग्स ऑफ द नेशनल एकेडमी ऑफ़ साइंसेज’ द्वारा प्रकाशित शोध रपट के अनुसार, पेरासिटामोल, निकोटीन, कैफीन मिर्गी की दवा और डायबिटीज की दवाइयां भी नदियों के लिए खतरनाक साबित हो रही है। वैश्विक रपट के अनुसार, लाहौर की नदियों में 70700, दिल्ली में 46700 और लंदन में 3080 विषाक्त रसायनों की मात्रा पाई गई है ।प्लास्टिक कचरा नदियों को प्रदूषित करने का बहुत बड़ा कारण बनता जा रहा है। एक रपट के अनुसार, दुनिया भर में 20 ऐसी नदियां हैं ,जिनके सहारे बहुत बड़ी मात्रा में प्लास्टिक महासागरों में समा जाता है।

राष्ट्रीय जियोग्राफी के सौजन्य से 18 सदस्यीय महिला वैज्ञानिकों के एक दल ने गंगा नदी में प्लास्टिक प्रदूषण के स्तर का वैज्ञानिक अध्ययन करने के लिए आरंभ से अंत तक प्रवास किए थे, और दल ने पाया कि भारत की सबसे बड़ी नदी गंगा सर्वाधिक पूजनीय होने के साथी सबसे ज्यादा प्रदूषित भी है।” नमामि गंगे” और” समग्र गंगा अभियान “के उपादेयता के कारण उत्तराखंड राज्य, उत्तर प्रदेश राज्य के प्रयागराज, बिहार और कोलकाता राज्य में गंगा नदी में प्रदूषण का स्तर कम हुआ है। अध्ययन से बताया गया है कि जैविक ऑक्सीजन मांग(BOD) में कमी आने के कारण गंगा नदी के जल की गुणवत्ता में सुधार हुआ है। गंगाजी तभी साफ- सुथरी होगी, जब उसकी सहायक नदियों को प्रदूषण से मुक्त रखा जाएगा। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB )के आंकड़ों के अनुसार ,देश की कुल नदियों में से आधी नदियां सर्वाधिक प्रदूषित हैं। सरकार, नागरिक समाज ,सामाजिक संस्थाएं और आमजनमानस के सहयोग से नदियों के प्रदूषण पर नियंत्रण पाया जा सकता है।

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